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अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप से एच1-बी वीजा नीति पर पुनर्विचार करने की करी अपील

वॉशिंगटन/न्यूयॉर्क: अमेरिकी सांसदों के एक समूह ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से आग्रह किया है कि वे एच1-बी वीजा कार्यक्रम से जुड़ी नई नीतियों और अत्यधिक शुल्क प्रस्ताव पर पुनर्विचार करें। सांसदों ने चेतावनी दी है कि इस कदम से न केवल अमेरिकी कंपनियों को भारी नुकसान होगा बल्कि विदेशी कुशल पेशेवरों—खासकर भारतीय आईटी विशेषज्ञों—के रोजगार अवसरों पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है।

कांग्रेस सदस्यों की अपील: ‘यह कदम आत्मघाती साबित होगा’

कई प्रभावशाली सांसदों ने एक संयुक्त पत्र में ट्रंप प्रशासन के आदेश को “नवाचार-विरोधी” और “आर्थिक रूप से आत्मघाती” बताया। पत्र में कहा गया है,

“एच1-बी वीजा कार्यक्रम पिछले तीन दशकों से अमेरिका की तकनीकी और आर्थिक बढ़त का स्तंभ रहा है। इसे कमजोर करने का अर्थ है — हमारे देश के नवाचार ढांचे को स्वयं क्षति पहुँचाना।”

सांसदों ने कहा कि प्रस्तावित नियम के तहत वीज़ा आवेदन शुल्क को 1,00,000 अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाना अव्यावहारिक है और इससे छोटे और मध्यम आकार की टेक कंपनियाँ गंभीर वित्तीय दबाव में आ जाएँगी।

भारतीय पेशेवरों पर गहरा असर

अमेरिका में जारी होने वाले कुल एच1-बी वीज़ाओं में से लगभग 70 प्रतिशत भारतीय पेशेवरों को मिलते हैं। ये अधिकांशतः इंजीनियरिंग, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डेटा साइंस और एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि शुल्क में इतनी भारी वृद्धि के बाद भारतीय कंपनियों के लिए अपने कर्मचारियों को अमेरिका भेजना लगभग असंभव हो जाएगा।

भारतीय आईटी उद्योग संगठन नासकॉम (NASSCOM) ने इस नीति को “तकनीकी वैश्वीकरण पर प्रहार” बताया है। नासकॉम के बयान में कहा गया,

“एच1-बी वीजा का उद्देश्य विश्वभर से प्रतिभा लाकर अमेरिकी उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाना है। इस पर प्रतिबंध लगाना, अमेरिका के अपने ही नवाचार तंत्र को कमजोर करना है।”

‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के अंतर्गत नया विवाद

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत विदेशी पेशेवरों पर लगातार सख्ती बरती जा रही है। 2017 में भी ट्रंप ने एच1-बी प्रक्रिया को कड़ा बनाते हुए वीजा नवीनीकरण और चयन के मानकों में बदलाव किए थे।
अब नए प्रस्ताव के तहत आवेदन शुल्क में अभूतपूर्व बढ़ोतरी और कंपनियों के लिए ऑडिट व डॉक्यूमेंटेशन की जटिल शर्तें जोड़ी गई हैं।

अमेरिकी श्रम विभाग का कहना है कि यह निर्णय “घरेलू नौकरियों की रक्षा” के लिए है। लेकिन उद्योग जगत और सांसदों का मानना है कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता पर विपरीत असर पड़ेगा।

टेक कंपनियों ने जताई नाराज़गी

अमेरिका की शीर्ष तकनीकी कंपनियों — गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, एप्पल, और मेटा — ने इस प्रस्ताव पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
टेकनेट (TechNet) की अध्यक्ष लिंडा मूर ने कहा,

“अमेरिकी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने वाली कंपनियों को दंडित करना उचित नहीं। वैश्विक प्रतिभाओं के बिना नवाचार का इंजन रुक जाएगा।”

कई कंपनियों ने इस नीति को “वैज्ञानिक प्रगति और उद्यमिता के खिलाफ” करार दिया है। उनका कहना है कि उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में स्थानीय प्रतिभा की कमी पहले से है, ऐसे में विदेशी पेशेवरों पर निर्भरता एक वास्तविकता है, न कि विकल्प।

भारत सरकार ने उठाया मुद्दा

भारत सरकार ने भी इस फैसले को लेकर अमेरिका से औपचारिक स्तर पर बातचीत शुरू कर दी है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि भारत इस मुद्दे को “समानता और पारस्परिक हितों” के आधार पर उठाएगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली ने अमेरिकी दूतावास से औपचारिक नोट भेजकर कहा है कि यह निर्णय भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों की भावना के अनुकूल नहीं है।

विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने बताया,

“भारतीय पेशेवर अमेरिका की अर्थव्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनके खिलाफ इस तरह की नीतियाँ द्विपक्षीय भरोसे को प्रभावित कर सकती हैं।”

एच1-बी वीजा का वैश्विक महत्व

एच1-बी वीजा अमेरिकी इमिग्रेशन नीति का सबसे प्रतिष्ठित प्रावधान माना जाता है। यह वीजा उन विदेशी पेशेवरों को दिया जाता है जो विशेषज्ञ तकनीकी या शैक्षणिक योग्यता रखते हैं।
हर साल लगभग 85,000 वीज़ा जारी होते हैं, जिनमें से 65,000 सामान्य श्रेणी और 20,000 अमेरिकी विश्वविद्यालयों से स्नातक उम्मीदवारों के लिए आरक्षित होते हैं।

इस वीजा के जरिये अमेरिका ने दशकों तक दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तकनीकी प्रतिभाओं को आकर्षित किया है, जिनमें से कई ने सिलिकॉन वैली की कंपनियों में नेतृत्वकारी भूमिकाएँ निभाई हैं।

विश्लेषकों की चेतावनी

अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नया शुल्क ढांचा लागू होता है, तो इससे अमेरिका में कुशल श्रमिकों की आपूर्ति में भारी गिरावट आएगी।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मार्क एलन के अनुसार,

“एच1-बी वीजा को सीमित करने का अर्थ है नवाचार की गति को धीमा करना। चीन, कनाडा और यूरोपीय संघ पहले से ही इस अवसर का लाभ उठाने को तैयार हैं।”

भारत-अमेरिका संबंधों के जानकार विश्लेषक सी. राजा मोहन का मानना है कि यह नीति राजनीतिक रूप से आकर्षक हो सकती है, लेकिन आर्थिक रूप से इसका खामियाजा दोनों देशों को भुगतना पड़ेगा।

वैश्वीकरण बनाम राष्ट्रवाद की नई परीक्षा

सांसदों, उद्योग संगठनों और विशेषज्ञों की आलोचना के बाद अब ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है कि वह एच1-बी वीजा नीति की समीक्षा करे।
यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो इससे अमेरिका की तकनीकी बढ़त, भारतीय पेशेवरों का योगदान, और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी—तीनों पर असर पड़ेगा।

वर्तमान परिदृश्य एक बार फिर इस बहस को जन्म देता है कि क्या राष्ट्रवादी नीतियाँ वैश्विक नवाचार के लिए खतरा बन रही हैं, या फिर अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही आने वाले दशक की आर्थिक स्थिरता की कुंजी साबित होगा.

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