नई दिल्ली। तमिलनाडु में चल रही SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुचारू संचालन सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए। याचिकाओं में भारत का सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया गया था कि मतदाता सूची से जुड़ी SIR प्रक्रिया में चुनाव आयोग की ओर से कथित अनियमितताएं बरती जा रही हैं।
इन आरोपों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र की बुनियाद मतदाता सूची की शुद्धता और पारदर्शिता पर टिकी होती है। ऐसे में इस प्रक्रिया को न केवल निष्पक्ष, बल्कि आम जनता के लिए सुलभ और समझने योग्य बनाना बेहद जरूरी है।
लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी लिस्ट सार्वजनिक करने के निर्देश
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी लिस्ट में शामिल लोगों के नाम सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह सूची ग्राम पंचायत भवनों, प्रत्येक सब-डिवीजन के तालुका कार्यालयों और शहरी क्षेत्रों में संबंधित वार्ड कार्यालयों में स्पष्ट रूप से लगाई जाए, ताकि प्रभावित मतदाताओं को समय रहते जानकारी मिल सके।
कोर्ट का मानना है कि इस तरह की सार्वजनिक सूचना व्यवस्था से लोगों को अपनी स्थिति समझने और समय पर आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलेगा। इससे चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर भरोसा भी मजबूत होगा।
जिला कलेक्टरों को विशेष जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि वे भारत का चुनाव आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करें। अदालत ने कहा कि SIR प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों की तैनाती सुनिश्चित की जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक स्तर पर किसी भी तरह की लापरवाही लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, इसलिए जिला प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के पुलिस प्रमुखों को भी सख्त निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि तमिलनाडु के डीजीपी और संबंधित पुलिस कमिश्नर यह सुनिश्चित करें कि SIR प्रक्रिया के दौरान कहीं भी कानून और व्यवस्था की स्थिति न बिगड़े। कोर्ट के अनुसार, मतदाता सूची से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता बनी रहती है, ऐसे में किसी भी प्रकार की अव्यवस्था या टकराव से बचना आवश्यक है।
अदालत ने साफ कहा कि पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण तरीके से पूरी होनी चाहिए, ताकि आम नागरिक बिना डर या दबाव के अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकें।
SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
SIR प्रक्रिया को लेकर अदालत ने विस्तृत दिशा-निर्देश जारी करते हुए कहा कि जिन लोगों के नाम लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी लिस्ट में शामिल हैं, उन्हें पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सूची प्रदर्शित किए जाने के 10 दिनों के भीतर संबंधित व्यक्ति स्वयं या अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से आवश्यक दस्तावेज जमा कर सकते हैं।
इसके साथ ही अदालत ने कहा कि लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी लिस्ट में शामिल प्रत्येक नाम के सामने विसंगति का संक्षिप्त कारण भी लिखा जाना चाहिए, ताकि संबंधित व्यक्ति यह समझ सके कि उसके नाम को लेकर क्या आपत्ति है। आपत्तियां और दस्तावेज सब-डिवीजन स्तर के कार्यालयों में जमा किए जा सकेंगे।
CJI जस्टिस सूर्यकांत के निर्देश
इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट को उम्मीद है कि जहां-जहां SIR प्रक्रिया चल रही है, वहां चुनाव आयोग इन सभी निर्देशों का पूरी तरह पालन सुनिश्चित करेगा। उन्होंने कहा कि यह केवल तमिलनाडु तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि देशभर में चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल है।
CJI ने विशेष रूप से राज्य पुलिस प्रशासन की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि तमिलनाडु के डीजीपी और पुलिस कमिश्नर यह सुनिश्चित करें कि पूरी प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार की कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न न हो। उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है और इसे शांतिपूर्ण व पारदर्शी तरीके से पूरा किया जाना चाहिए।
याचिकाओं का पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि तमिलनाडु में चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर कुछ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि मतदाता सूची में नामों को लेकर पारदर्शिता की कमी है और कई मामलों में लोगों को बिना पर्याप्त सूचना के लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी लिस्ट में शामिल कर दिया गया है। इसे संविधान के तहत मिले मताधिकार का उल्लंघन बताया गया।
लोकतंत्र और मतदाता अधिकारों पर असर
सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन आदेशों का सही तरीके से पालन होता है, तो इससे मतदाता सूची की शुद्धता बढ़ेगी और आम नागरिकों का चुनावी व्यवस्था पर भरोसा और मजबूत होगा।
अब इस मामले में निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को किस तरह जमीन पर लागू करते हैं। आने वाले दिनों में SIR प्रक्रिया के सुचारू संचालन और पारदर्शिता को लेकर यह फैसला एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।



