
देहरादून | विशेष संवाददाता
उत्तराखंड की विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा के कपाट बंद होने के बाद अक्सर यह माना जाता था कि हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटन की गतिविधियां थम जाती हैं, लेकिन हालिया आंकड़े एक नई और सुखद तस्वीर पेश कर रहे हैं। ‘शीतकालीन चारधाम यात्रा’ अब श्रद्धालुओं के लिए आस्था का नया केंद्र बनकर उभरी है। साल 2026 की शुरुआत के साथ ही भगवान के शीतकालीन प्रवास स्थलों—खरसाली, मुखबा, ऊखीमठ और पांडुकेश्वर—में दर्शनार्थियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है।
आंकड़ों की जुबानी: आस्था का बढ़ता ग्राफ
उत्तराखंड चारधाम यात्रा मैनेजमेंट कार्यालय से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शीतकालीन यात्रा की शुरुआत (24 अक्टूबर 2025) से लेकर 15 जनवरी 2026 तक कुल 27,672 श्रद्धालु चारों धामों के गद्दीस्थलों पर शीश नवा चुके हैं। यह आंकड़ा न केवल पर्यटन विभाग के लिए उत्साहजनक है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी शुभ संकेत है।
मुख्य यात्रा के समापन के बाद, जब मुख्य धामों के कपाट बर्फबारी के कारण बंद कर दिए जाते हैं, तब भगवान की उत्सव डोलियां उनके शीतकालीन प्रवास स्थलों पर विराजमान होती हैं। इस वर्ष जिस तरह से श्रद्धालुओं ने इन गद्दीस्थलों का रुख किया है, उसने पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं।
प्रमुख प्रवास स्थलों पर श्रद्धालुओं की उपस्थिति (15 जनवरी 2026 तक)
| गद्दीस्थल/प्रवास स्थल | संबंधित धाम | श्रद्धालुओं की कुल संख्या |
| खरसाली (उत्तरकाशी) | मां यमुनोत्री | 1,017 |
| मुखबा (उत्तरकाशी) | मां गंगोत्री | 3,298 |
| ऊखीमठ (रुद्रप्रयाग) | बाबा केदारनाथ | 16,950 |
| पांडुकेश्वर व नरसिंह मंदिर | भगवान बदरीविशाल | 6,407 |
नए साल 2026 का ‘मैजिक’: महज 15 दिनों में भारी बढ़त
सबसे चौंकाने वाले और सकारात्मक आंकड़े नए साल यानी जनवरी 2026 के शुरुआती 15 दिनों के हैं। विश्लेषण से पता चलता है कि यात्रियों का रुझान शीतकालीन यात्रा की ओर तेजी से बढ़ा है:
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गंगोत्री (मुखबा): जहां 2025 के अंतिम 69 दिनों में 2,401 श्रद्धालु आए थे, वहीं 2026 के शुरुआती 15 दिनों में ही 897 श्रद्धालुओं ने दर्शन किए।
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केदारनाथ (ऊखीमठ): बाबा केदार के गद्दीस्थल ओंकारेश्वर मंदिर, ऊखीमठ में नए साल के पहले पखवाड़े में 4,520 भक्त पहुंचे, जबकि पिछले साल के 69 दिनों में यह आंकड़ा 12,430 था।
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बदरीनाथ (पांडुकेश्वर/जोशीमठ): भगवान बदरीविशाल के दर्शन के लिए साल की शुरुआत में ही 2,391 श्रद्धालु पहुंचे।
यह तुलनात्मक अध्ययन स्पष्ट करता है कि अब श्रद्धालु केवल गर्मियों के सीजन का इंतजार नहीं करते, बल्कि शीतकाल की शांति और आध्यात्मिक वातावरण को भी प्राथमिकता दे रहे हैं।
शीतकालीन यात्रा का महत्व: क्यों बढ़ रही है लोकप्रियता?
उत्तराखंड सरकार और पर्यटन विभाग द्वारा ‘शीतकालीन यात्रा’ को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों का असर अब दिखने लगा है। इसके कई मुख्य कारण हैं:
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भीड़भाड़ से मुक्ति: मुख्य चारधाम यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को लंबी कतारों और ट्रैफिक का सामना करना पड़ता है, जबकि शीतकाल में दर्शन सुलभ और शांतिपूर्ण होते हैं।
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प्राकृतिक सौंदर्य: बर्फ से ढकी चोटियों के बीच गद्दीस्थलों की यात्रा एक अलग रोमांच और शांति प्रदान करती है।
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आध्यात्मिक सुगमता: जो लोग स्वास्थ्य कारणों या अन्य बाधाओं से मुख्य धाम (ऊंचाई वाले क्षेत्र) तक नहीं पहुंच पाते, उनके लिए गद्दीस्थलों पर दर्शन करना एक बेहतरीन विकल्प है।
मुख्य यात्रा 2025 की ऐतिहासिक सफलता
गौरतलब है कि वर्ष 2025 की मुख्य चारधाम यात्रा भी ऐतिहासिक रही थी। 23 अक्टूबर को गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ के कपाट बंद हुए थे, जबकि 25 नवंबर को बदरीविशाल के कपाट बंद होने के साथ यात्रा का औपचारिक समापन हुआ था। पूरे सीजन में कुल 51 लाख 4 हजार 975 श्रद्धालुओं ने देवभूमि में हाजिरी लगाई थी। मुख्य यात्रा के इसी उत्साह को अब शीतकालीन यात्रा आगे बढ़ा रही है।
स्थानीय रोजगार को मिला नया आयाम
शीतकालीन यात्रा के सुचारू संचालन से उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों के स्थानीय व्यापारियों, होटल व्यवसायियों और होमस्टे संचालकों के चेहरे खिल उठे हैं। आमतौर पर नवंबर से मार्च तक का समय इन क्षेत्रों के लिए ‘ऑफ-सीजन’ माना जाता था, लेकिन श्रद्धालुओं की निरंतर आवाजाही ने स्थानीय स्वरोजगार को 12 महीने सक्रिय रखने की दिशा में एक बड़ी उम्मीद जगाई है।
पर्यटन का नया हब बनता उत्तराखंड
आंकड़ों की यह तेजी यह प्रमाणित करती है कि उत्तराखंड अब केवल ‘सीजनल’ पर्यटन स्थल नहीं रह गया है। बुनियादी ढांचे में सुधार, ऑल वेदर रोड परियोजना और सोशल मीडिया के जरिए हुए प्रचार-प्रसार ने शीतकालीन प्रवास स्थलों को वैश्विक पहचान दिलाई है। यदि यही रुझान बना रहा, तो आने वाले वर्षों में शीतकालीन यात्रा मुख्य यात्रा के समानांतर खड़ी नजर आएगी।




