
नैनीताल/देहरादून: उत्तराखंड में बेसिक शिक्षकों की भर्ती और योग्यता को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। नैनीताल हाईकोर्ट ने पत्राचार (Correspondence) के माध्यम से बेसिक टीचर सर्टिफिकेट (BTC) प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए शिक्षा विभाग को एक महत्वपूर्ण समय सीमा निर्धारित कर दी है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने मामले को निस्तारित करते हुए ‘निदेशक प्रारंभिक शिक्षा’ को याचिकाकर्ताओं के दावों पर तीन महीने के भीतर फैसला लेने का आदेश दिया है।
क्या है पूरा मामला? (Background of the Case)
उत्तराखंड के शिक्षा जगत में यह विवाद तब गहराया जब प्रतीक सकलानी और अन्य अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इन अभ्यर्थियों ने पत्राचार के माध्यम से बीटीसी (Correspondence BTC) की डिग्री हासिल की थी। हालांकि, इनकी मार्कशीट और डिग्री पर शिक्षा विभाग द्वारा एक विशेष शर्त अंकित की गई थी।
शर्त के अनुसार, “यह प्रमाण पत्र (BTC) राज्य के अधीन किसी भी नियमित नियुक्ति के लिए मान्य नहीं होगा।” इसी शर्त के आधार पर पूर्व में इन अभ्यर्थियों को राजकीय प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक (Assistant Teacher) के पद पर नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क: ‘समानता का अधिकार’
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने अदालत में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का हवाला दिया। उनका मुख्य तर्क यह था कि:
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पत्राचार के माध्यम से डिग्री लेने वाले कई अन्य अभ्यर्थियों को पहले ही राज्य के सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में सहायक अध्यापक के रूप में नियुक्त किया जा चुका है।
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जब समान योग्यता वाले लोग सिस्टम में कार्यरत हैं, तो याचिकाकर्ताओं को ‘सार्वजनिक रोजगार’ (Public Employment) के अवसर से क्यों वंचित किया जा रहा है?
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याचिकाकर्ताओं ने मांग की कि यदि उन्हें नियमित नियुक्ति नहीं दी जा सकती, तो कम से कम उन्हें भी अन्य अभ्यर्थियों की तरह संविदा (Contractual basis) पर नियुक्ति के अवसर मिलने चाहिए।
सरकार की दलील: ‘नियमित और संविदा के बीच का अंतर’
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने याचिकाकर्ताओं के दावों का कड़ा विरोध किया। सरकार की ओर से कोर्ट में स्पष्ट किया गया कि पत्राचार बीटीसी धारकों को कभी भी नियमित नियुक्ति (Regular Appointment) नहीं दी गई है।
सरकार ने तर्क दिया कि:
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जिन अभ्यर्थियों का हवाला याचिकाकर्ता दे रहे हैं, उन्हें केवल एक विशेष शैक्षणिक सत्र के लिए समेकित मानदेय (Consolidated Honorarium) पर रखा गया था। यह एक अस्थायी व्यवस्था थी, जिसे नियमित सेवा नहीं माना जा सकता।
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सरकार ने 27 नवंबर 2006 के शासनादेश (Government Order) की वैधता पर जोर दिया। इस शासनादेश में स्पष्ट किया गया है कि पत्राचार बीटीसी नियमित भर्ती के लिए पात्र नहीं है।
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उल्लेखनीय है कि इस शासनादेश को पूर्व में हाईकोर्ट की खंडपीठ (Division Bench) भी सही ठहरा चुकी है।
हाईकोर्ट का आदेश: 90 दिनों में ‘निर्णायक’ फैसला
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बीच का रास्ता निकाला है। कोर्ट ने याचिकाओं को इस निर्देश के साथ निस्तारित किया:
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प्रत्यावेदन देना अनिवार्य: याचिकाकर्ताओं को अब ‘निदेशक प्रारंभिक शिक्षा’ के समक्ष एक विस्तृत प्रत्यावेदन (Representation) प्रस्तुत करना होगा।
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90 दिनों की डेडलाइन: शिक्षा विभाग को इस प्रत्यावेदन पर कानून के दायरे में रहकर 3 महीने (90 दिन) के भीतर उचित निर्णय लेना होगा।
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कानूनी स्पष्टता: कोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं की मांगों का परीक्षण करें और देखें कि क्या संविदात्मक नियुक्ति के उनके दावों में कोई कानूनी आधार बनता है।
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| मुख्य बिंदु | विवरण |
| कोर्ट का नाम | नैनीताल हाईकोर्ट (Uttarakhand High Court) |
| जज का नाम | न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी |
| विवादित डिग्री | पत्राचार बीटीसी (Correspondence BTC) |
| विवाद का विषय | प्राथमिक शिक्षक भर्ती (Primary Teacher Recruitment) |
| समय सीमा | 90 दिन (3 महीने) |
उत्तराखंड में शिक्षक भर्ती पर क्या होगा असर?
यह फैसला उत्तराखंड में उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो वैकल्पिक माध्यमों से शैक्षणिक योग्यता हासिल करते हैं। यदि शिक्षा विभाग पत्राचार बीटीसी धारकों के पक्ष में कोई निर्णय लेता है, तो यह भविष्य की भर्तियों के लिए एक नजीर (Precedent) बन सकता है। हालांकि, 2006 के शासनादेश की मौजूदगी सरकार के हाथ मजबूत करती है, जिससे नियमित नियुक्ति की संभावनाएं कम दिखाई देती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला अब पूरी तरह से प्रशासनिक विवेक (Administrative Discretion) पर निर्भर है। यदि विभाग संविदा पर रखने की अनुमति देता है, तो इससे शिक्षा व्यवस्था में मैनपावर की कमी दूर हो सकती है, लेकिन यह कानूनी रूप से पेचीदा बना रहेगा।
नैनीताल हाईकोर्ट के इस आदेश ने गेंद अब शिक्षा विभाग के पाले में डाल दी है। अगले 90 दिन उन अभ्यर्थियों के लिए निर्णायक साबित होंगे जो वर्षों से नियुक्ति की राह देख रहे हैं। अभ्यर्थियों को अब अपने दस्तावेजों और कोर्ट के आदेश की प्रमाणित प्रति के साथ विभाग में पैरवी करनी होगी।



