हरिद्वार/चमोली: नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर का हिस्सा टूटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए खतरे की नई घंटी बजा दी है। इस आपदा ने उत्तराखंड के संवेदनशील पर्वतीय इलाकों, विशेष रूप से बद्रीनाथ धाम और भारत के अंतिम गांव माणा के आसपास मौजूद ग्लेशियरों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, अलकनंदा बेसिन में बड़ी संख्या में ऐसे ग्लेशियर मौजूद हैं, जिन्हें हैंगिंग ग्लेशियर या खड़ी पहाड़ी ढलानों पर टिके हुए ग्लेशियर कहा जाता है।
एक वैज्ञानिक अध्ययन में अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है। इनमें बद्रीनाथ-माणा का ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र विशेष रूप से संवेदनशील माना गया है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में मौजूद ग्लेशियरों की स्थिरता, संभावित हिमस्खलन और उससे पैदा हो सकने वाले बर्फ, चट्टान तथा मलबे के प्रवाह का विस्तृत अध्ययन किया है।
नेपाल में हुई हालिया तबाही ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि हिमालय की ऊंची ढलानों पर मौजूद कोई अस्थिर ग्लेशियर टूटता है तो उसके नीचे बसे गांवों, धार्मिक स्थलों, सड़कों और नदी घाटियों पर कितना गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
नेपाल की तबाही भारत के लिए क्यों है बड़ी चेतावनी?
नेपाल में 26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटने के बाद बर्फ, चट्टान और भारी मात्रा में मलबा नीचे की ओर आया। इस घटना से नदी का प्रवाह बाधित हुआ और बाद में मलबे के साथ तेज बहाव ने आसपास के क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों और खड़ी ढलानों की स्थिरता को लेकर वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
हिमालय एक युवा और भूगर्भीय रूप से अत्यंत सक्रिय पर्वत श्रृंखला है। यहां भूस्खलन, हिमस्खलन, ग्लेशियर टूटने और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा हमेशा बना रहता है। बदलते मौसम, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा और तेजी से बदलती हिमालयी परिस्थितियां इन जोखिमों को और जटिल बना सकती हैं।
बद्रीनाथ और माणा क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति भी इसे विशेष बनाती है। यहां ऊंची और खड़ी पहाड़ियों के बीच ग्लेशियर मौजूद हैं। जब किसी मुख्य ग्लेशियर का आकार कम होता है या वह पीछे हटता है, तो उससे जुड़े कुछ हिस्से खड़ी ढलानों पर अलग रूप में रह सकते हैं। ऐसे बर्फीले हिस्सों को वैज्ञानिक संभावित जोखिम के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानते हैं।
आखिर क्या होते हैं हैंगिंग ग्लेशियर?
हैंगिंग ग्लेशियर सामान्य रूप से उन ग्लेशियरों या बर्फीले भागों को कहा जाता है, जो खड़ी पर्वतीय ढलानों पर स्थित होते हैं। इनकी स्थिति कई बार सामान्य घाटी ग्लेशियरों की तुलना में अधिक संवेदनशील हो सकती है। यदि तापमान, चट्टानों की स्थिति, वर्षा, बर्फबारी या अन्य प्राकृतिक कारणों से इनकी स्थिरता प्रभावित होती है तो बर्फ का हिस्सा नीचे की ओर खिसक सकता है।
किसी बड़े हिस्से के टूटने की स्थिति में केवल बर्फ ही नीचे नहीं आती, बल्कि उसके साथ चट्टानें, मिट्टी और अन्य मलबा भी बह सकता है। यदि यह भारी मलबा किसी नदी या नाले के रास्ते में पहुंचकर प्रवाह को रोक दे तो अस्थायी झील या जल अवरोध बन सकता है। बाद में यदि यह अवरोध टूटता है तो नीचे की ओर अचानक तेज बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है।
यही वजह है कि वैज्ञानिक ऐसे ग्लेशियरों की पहचान, उनकी स्थिरता और उनके नीचे मौजूद आबादी तथा बुनियादी ढांचे पर संभावित प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं।
अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान
वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, अलकनंदा बेसिन में कुल 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान की गई है। इनमें से बद्रीनाथ और माणा के आसपास का ऊपरी क्षेत्र हैंगिंग ग्लेशियरों की मौजूदगी और संभावित जोखिम के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया है।
अध्ययन में बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र के आसपास मौजूद 25 हैंगिंग ग्लेशियरों को आधार बनाकर संभावित हिमस्खलन और मलबा प्रवाह से जुड़े विभिन्न परिदृश्यों का मॉडल तैयार किया गया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि यदि किसी ग्लेशियर का अस्थिर हिस्सा टूटता है तो बर्फ और मलबे का प्रवाह किस दिशा में जा सकता है और कौन-कौन से इलाके इसकी चपेट में आ सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने सबसे खराब संभावित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मॉडलिंग की है। इसका अर्थ यह नहीं है कि ऐसी घटना निश्चित रूप से होगी, बल्कि वैज्ञानिकों ने संभावित खतरे की सीमा और प्रभावित हो सकने वाले क्षेत्रों का आकलन करने का प्रयास किया है।
बद्रीनाथ, माणा और आसपास के इलाकों पर पड़ सकता है असर
अध्ययन के अनुसार, यदि किसी हैंगिंग ग्लेशियर का पूरा अस्थिर हिस्सा टूट जाए तो उसका प्रभाव बद्रीनाथ, माणा, हनुमान चट्टी और आसपास के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों तक पहुंच सकता है।
मॉडलिंग के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि अत्यधिक गंभीर स्थिति में बर्फ, चट्टान और मलबे का प्रवाह बद्रीनाथ क्षेत्र में काफी ऊंचाई तक पहुंच सकता है। अध्ययन में बद्रीनाथ क्षेत्र में संभावित मलबा प्रवाह की ऊंचाई अधिकतम 51 मीटर तक, बद्रीनाथ-माणा सड़क क्षेत्र में 48 मीटर तक और हनुमान चट्टी के आसपास करीब 40 मीटर तक पहुंचने की संभावना वाले परिदृश्यों का उल्लेख किया गया है।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि ये आंकड़े वैज्ञानिक मॉडलिंग के तहत तैयार किए गए संभावित सबसे खराब परिस्थितियों के अनुमान हैं। इन्हें किसी निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन यह जरूर स्पष्ट होता है कि यदि हिमालय के किसी संवेदनशील क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बर्फ और चट्टान का हिस्सा टूटता है तो उसका प्रभाव बहुत दूर तक पहुंच सकता है।
बद्रीनाथ धाम देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में शामिल है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। माणा गांव भी सामरिक और भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में यहां किसी भी प्राकृतिक खतरे का समय रहते आकलन और निगरानी बेहद जरूरी हो जाती है।
बदलते हिमालय को दशकों से महसूस कर रहे स्थानीय लोग
माणा गांव के दो बार ग्राम प्रधान रहे पीतांबर सिंह मोलपा के अनुसार, स्थानीय लोग पिछले कई दशकों से हिमालय के मौसम, ग्लेशियरों और प्राकृतिक जलस्रोतों में बदलाव महसूस कर रहे हैं।
उनका कहना है कि पहले मई और जून के महीनों तक आसपास के ऊंचे इलाकों में काफी बर्फ दिखाई देती थी। पांडुकेश्वर से आगे विष्णुप्रयाग घाटी की ओर बढ़ने पर कई स्थानों पर ग्लेशियर आसानी से दिखाई देते थे। हनुमान चट्टी पार करने के बाद ही वातावरण में तेज ठंडक और बर्फीली हवाओं का एहसास होने लगता था।
लेकिन अब स्थितियां पहले जैसी नहीं रही हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कई दशकों के दौरान कई ग्लेशियर पीछे खिसके हैं और कुछ छोटे बर्फीले क्षेत्र पहले की तुलना में काफी कम हो गए हैं।
पीतांबर सिंह मोलपा ने सतोपंथ ग्लेशियर और वसुधारा क्षेत्र के सामने मौजूद ग्लेशियरों में बदलाव का भी उल्लेख किया है। उनके अनुसार, 1970 और 1980 के दशक की तुलना में कई छोटे ग्लेशियर काफी पीछे चले गए हैं या उनका आकार बहुत कम हो गया है।
