
ढाका/नई दिल्ली: दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात हो गया है। बांग्लादेश के 13वें आम चुनाव के रुझानों और नतीजों ने साफ कर दिया है कि देश की जनता ने तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) पर अपना भरोसा जताया है। शेख हसीना के 15 साल लंबे शासन के अंत के बाद हुए इन पहले आम चुनावों में बीएनपी ने न केवल जीत हासिल की है, बल्कि एकतरफा ‘जनादेश’ के साथ दो-तिहाई बहुमत की ओर अग्रसर है।
BNP की ‘ऐतिहासिक जीत’, धराशायी हुआ 11 दलों का गठबंधन
बांग्लादेश चुनाव आयोग द्वारा जारी अब तक के आंकड़ों के अनुसार, चुनाव पूरी तरह से एकतरफा नजर आ रहा है। कुल 300 सीटों वाली संसद (जातीय संसद) में से अब तक प्राप्त 194 सीटों के परिणामों ने शक्ति संतुलन को स्पष्ट कर दिया है:
| पार्टी/गठबंधन | जीती गई सीटें (अब तक) |
| BNP और सहयोगी दल | 149 |
| जमात-ए-इस्लामी और 11 दलीय गठबंधन | 39 |
| अन्य/निर्दलीय | 06 |
बीएनपी चुनाव समिति के प्रवक्ता महदी अमीन ने दावा किया है कि पार्टी ऐतिहासिक जीत दर्ज करने के करीब है। विशेष रूप से, खालिदा जिया के बेटे और बीएनपी के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान ने उन दोनों सीटों पर जीत हासिल की है, जहां से उन्होंने चुनाव लड़ा था।
2024 के आंदोलन से सत्ता के गलियारे तक
यह चुनाव बांग्लादेश के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2024 के हिंसक छात्र आंदोलन और नागरिक विद्रोह के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को न केवल पद छोड़ना पड़ा था, बल्कि देश भी छोड़ना पड़ा था। उस घटनाक्रम के बाद कार्यवाहक सरकार की देखरेख में हुए इन चुनावों में जनता ने ‘परिवर्तन’ के पक्ष में वोट किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी और उसके 11 सहयोगी दलों के गठबंधन से कड़ी टक्कर की उम्मीद थी, लेकिन चुनावी जंग में वे कहीं टिक नहीं पाए। बीएनपी के वरिष्ठ नेता रुहुल कबीर रिजवी ने समर्थकों से अपील की है कि वे सड़कों पर जश्न मनाने के बजाय शुक्रवार को प्रार्थना के जरिए अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें।
तारिक रहमान: निर्वासन से प्रधानमंत्री पद की ओर
खालिदा जिया के उत्तराधिकारी तारिक रहमान के लिए यह जीत निजी तौर पर भी बहुत बड़ी है। लंबे समय तक लंदन में निर्वासन में रहने के बाद, अब उनका बांग्लादेश का प्रधानमंत्री बनना लगभग तय हो गया है। उनकी वापसी को बांग्लादेश की राजनीति में ‘जिया परिवार’ के पुनरुत्थान के रूप में देखा जा रहा है। रहमान ने अपनी जीत को “लोकतंत्र की जीत” करार दिया है।
भारत की ‘वेट एंड वॉच’ नीति: नई दिल्ली के लिए क्या हैं चुनौतियां?
बांग्लादेश में इस सत्ता परिवर्तन पर भारत सरकार बहुत बारीकी से नजर रख रही है। शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंध अपने स्वर्णिम युग में थे। अब बीएनपी की वापसी और जमात जैसे कट्टरपंथी संगठनों की सक्रियता भारत के लिए कूटनीतिक चिंताएं पैदा कर सकती है।
प्रमुख चिंता के बिंदु:
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अल्पसंख्यकों की सुरक्षा: भारत ने हाल के महीनों में बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों की कड़ी निंदा की है। नई सरकार इन हमलों को रोकने में कितनी प्रभावी होगी, यह भारत के लिए प्राथमिकता है।
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चीन-पाकिस्तान का प्रभाव: ऐसी चर्चाएं हैं कि हसीना के हटने के बाद बांग्लादेश की निकटता चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ सकती है। भारत नहीं चाहेगा कि उसके पड़ोस में चीन का हस्तक्षेप और अधिक बढ़े।
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सीमा सुरक्षा और उग्रवाद: बीएनपी के पुराने रिकॉर्ड को देखते हुए, भारत को अपनी उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर सुरक्षा और उग्रवाद को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी होगी।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने एक बयान में कहा, “बांग्लादेश में चुनाव प्रक्रिया चल रही है। हमें पूर्ण जनादेश और आधिकारिक नतीजों का इंतजार करना चाहिए। उसके बाद ही हम वहां मौजूद मुद्दों और संबंधों के भविष्य पर गौर करेंगे।”
आर्थिक स्थिरता और आंतरिक शांति: नई सरकार के सामने बड़ी चुनौती
जीत के जश्न के बीच तारिक रहमान के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। आंदोलन के बाद पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था को संभालना, महंगाई पर काबू पाना और देश में कानून-व्यवस्था को पुनः स्थापित करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी। इसके अलावा, शेख हसीना के समर्थकों और विपक्षी दलों के बीच बढ़ती ध्रुवीकरण की खाई को पाटना भी एक मुश्किल कार्य होगा।
बीएनपी कार्यालयों के बाहर रात भर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा रहा, जो इस बदलाव को एक ‘नई सुबह’ की तरह देख रहे हैं। अब देखना यह होगा कि तारिक रहमान अपने चुनावी वादों को कितनी जल्दी धरातल पर उतार पाते हैं।


