
उत्तराखंड के वन विभाग में इन दिनों प्रशासनिक असंतुलन की स्थिति साफ तौर पर देखने को मिल रही है। भारतीय वन सेवा (IFS) के कई अधिकारियों को प्रमोशन तो मिल चुका है, लेकिन नई जिम्मेदारियों के अनुरूप उनकी पोस्टिंग के आदेश अब तक जारी नहीं किए गए हैं। इस देरी ने न केवल अधिकारियों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है, बल्कि विभागीय कामकाज की रफ्तार पर भी असर पड़ रहा है।
जानकारी के मुताबिक, जनवरी महीने में विभाग में बड़े स्तर पर प्रमोशन किए गए थे। कुछ अधिकारी जो पहले प्रभारी कंजरवेटर ऑफ फॉरेस्ट (CF) के तौर पर काम कर रहे थे, उन्हें नियमित रूप से उसी पद पर पदोन्नत कर दिया गया। वहीं, कुछ अफसर CF से मुख्य वन संरक्षक (CCF) के पद पर पहुंचे, लेकिन उनके कार्यभार को लेकर अब तक स्पष्ट आदेश जारी नहीं हो सके हैं।
स्थिति यह है कि कई अधिकारी महीनों से वन मुख्यालय में बिना स्थायी जिम्मेदारी के बैठे हैं। उन्हें अस्थायी तौर पर कुछ कार्य जरूर सौंपे गए हैं, लेकिन यह व्यवस्था स्थायी नहीं है। इससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो रही है और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन में भी देरी हो रही है।
ऐसे ही मामलों में आईएफएस अधिकारी चंद्रशेखर सनवाल का नाम प्रमुखता से सामने आता है। वे अगस्त 2025 में प्रतिनियुक्ति से लौटे थे, लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी उन्हें स्थायी तैनाती नहीं मिल सकी है। इसी तरह अपर प्रमुख वन संरक्षक (APCCF) स्तर के अधिकारी सुरेंद्र मेहरा भी मुख्यालय में ज्वाइन करने के बावजूद बिना स्पष्ट जिम्मेदारी के हैं। आईएफएस अधिकारी विनय भार्गव भी पिछले चार महीनों से इसी स्थिति का सामना कर रहे हैं।
दूसरी ओर, कुछ अधिकारी ऐसे हैं जिन पर अत्यधिक कार्यभार है। विभाग के प्रमुख रंजन कुमार मिश्र एक साथ कई अहम जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। वे हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स (HoFF) होने के साथ-साथ पीसीसीएफ वाइल्डलाइफ जैसे महत्वपूर्ण पद का भी दायित्व संभाल रहे हैं। इसके अलावा कैंपा (CAMPA) से जुड़ी जिम्मेदारियां भी उनके पास थीं, जिन्हें बाद में कार्यभार अधिक होने के कारण दूसरे अधिकारी को सौंपना पड़ा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति विभाग में मानव संसाधन प्रबंधन की कमी को दर्शाती है। पूर्व प्रमुख वन संरक्षक जयराज के अनुसार, समय पर जिम्मेदारियों का बंटवारा न होने से न केवल अधिकारियों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि कामकाज की गुणवत्ता भी गिरती है।
दरअसल, ट्रांसफर और पोस्टिंग की प्रक्रिया बहुत जटिल नहीं है। इसके लिए सिविल सर्विस बोर्ड की बैठक आयोजित की जाती है, जिसकी अध्यक्षता मुख्य सचिव करते हैं। इस बैठक में प्रस्तावित तबादलों पर चर्चा कर अंतिम निर्णय लिया जाता है। इसके बावजूद लंबे समय से बैठक न होना या फैसलों में देरी कई सवाल खड़े करता है।
स्थिति और गंभीर तब हो गई जब पूर्व HoFF समीर सिन्हा और वरिष्ठ अधिकारी बीपी गुप्ता के सेवानिवृत्त होने के बाद नेतृत्व स्तर पर भी स्पष्टता की कमी देखने को मिली। इससे विभाग में स्थिरता प्रभावित हुई है।
इस पूरे मामले पर राज्य के वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि जल्द ही सिविल सर्विस बोर्ड की बैठक बुलाई जाएगी और लंबित ट्रांसफर-पोस्टिंग के आदेश जारी किए जाएंगे।
अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस दिशा में कितनी तेजी से कदम उठाती है और क्या इससे विभाग में व्याप्त असंतुलन दूर हो पाता है या नहीं। फिलहाल, प्रमोशन के बावजूद पोस्टिंग का इंतजार कर रहे अधिकारियों की नजरें सरकार के अगले फैसले पर टिकी हुई हैं।