स्थानीय स्तर पर देखे गए इन बदलावों को वैज्ञानिक अध्ययन भी व्यापक हिमालयी परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानते हैं।
बारिश का पैटर्न भी बदल रहा, बढ़ सकती हैं चुनौतियां
स्थानीय लोगों के अनुसार, केवल ग्लेशियर ही नहीं बल्कि बारिश का पैटर्न भी बदल रहा है। पहले जहां मौसम और वर्षा का एक अपेक्षाकृत निश्चित चक्र देखने को मिलता था, वहीं अब कई बार प्री-मानसून के दौरान तेज बारिश हो जाती है, मानसून में बारिश का वितरण असमान रहता है और पोस्ट-मानसून अवधि में भी कई बार तेज वर्षा दर्ज की जाती है।
पर्वतीय क्षेत्रों में बारिश के पैटर्न में बदलाव का सीधा प्रभाव ढलानों, नालों और नदियों पर पड़ सकता है। भारी बारिश से पहाड़ों की मिट्टी और चट्टानों की पकड़ कमजोर हो सकती है, जिससे भूस्खलन और मलबा बहने की घटनाएं बढ़ने की संभावना रहती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, तापमान में वृद्धि, वर्षा में बदलाव और अन्य भू-आकृतिक प्रक्रियाएं हैंगिंग ग्लेशियरों की स्थिरता को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक हो सकते हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में जोखिम केवल किसी एक कारण से पैदा नहीं होता। कई बार बर्फ, चट्टान, वर्षा, नदी और ढलानों की स्थिति एक साथ मिलकर बड़ी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकती है। इसलिए इन सभी कारकों को एक साथ समझना जरूरी है।
प्राकृतिक जलस्रोतों में भी दिख रहे बदलाव
पीतांबर सिंह मोलपा के अनुसार, पिछले कई वर्षों में क्षेत्र के प्राकृतिक जलस्रोतों में भी बदलाव महसूस किया गया है। कुछ स्रोत समय के साथ कमजोर हुए हैं या सूख गए हैं, जबकि बारिश के मौसम में उनमें दोबारा पानी दिखाई देता है।
उन्होंने कुबेर नाला, धंतोली नाला, द्रोणा नाला सहित कई स्थानीय जलधाराओं में समय के साथ आए बदलावों का उल्लेख किया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले इन नालों और प्राकृतिक स्रोतों में अधिक नियमित रूप से पानी मौजूद रहता था।
जलस्रोतों, बर्फबारी और वर्षा के पैटर्न में बदलाव हिमालयी पर्यावरण में हो रहे व्यापक परिवर्तन का संकेत हो सकते हैं। हालांकि, किसी भी विशेष बदलाव के सटीक कारणों का निर्धारण विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन और लंबे समय के आंकड़ों के आधार पर ही किया जा सकता है।
2021 की चमोली आपदा ने दिखाया था विनाश का मंजर
उत्तराखंड पहले भी हिमालयी आपदाओं का दर्दनाक अनुभव कर चुका है। वर्ष 2021 में चमोली जिले में हुई रॉक-आइस एवलांच की घटना ने दिखाया था कि बर्फ, चट्टान और मलबा जब एक साथ तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है तो उसका प्रभाव कितना विनाशकारी हो सकता है।
वैज्ञानिक अध्ययन में इस घटना को उदाहरण के रूप में शामिल करते हुए बताया गया है कि हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ और चट्टानों से जुड़ी घटनाओं का गंभीरता से अध्ययन और निगरानी आवश्यक है।
अलकनंदा क्षेत्र में पहले भी हिमस्खलन और नदी प्रवाह बाधित होने से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख मिलता रहा है। अध्ययन में 1970 और 1978 की ऐसी घटनाओं का भी जिक्र किया गया है, जब हिमस्खलन के कारण अलकनंदा नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए प्रभावित हुआ था।
इन घटनाओं से यह समझने में मदद मिलती है कि पहाड़ों में होने वाली एक घटना किस तरह नदी घाटी, सड़कों, पुलों, गांवों और नीचे बसे क्षेत्रों तक प्रभाव डाल सकती है।
बढ़ती आबादी और निर्माण से जोखिम का दायरा भी बढ़ा
वैज्ञानिक मॉडलिंग में केवल प्राकृतिक खतरे को ही नहीं बल्कि समय के साथ बढ़ते निर्माण और आबादी को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2000 में संभावित रूप से प्रभावित निर्मित क्षेत्र लगभग 8 हजार वर्ग मीटर था। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह क्षेत्र बढ़कर करीब 1.52 लाख वर्ग मीटर तक पहुंच सकता है।
