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मालदा बंधक कांड पर सख्त हुआ सुप्रीम कोर्ट: ‘रात 2 बजे तक मॉनिटर कर रहा था’—ममता सरकार को कड़ी फटकार, मुख्य सचिव-गृह सचिव को नोटिस

Rajesh Dabral
Last updated: April 2, 2026 7:10 am
Rajesh Dabral
Published: April 2, 2026
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों को भीड़ द्वारा घंटों तक घेरकर बंधक बनाए जाने की घटना पर कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार को तीखी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि यह घटना न सिर्फ न्यायिक अधिकारियों को डराने का प्रयास है, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और अधिकार को खुली चुनौती भी है।

क्या है पूरा मामला?

घटना पश्चिम बंगाल के मालदा जिले की है, जहां कालीचक-2 बीडीओ कार्यालय के बाहर सैकड़ों लोगों की भीड़ ने विरोध प्रदर्शन के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक घेर लिया। जानकारी के मुताबिक ये अधिकारी मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत दस्तावेजों की जांच कर रहे थे। भीड़ का आरोप था कि मतदाता सूची से नाम हटाए जा रहे हैं, जिससे नाराज होकर लोगों ने उग्र प्रदर्शन शुरू कर दिया।

स्थिति इतनी बिगड़ गई कि मौके पर मौजूद अधिकारियों को बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिला और उन्हें देर रात तक वहीं रोके रखा गया। बताया गया कि इन अधिकारियों में चार महिलाएं भी शामिल थीं, जिससे मामले की संवेदनशीलता और बढ़ गई।

‘यह कोई सामान्य घटना नहीं’—CJI की कड़ी टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत ने बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उन्हें इस पूरे घटनाक्रम को लेकर रात 2 बजे तक निगरानी करनी पड़ी, जो अपने आप में इस घटना की गंभीरता को दर्शाता है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक योजनाबद्ध और प्रेरित कदम था, जिसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ना और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालना था।”

उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की घटनाएं न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला हैं और इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार पर कर्तव्य में चूक का आरोप

अदालत ने राज्य सरकार पर कर्तव्य निर्वहन में गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया। CJI ने पूछा कि जब संबंधित अधिकारियों को पहले से स्थिति की जानकारी दी गई थी, तो उन्होंने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित क्यों नहीं की?

उन्होंने यह भी कहा कि “दुर्भाग्यवश, आपके राज्य में हर कोई राजनीतिक भाषा बोलता है। यह सबसे अधिक ध्रुवीकृत राज्यों में से एक बनता जा रहा है।” अदालत की यह टिप्पणी राज्य में बढ़ते राजनीतिक तनाव और प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करती है।

मुख्य सचिव और गृह सचिव को नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सख्त कदम उठाते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और गृह सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अदालत ने पूछा है कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए। साथ ही दोनों अधिकारियों को अगली सुनवाई में वर्चुअल माध्यम से पेश होने का निर्देश दिया गया है।

जांच एजेंसी पर फैसला

अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह इस घटना की जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी से कराए। कोर्ट ने सुझाव दिया कि जांच या तो सीबीआई या राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को सौंपी जा सकती है।

साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले की निगरानी खुद करेगी और जांच एजेंसी को प्रारंभिक रिपोर्ट जल्द से जल्द पेश करनी होगी।

न्यायपालिका पर हमले को बताया ‘अवमानना’

CJI सूर्य कांत ने कहा कि इस तरह की घटनाएं आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) के दायरे में आती हैं। उन्होंने साफ किया कि अदालत किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने और न्यायिक अधिकारियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की अनुमति नहीं देगी।

उन्होंने कहा, “हम किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे, खासकर तब जब वह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से किया गया हो।”

राजनीतिक और प्रशासनिक असर

इस घटना के बाद राज्य की राजनीति भी गरमा गई है। विपक्षी दलों ने ममता सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रहने का आरोप लगाया है। वहीं राज्य सरकार की ओर से अभी तक इस मामले पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर जांच की बात कही जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की सुरक्षा और सम्मान से जुड़ा हुआ है। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर भविष्य की चुनावी प्रक्रियाओं और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है।

आगे क्या?

अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां राज्य के शीर्ष अधिकारी अदालत के सामने अपना पक्ष रखेंगे। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि जांच एजेंसी किसे सौंपी जाती है और उसकी रिपोर्ट में क्या सामने आता है।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख यह स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका की गरिमा और सुरक्षा के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा। यह मामला आने वाले दिनों में न सिर्फ पश्चिम बंगाल, बल्कि पूरे देश में न्यायिक व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर एक बड़ा उदाहरण बन सकता है।

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