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स्टोन क्रशर संचालकों को बड़ी राहत: नैनीताल हाईकोर्ट ने भीमावाला यूनिट से हटाई रोक, रिपोर्ट में प्रदूषण स्तर मिला सामान्य

The Hill India News
Last updated: April 27, 2026 2:33 pm
The Hill India News
Published: April 27, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड के विकासनगर क्षेत्र में स्टोन क्रशर संचालन को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में नैनीताल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। माननीय मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने विकासनगर के भीमावाला में स्थित ‘साईं कृपा स्टोन क्रशर यूनिट’ के संचालन पर लगी अंतरिम रोक को तत्काल प्रभाव से हटा दिया है। न्यायालय का यह आदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और विशेषज्ञ समितियों की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें क्रशर यूनिट को पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप पाया गया है।

Contents
क्या था विवाद: आबादी और स्कूल के करीब होने का आरोपसुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा मामला और विशेषज्ञ जांचअदालत की टिप्पणी और अंतरिम आदेश का निरस्तीकरणविकास बनाम पर्यावरण: एक नई बहसअगली सुनवाई और भविष्य की राह

क्या था विवाद: आबादी और स्कूल के करीब होने का आरोप

इस मामले की शुरुआत स्कंद कुमार सिंह द्वारा दायर एक जनहित याचिका से हुई थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि भीमावाला में स्थापित यह स्टोन क्रशर यूनिट नियमों को ताक पर रखकर घनी आबादी के बीच बनाई गई है। याचिका में दावा किया गया था कि यूनिट के 200 मीटर के दायरे में सरकारी इंटर कॉलेज, आंगनवाड़ी केंद्र और ग्राम पंचायत कार्यालय स्थित हैं।

याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के जुलाई 2023 के दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसी संवेदनशील जगहों के इतने करीब क्रशर का संचालन स्कूली बच्चों और स्थानीय निवासियों के स्वास्थ्य के लिए घातक साबित होगा। इन दलीलों को प्रारंभिक तौर पर गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने 25 जुलाई 2025 को क्रशर के निर्माण और संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा मामला और विशेषज्ञ जांच

हाईकोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद क्रशर स्वामी ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सर्वोच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया था कि वह जल्द से जल्द सुनवाई कर उचित आदेश पारित करे।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद नैनीताल हाईकोर्ट ने मामले की गहराई से जांच के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और विशेषज्ञ समितियों को स्थल निरीक्षण के निर्देश दिए। नैनीताल हाईकोर्ट स्टोन क्रशर फैसला इसी वैज्ञानिक जांच और डेटा विश्लेषण पर आधारित है।

निरीक्षण रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:

  • वायु और ध्वनि गुणवत्ता: 16 से 18 फरवरी 2026 के बीच तीन सदस्यीय समिति ने गहन परीक्षण किया। रिपोर्ट में पाया गया कि क्रशर यूनिट की उत्पादन क्षमता, वायु गुणवत्ता और ध्वनि स्तर सभी निर्धारित मानकों के भीतर हैं।

  • ट्रायल रन के परिणाम: विशेषज्ञों की मौजूदगी में किए गए ट्रायल रन के दौरान भी प्रदूषण का स्तर सुरक्षित सीमा में पाया गया।

  • नियमों का अनुपालन: यह भी पाया गया कि यूनिट को वर्ष 2024 में लीज और 2025 में संचालन की विधिवत अनुमति मिल चुकी थी।

अदालत की टिप्पणी और अंतरिम आदेश का निरस्तीकरण

सुनवाई के दौरान क्रशर स्वामी की ओर से तर्क दिया गया कि यह याचिका दायर होने से पहले ही यूनिट सुचारू रूप से कार्य कर रही थी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि सीपीसीबी के दिशा-निर्देश सुझावपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन हर स्थिति में वे बाध्यकारी नहीं हैं, खासकर तब जब राज्य सरकार के अपने मानक और अनुमतियां मौजूद हों।

सभी पक्षों की दलीलों और वैज्ञानिक साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए खंडपीठ ने माना कि अब इस अंतरिम रोक को जारी रखने का कोई ठोस वैधानिक या पर्यावरणीय आधार नहीं रह गया है। इसी के साथ अदालत ने 25 जुलाई 2025 के अपने पूर्ववर्ती आदेश को निरस्त कर दिया।

विकास बनाम पर्यावरण: एक नई बहस

यह मामला एक बार फिर उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस को तेज करता है। जहाँ एक ओर स्थानीय निवासी स्वास्थ्य और शांति की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर औद्योगिक इकाइयों का तर्क है कि वे सभी सरकारी मानकों और निवेश नियमों का पालन कर रही हैं। नैनीताल हाईकोर्ट स्टोन क्रशर फैसला उन उद्योगों के लिए एक नजीर साबित हो सकता है जो तकनीकी और पर्यावरणीय मानकों पर खरे उतरते हैं।

अगली सुनवाई और भविष्य की राह

भले ही साईं कृपा स्टोन क्रशर को फिलहाल बड़ी राहत मिल गई है और वह अपना संचालन शुरू कर सकता है, लेकिन कानूनी प्रक्रिया अभी समाप्त नहीं हुई है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 4 मई 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह को निर्धारित किया है।

आगामी सुनवाई में यह देखा जाएगा कि क्या याचिकाकर्ता विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए कोई नया साक्ष्य पेश कर पाते हैं या नहीं। फिलहाल, विकासनगर के औद्योगिक गलियारे में इस फैसले का स्वागत किया जा रहा है, जबकि स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसे चुनौती देने के अगले विकल्पों पर विचार करना शुरू कर दिया है।

नैनीताल हाईकोर्ट का यह निर्णय वैज्ञानिक साक्ष्यों की प्रधानता को दर्शाता है। यह स्पष्ट करता है कि किसी भी औद्योगिक इकाई पर केवल आरोपों के आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती, यदि वह निर्धारित पर्यावरणीय मानकों (Parameters) के भीतर कार्य कर रही हो। अब सबकी नजरें मई में होने वाली अंतिम सुनवाई पर टिकी हैं।

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