वाशिंगटन/इस्लामाबाद: दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक समीकरण एक बार फिर तेजी से बदल रहे हैं। एक तरफ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा पर ‘खुले युद्ध’ जैसी स्थिति बनी हुई है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस पूरे मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए पाकिस्तान के पक्ष में बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने न केवल पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक लीडरशिप की सराहना की, बल्कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच जारी संघर्ष में मध्यस्थता करने की इच्छा भी जताई है।
डोनाल्ड ट्रंप का बयान: “पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते बेहद मजबूत”
वाशिंगटन में पत्रकारों से बात करते हुए जब डोनाल्ड ट्रंप से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष और संभावित अमेरिकी हस्तक्षेप को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट और कूटनीतिक रुख अपनाया।
ट्रंप ने कहा:
“मैं इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए तैयार हूँ, लेकिन यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान के साथ मेरे संबंध बहुत अच्छे हैं। उनके पास एक शानदार प्रधानमंत्री और एक सक्षम सेना प्रमुख हैं। मैं इन दोनों का बेहद सम्मान करता हूँ। वर्तमान चुनौतीपूर्ण स्थितियों के बावजूद पाकिस्तान बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है और अमेरिका के साथ उसके रिश्ते काफी मजबूत हैं।”
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि बाइडन प्रशासन के बाद ट्रंप सरकार दक्षिण एशिया, खासकर तालिबान शासित अफगानिस्तान और आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को लेकर क्या नीति अपनाती है।
संघर्ष का केंद्र: ‘खुले युद्ध’ की कगार पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान
पिछले कुछ हफ्तों से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सैन्य तनाव चरम पर है। दोनों देश एक-दूसरे पर हवाई और ड्रोन हमलों के गंभीर आरोप लगा रहे हैं। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के भीतर संदिग्ध आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाकर हवाई हमले किए, जिसके बाद तनाव इस कदर बढ़ा कि पाकिस्तान ने इसे “खुले युद्ध” की संज्ञा दे दी।
प्रमुख घटनाक्रम:
-
हवाई हमले: पाकिस्तान का दावा है कि उसने अफगान सीमा के भीतर उन ठिकानों को ध्वस्त किया है जहाँ से पाकिस्तान विरोधी गतिविधियाँ संचालित हो रही थीं।
-
ड्रोन हमलों का जवाबी दावा: अफगानिस्तान के टोलो न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सूचना मंत्री अत्ताउल्लाह तरार ने दावा किया कि अफगान बलों ने पाकिस्तान के एबटाबाद, स्वाबी और नौशेरा जैसे प्रमुख शहरों में ड्रोन हमले करने की कोशिश की। हालांकि, पाकिस्तान के एयर डिफेंस सिस्टम ने इन्हें नाकाम करने का दावा किया है।
-
अफगान रक्षा मंत्रालय का रुख: दूसरी ओर, काबुल स्थित रक्षा मंत्रालय ने इन हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि यह पाकिस्तानी आक्रामकता का करारा जवाब है और उन्होंने पाकिस्तान के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है।
पाकिस्तान में ‘ड्रोन’ पर पाबंदी और सुरक्षा अलर्ट
सीमा पर बढ़ते तनाव और हवाई हमलों के खतरे को देखते हुए पाकिस्तान सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है। देश की आंतरिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने देशभर में सभी प्रकार के वाणिज्यिक और निजी ड्रोनों (Civilian Drones) के संचालन पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगा दिया है। सुरक्षा एजेंसियों को डर है कि इन निजी ड्रोनों का इस्तेमाल जासूसी या आत्मघाती हमलों के लिए किया जा सकता है।
ट्रंप की मध्यस्थता के क्या हैं मायने?
डोनाल्ड ट्रंप का पाकिस्तान के प्रति यह नरम रुख और ‘शानदार लीडरशिप’ वाला बयान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के लिए चर्चा का विषय है। ट्रंप की इस टिप्पणी के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं:
-
चीन का प्रभाव कम करना: अमेरिका चाहता है कि पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के पाले में न चला जाए।
-
तालिबान पर दबाव: ट्रंप जानते हैं कि अफगानिस्तान के तालिबान शासन को नियंत्रित करने या उनसे बात करने के लिए पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
-
दक्षिण एशिया में स्थिरता: एक पूर्ण सैन्य संघर्ष अमेरिका के रणनीतिक हितों के लिए हानिकारक हो सकता है, विशेषकर तब जब वह रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व में पहले से ही उलझा हुआ है।
क्या वाकई युद्ध टल जाएगा?
भले ही ट्रंप मध्यस्थता की बात कर रहे हों, लेकिन जमीन पर हालात इसके विपरीत नजर आ रहे हैं। डूरंड लाइन (दोनों देशों के बीच की सीमा) पर भारी गोलाबारी और सैन्य टुकड़ियों की आवाजाही जारी है। अफगानिस्तान के तालिबान शासक अब पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाइयों को अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहे हैं, जबकि पाकिस्तान का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएगा।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच जारी यह सैन्य तनाव न केवल इन दो देशों के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की शांति के लिए खतरा है। डोनाल्ड ट्रंप का हस्तक्षेप और पाकिस्तान की प्रशंसा यह संकेत देती है कि अमेरिका आने वाले समय में पाकिस्तान को एक ‘रणनीतिक साझेदार’ के रूप में फिर से स्थापित करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, ‘खुले युद्ध’ के साये में यह शांति वार्ता कितनी सफल होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि काबुल और इस्लामाबाद मेजों पर बैठने के लिए तैयार हैं या नहीं।