इसी तरह संभावित रूप से प्रभावित आबादी का अनुमान भी वर्ष 2000 में करीब 380 से बढ़कर 2030 तक लगभग 8,540 तक पहुंचने का लगाया गया है।
यह आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में केवल प्राकृतिक जोखिम ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि समय के साथ बढ़ता निर्माण, सड़क नेटवर्क, पर्यटन और धार्मिक यात्राओं के कारण जोखिम वाले क्षेत्रों में लोगों की मौजूदगी भी बढ़ रही है।
इसलिए आपदा प्रबंधन में केवल घटना होने के बाद राहत पहुंचाना पर्याप्त नहीं है। जोखिम की पहचान, संवेदनशील क्षेत्रों का नक्शा तैयार करना, सुरक्षित निर्माण, यात्रा प्रबंधन और समय रहते चेतावनी देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
सभी ग्लेशियरों की निगरानी संभव नहीं, पहले पहचानने होंगे सबसे खतरनाक क्षेत्र
हिमालय का क्षेत्र बेहद विशाल और दुर्गम है। हर ग्लेशियर और हर बर्फीली ढलान की लगातार मैदानी निगरानी करना व्यावहारिक रूप से आसान नहीं है। इसलिए वैज्ञानिकों ने अधिक जोखिम वाले हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान कर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर मॉनिटर करने की आवश्यकता बताई है।
इसके लिए आधुनिक तकनीक बेहद उपयोगी हो सकती है। उपग्रह चित्रों के माध्यम से ग्लेशियरों के आकार और स्थिति में बदलाव देखा जा सकता है। मैदानी सर्वेक्षण से वास्तविक परिस्थितियों का आकलन किया जा सकता है। रडार आधारित तकनीक और अन्य वैज्ञानिक उपकरणों से बर्फ और ढलानों की गतिविधियों को समझने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम, यानी समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्था विकसित करना जरूरी माना जा रहा है। यदि किसी संभावित घटना के शुरुआती संकेत मिलते हैं तो समय रहते सड़कें बंद की जा सकती हैं, यात्रियों को रोका जा सकता है और स्थानीय लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है।
बद्रीनाथ-माणा के लिए क्यों जरूरी है समय रहते तैयारी?
नेपाल में हुई हालिया आपदा ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र धार्मिक, सामरिक, पर्यटन और पर्यावरणीय—चारों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण है।
यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। सड़कें, पुल, होटल, स्थानीय बस्तियां और अन्य बुनियादी ढांचा भी लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में किसी भी संभावित प्राकृतिक खतरे की वैज्ञानिक निगरानी बेहद आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि संभावित खतरे की पहचान घटना होने से पहले की जाए। उपग्रह निगरानी, वैज्ञानिक सर्वेक्षण, संवेदनशील ग्लेशियरों की सूची, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम से बड़े नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
नेपाल की हालिया तबाही को उत्तराखंड के लिए किसी निश्चित भविष्यवाणी के बजाय एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। बद्रीनाथ-माणा के ऊपर मौजूद 219 हैंगिंग ग्लेशियरों की पहचान और वैज्ञानिक अध्ययन यह संकेत देते हैं कि हिमालय के बदलते पर्यावरण को लगातार समझने और संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी करने की आवश्यकता है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पहाड़ों में आपदा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन समय रहते खतरे को पहचानकर उसके प्रभाव को कम जरूर किया जा सकता है। बद्रीनाथ-माणा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए वैज्ञानिक निगरानी, आधुनिक तकनीक और मजबूत चेतावनी प्रणाली भविष्य में किसी बड़े खतरे से बचाव की सबसे महत्वपूर्ण तैयारी साबित हो सकती है।
