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आईएसआईएस से जुड़े आरोपी को सुप्रीम कोर्ट से जमानत नहीं, अदालत बोली – “देश में आतंक का घेरा बनाने की साजिश”

लाल किला धमाके के एक दिन बाद सुनवाई, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने कहा – "यह संदेश देने का सबसे उपयुक्त समय"

नयी दिल्ली, 11 नवंबर (भाषा): उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को प्रतिबंधित आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) से कथित रूप से जुड़े एक व्यक्ति को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि उस पर ‘‘देश में आतंक का घेरा बनाने के प्रयास’’ का गंभीर आरोप है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक संयम और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के बीच संतुलन जरूरी है, लेकिन जब मामला आतंकी संगठन से जुड़ा हो, तो न्यायालय को ‘राष्ट्रहित’ को सर्वोपरि रखना चाहिए।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब दिल्ली में लाल किले के पास हुए भीषण विस्फोट ने देश को झकझोर दिया है। सोमवार शाम हुए इस विस्फोट में अब तक कम से कम 12 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 30 से अधिक घायल बताए जा रहे हैं।


‘देश में आतंक का नेटवर्क फैलाने की साजिश’

जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि आरोपी के खिलाफ आरोप अत्यंत गंभीर हैं। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा —

“अभियुक्त पर न केवल एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन से जुड़ने का संदेह है, बल्कि उस पर देश के भीतर आतंक फैलाने और अस्थिरता पैदा करने के प्रयास का भी आरोप है। ऐसे मामलों में अदालत को सतर्क रहना होगा, ताकि गलत संदेश न जाए।”

पीठ ने आगे कहा कि अदालत के समक्ष रखे गए साक्ष्यों और जांच एजेंसियों की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि आरोपी के संपर्क आईएसआईएस मॉड्यूल से जुड़े कई व्यक्तियों के साथ पाए गए हैं।


लाल किला विस्फोट के बाद सख्त रुख

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, जब राजधानी दिल्ली हाल ही में हुए आतंकी धमाके से उबरने की कोशिश कर रही है, “यह न्यायपालिका के लिए राष्ट्रहित में सख्त संदेश देने का समय है।”

न्यायमूर्ति नाथ ने टिप्पणी की —

“यह समय है जब हमें स्पष्ट रूप से दिखाना होगा कि कानून और संविधान के खिलाफ हिंसा या आतंक फैलाने की कोशिशों को किसी भी स्थिति में सहन नहीं किया जाएगा।”

पीठ ने कहा कि जमानत का अर्थ स्वतंत्रता है, लेकिन जब स्वतंत्रता का उपयोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता है, तो अदालत को कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं।


राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की भूमिका

यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की जांच के अधीन है। एजेंसी ने अपने जवाब में बताया कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद उसके पास से आपत्तिजनक दस्तावेज, डिजिटल डिवाइस और आईएसआईएस के प्रचार से जुड़ी सामग्री बरामद की गई थी।

NIA ने अदालत को सूचित किया कि आरोपी सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड चैटिंग प्लेटफॉर्म्स के ज़रिये संगठन के सक्रिय सदस्यों के संपर्क में था और युवाओं को चरमपंथी गतिविधियों के लिए प्रेरित करने की कोशिश कर रहा था।

एजेंसी ने कहा कि आरोपी का नेटवर्क कई राज्यों तक फैला हुआ था और हाल ही में गिरफ्तार किए गए फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल से भी उसके संबंध के संकेत मिले हैं।


जमानत याचिका में क्या कहा गया

आरोपी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि आरोपी को गलत तरीके से फंसाया गया है और अब तक कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं मिला है जिससे यह सिद्ध हो कि उसने किसी आतंकी कार्रवाई में भाग लिया हो।

वकील ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने केवल “ऑनलाइन संपर्क और डिजिटल गतिविधि” के आधार पर आरोपी को आईएसआईएस से जोड़ दिया है। उन्होंने तर्क दिया कि “किसी विचारधारा से सहानुभूति रखना” और “आतंकी गतिविधियों में शामिल होना” दो अलग बातें हैं।

हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि प्रस्तुत साक्ष्य और बरामद सामग्री आरोपी के गहरे संपर्क और संभावित भूमिका की ओर इशारा करते हैं।


अदालत ने कहा – ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि’

अपने आदेश में न्यायमूर्ति मेहता ने कहा —

“राष्ट्र की सुरक्षा और नागरिकों की शांति से बड़ा कोई मौलिक अधिकार नहीं हो सकता। जब भी अदालत के समक्ष आतंक से जुड़े गंभीर आरोप हों, तो संविधान के अनुच्छेद 21 की व्याख्या उसी संदर्भ में करनी होगी।”

पीठ ने यह भी कहा कि न्यायपालिका आतंकवाद से निपटने में कानून प्रवर्तन एजेंसियों की वैध कार्रवाई में बाधा नहीं बन सकती।


कड़ी निगरानी में जांच जारी

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि जांच एजेंसियां अभी भी आरोपी के संपर्कों और डिजिटल ट्रेल की जांच कर रही हैं। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि आरोपी ने देश के कई हिस्सों में कुछ युवाओं से संपर्क साधा था, जिनमें से कुछ दिल्ली, केरल और जम्मू-कश्मीर से हैं।

एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि क्या आरोपी की भूमिका हाल के लाल किला धमाके से किसी रूप में जुड़ी हुई थी।


केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि देश के विभिन्न हिस्सों में आईएसआईएस मॉड्यूल की गतिविधियों को लेकर लगातार कार्रवाई की जा रही है। उन्होंने कहा कि जमानत पर रिहा किया गया कोई भी व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।

सरकार ने कहा कि आईएसआईएस जैसे संगठन विचारधारा के स्तर पर लोगों को प्रभावित कर उन्हें आतंकी गतिविधियों में धकेलते हैं। ऐसे मामलों में मामूली ढिलाई भी बड़े परिणाम ला सकती है।


पीठ का निष्कर्ष

अदालत ने कहा कि आरोपी को फिलहाल किसी भी प्रकार की राहत नहीं दी जा सकती और उसे न्यायिक हिरासत में रहना होगा। साथ ही, न्यायालय ने NIA को जांच की प्रगति रिपोर्ट हर तीन महीने में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।

पीठ ने कहा —

“अभियुक्त को जमानत देना इस समय न्याय के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अनुचित होगा। अदालत को इस प्रकार के अपराधों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी होगी।”


लाल किला धमाके की छाया में सुनवाई

इस पूरे मामले में एक खास बात यह रही कि सुनवाई ठीक एक दिन बाद हुई जब दिल्ली के लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास आई20 कार में विस्फोट हुआ था। उस धमाके में 12 लोगों की मौत और कई घायल हुए थे। प्रारंभिक जांच में पता चला कि इस धमाके के तार भी आईएसआईएस समर्थक समूहों से जुड़े हो सकते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का यह निर्णय न केवल इस केस तक सीमित रहेगा, बल्कि आने वाले समय में आतंकवाद से संबंधित मामलों में न्यायपालिका की नीति को भी प्रभावित करेगा।

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