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मिडिल ईस्ट संकट पर कमलनाथ और आनंद शर्मा ने थामी सरकार की राह, पार्टी लाइन से हटे दिग्गज

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर जब देश की एकता और कूटनीति की बात आती है, तो अक्सर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच एक महीन रेखा होती है। लेकिन वर्तमान में मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में जारी भीषण युद्ध और अस्थिरता के बीच देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी, कांग्रेस के भीतर एक दिलचस्प और विरोधाभासी स्थिति उत्पन्न हो गई है। पार्टी के दो कद्दावर नेताओं—मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व केंद्रीय विदेश मंत्री आनंद शर्मा—ने केंद्र की एनडीए सरकार के कूटनीतिक दृष्टिकोण का खुला समर्थन कर अपनी ही पार्टी को असहज कर दिया है। Congress Party Split Opinion की यह स्थिति तब सामने आई है जब कांग्रेस आलाकमान इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा था।

आनंद शर्मा की ‘ट्विटर कूटनीति’: 11 पोस्ट में सरकार की सराहना

यूपीए सरकार के दौरान भारत की विदेश नीति की कमान संभालने वाले आनंद शर्मा का अनुभव संदेह से परे है। हाल ही में उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक के बाद एक 11 पोस्ट लिखकर मिडिल ईस्ट संकट पर भारत सरकार के रुख की जमकर तारीफ की। आनंद शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस अप्रत्याशित और अस्थिर वैश्विक स्थिति में भारत के कूटनीतिक प्रयास “परिपक्व और कुशल” रहे हैं।

उन्होंने लिखा कि संभावित जोखिमों से बचते हुए जिस तरह से सरकार ने कदम उठाए हैं, वह राष्ट्रीय सहमति और दृढ़ संकल्प का परिचायक है। शर्मा ने विशेष रूप से सरकार द्वारा आयोजित ‘सर्वदलीय बैठक’ का स्वागत किया, जिसमें नीतिगत निर्णयों के बारे में सभी राजनीतिक दलों को अवगत कराया गया था। उनके अनुसार, फारस (ईरान) और अन्य अरब देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक व सभ्यतागत संबंधों को देखते हुए राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होना चाहिए।

कमलनाथ का दो-टूक बयान: ‘नहीं है एलपीजी का कोई संकट’

वहीं दूसरी ओर, मध्य प्रदेश की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले कमलनाथ ने भी पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाया है। आमतौर पर विपक्ष सरकार पर वैश्विक युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई और ईंधन संकट का आरोप लगाता है, लेकिन कमलनाथ ने साफ तौर पर कहा कि देश में एलपीजी (रसोई गैस) का कोई संकट नहीं है। उनका यह बयान सीधे तौर पर सरकार के आपदा प्रबंधन को क्लीन चिट देता नजर आ रहा है, जो कांग्रेस के उन दावों के विपरीत है जिसमें सरकार पर आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को संभालने में विफल रहने का आरोप लगाया जा रहा था।

पुरानी यादें: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और थरूर-तिवारी का विवाद

यह पहली बार नहीं है जब Congress Party Split Opinion की वजह से पार्टी नेतृत्व को अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ा हो। इससे पहले शशि थरूर और मनीष तिवारी जैसे बौद्धिक नेताओं ने भी मिडिल ईस्ट के मुद्दे पर पार्टी के आधिकारिक स्टैंड से हटकर टिप्पणी की थी।

याद दिला दें कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के मामले में भी इन दोनों नेताओं के बयानों ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं, जिसके बाद कांग्रेस ने संसद में इस मुद्दे पर हुई बहस के दौरान थरूर और तिवारी को बोलने के अवसर से दरकिनार कर दिया था। अब कमलनाथ और आनंद शर्मा जैसे दिग्गजों का यह बदला हुआ सुर पार्टी के भीतर एक नई बहस को जन्म दे रहा है।

राष्ट्रीय हित बनाम दलीय राजनीति: कूटनीति की नई परिभाषा

आनंद शर्मा ने अपने लेखों में इस बात पर जोर दिया कि “राष्ट्रीय संवाद जारी रहना चाहिए।” उन्होंने कहा कि ऊर्जा संकट, भारतीयों के हित और ऐतिहासिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना कोई आसान काम नहीं है। सरकार की सराहना करते हुए उन्होंने संकेत दिया कि वैश्विक संकट के समय विपक्ष को केवल विरोध के लिए विरोध करने के बजाय राष्ट्रीय एकता का परिचय देना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि आनंद शर्मा और कमलनाथ के ये बयान कांग्रेस के भीतर ‘जी-23’ (असंतुष्ट गुट) की उस विचारधारा का विस्तार हो सकते हैं, जो अक्सर राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मुद्दों पर सरकार के साथ खड़े रहने की वकालत करते रहे हैं।

पार्टी की चुप्पी और नेतृत्व के सामने चुनौती

फिलहाल, कांग्रेस आलाकमान ने इन दोनों नेताओं की टिप्पणियों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। पार्टी के भीतर एक धड़ा इसे “नेताओं की व्यक्तिगत राय” बताकर टालने की कोशिश कर रहा है, जबकि दूसरा धड़ा इसे अनुशासनहीनता के रूप में देख रहा है। Congress Party Split Opinion की वजह से बीजेपी को कांग्रेस पर हमला करने का एक नया हथियार मिल गया है। बीजेपी के प्रवक्ताओं का कहना है कि जब कांग्रेस के अपने अनुभवी विदेश मंत्री सरकार की तारीफ कर रहे हैं, तो राहुल गांधी और अन्य नेताओं का विरोध केवल राजनीति से प्रेरित है।

मिडिल ईस्ट का युद्ध केवल भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, इसके आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव भारत की दहलीज तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में कमलनाथ और आनंद शर्मा का रुख यह दर्शाता है कि कांग्रेस के भीतर अनुभवी नेताओं का एक वर्ग अब भी “देश पहले” की नीति में विश्वास रखता है। हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व इन ‘बगावती’ लेकिन ‘तार्किक’ सुरों को कैसे शांत करता है या क्या पार्टी अपनी आधिकारिक नीति में कोई बदलाव करेगी।

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