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दिल्ली-NCR में प्रदूषण का संकट गहराया: IARI रिपोर्ट में 6 राज्यों से 23,613 पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज, GRAP-III के बावजूद हालात गंभीर

नई दिल्ली: दिल्ली-एनसीआर की हवा एक बार फिर ज़हरीली हो चुकी है। राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता लगातार “गंभीर” स्तर के आसपास दर्ज की जा रही है और हालात को नियंत्रित करने के लिए आयोग (CAQM) ने बुधवार को ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के तीसरे चरण यानी GRAP-III को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है। इसके तहत निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध, औद्योगिक इकाइयों पर निगरानी, ट्रैफिक प्रतिबंधों की संभावना और प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर सख्त कार्रवाई जैसे कठोर प्रावधान लागू हो जाते हैं।

लेकिन इन प्रयासों के बीच देश के छह प्रमुख राज्यों में पराली जलाने के बढ़ते मामलों ने चिंता को और गहरा कर दिया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के तहत आईएआरआई की CREAMS लेबोरेटरी द्वारा सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग से जुटाए गए ताजा आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि प्रदूषण संकट सिर्फ दिल्ली-एनसीआर की सड़कों और उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि खेतों में फसल अवशेष जलाने की प्रवृत्ति अब भी बेकाबू है।

6 राज्यों में 23,613 पराली जलाने की घटनाएँ

ICAR-IARI की रिपोर्ट के अनुसार, 15 सितंबर 2025 से 20 नवंबर 2025 के बीच देश के छह राज्यों—मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और बिहार—में पराली जलाने की कुल 23,613 घटनाएँ दर्ज की गईं। इस बार सबसे अधिक मामले मध्य प्रदेश से सामने आए हैं, जो पिछले वर्षों के पारंपरिक पैटर्न से बिल्कुल अलग है, क्योंकि पराली के सबसे ज्यादा मामले आमतौर पर पंजाब और हरियाणा से सामने आते रहे हैं।

राज्यवार स्थिति

  • मध्य प्रदेश: 10,800 घटनाएँ (इस सीज़न में देश में सबसे ज़्यादा)
  • पंजाब: 5,046 घटनाएँ
  • उत्तर प्रदेश: 4,507 घटनाएँ
  • राजस्थान: 2,663 घटनाएँ
  • (हरियाणा और बिहार के आंकड़े कुल में शामिल हैं, लेकिन राज्यवार विभाजन रिपोर्ट में सीमित बताया गया है।)

सैटेलाइट से मिले आंकड़ों के अनुसार, 20 नवंबर 2025 को अकेले 795 नई घटनाएँ रिपोर्ट की गईं, यह दर्शाता है कि GRAP-III लागू होने के बावजूद खेतों में धान प्रत्यक्ष अवशेष जलाने का सिलसिला थमा नहीं है।

दिल्ली-एनसीआर में हवा क्यों हुई ज़हरीली?

दिल्ली में वायु गुणवत्ता प्रभावित करने वाले कई स्रोत हैं—जैसे वाहन उत्सर्जन, निर्माण धूल, औद्योगिक धुआँ, सड़क की धूल, कूड़ा जलाना, रिहायशी क्षेत्रों की गतिविधियाँ—लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सर्दियों में हवा की गति कम होने और तापमान गिरने से यह प्रदूषक वायुमंडल के निचले स्तर पर फँस जाते हैं।

ऐसे समय में पराली जलाने से निकलने वाला धुआँ हवा में मौजूद प्रदूषकों के साथ मिलकर स्मॉग की परत को और अधिक घना बना देता है। पंजाब, यूपी और हरियाणा से आने वाली उत्तर-पश्चिमी हवाएँ इन प्रदूषकों को दिल्ली-एनसीआर की तरफ ढकेल देती हैं—और यह समस्या साल-दर-साल दोहराई जाती है।

मध्य प्रदेश में पराली जलाने के रिकॉर्ड मामलों पर सवाल

इस सीज़न में पहली बार मध्य प्रदेश पराली जलाने की घटनाओं में शीर्ष पर पहुंच गया है। कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि राज्य के कई जिलों में धान की खेती लगातार बढ़ रही है, जबकि किसानों के पास मशीनरी या वैकल्पिक प्रबंधन के साधन नहीं हैं।
CREAMS लैब की रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि फसल अवशेष प्रबंधन योजनाओं की पहुंच सीमित है, और जिन राज्यों को पारंपरिक तौर पर कम जोखिम वाला माना जाता था, वहाँ भी संकट बढ़ रहा है।

सरकारी प्रयासों पर बड़ा सवाल

केंद्रीय और राज्य सरकारें पिछले कई वर्षों से करोड़ों रुपये फसल अवशेष प्रबंधन, मशीनरी सब्सिडी, जागरूकता अभियान और वैकल्पिक उपयोग (जैसे बायो-डीकंपोज़र) पर खर्च कर रही हैं। इसके बावजूद आंकड़े दर्शाते हैं कि ज़मीनी ढांचा उतना मजबूत नहीं हो पाया है कि किसान पराली जलाने से पूरी तरह रुक सकें।

कई किसान संगठनों का तर्क है कि

  • मशीनीकरण की लागत अब भी अधिक है,
  • स्ट्रॉ मैनेजमेंट मशीनरी हर गांव तक नहीं पहुंची,
  • और धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई के बीच समय कम होने के कारण किसान पराली जलाने को मजबूर होते हैं।

GRAP-III के लागू होने का क्या मतलब?

CAQM द्वारा GRAP-III लागू करने का मतलब है कि प्रदूषण “गंभीर” श्रेणी में पहुँच चुका है। इस चरण के तहत:

  • निर्माण गतिविधियों पर रोक,
  • धूल फैलाने वाली परियोजनाओं पर विराम,
  • ईंट भट्टों और औद्योगिक इकाइयों पर सख्त निगरानी,
  • डीज़ल जेनरेटर के उपयोग पर प्रतिबंध,
  • और सड़क धूल हटाने के लिए निरंतर मैकेनिकल स्वीपिंग
    जैसे कदम लागू किए जाते हैं।

एक वरिष्ठ पर्यावरण विशेषज्ञ के अनुसार, “GRAP-III लागू होना बताता है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए हम पहले से लगाए गए उपायों से आगे बढ़कर और कठोर कदम उठाने की स्थिति में पहुँच चुके हैं। पराली जलाने के आंकड़े यह दिखाते हैं कि यह संकट सिर्फ शहरी सीमाओं तक सीमित नहीं है।”

दिल्ली की हवा पर कितना असर?

पराली जलाने का योगदान AQI में साल-दर-साल अलग-अलग रहता है, लेकिन CREAMS और SAFAR के आंकड़ों के अनुसार गंभीर दिनों में दिल्ली के प्रदूषण में पराली का योगदान 25 से 35% तक पहुँच जाता है।
20 नवंबर को पराली जलाने की 795 घटनाएँ दर्ज होना बताता है कि हवा में प्रदूषण का लोड आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है।

आगे का रास्ता: क्या समाधान हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाने से रोकने का एकमात्र समाधान “मशीनरी + प्रोत्साहन + बाजार तंत्र” का स्थायी मॉडल है।

  • Happy Seeder और SMS जैसी मशीनों की उपलब्धता बढ़ानी होगी।
  • किसानों के लिए फसल अवशेष बेचने और प्रोसेसिंग यूनिट्स तक पहुँच सुनिश्चित करनी होगी।
  • राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाना होगा, ताकि दिल्ली की हवा देश के किसी भी हिस्से की गतिविधि की कीमत पर ज़हरीली न बने।

ICAR-IARI की ताज़ा रिपोर्ट ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया है कि पराली जलाने की समस्या अब सिर्फ पंजाब-हरियाणा तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य भारत तक फैल गई है। GRAP-III लागू होने के बावजूद प्रदूषण का संकट गहराता जा रहा है, और सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किसानों को पराली जलाने से रोकने के लिए वैकल्पिक समाधान ज़मीनी स्तर तक पहुँचाए जाएँ।

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