फीचर्डविदेश

ईस्टर ‘चमत्कार’ से जंग तक: Donald Trump कैसे दे रहे US-ईरान तनाव को धार्मिक रंग?

Donald Trump द्वारा हाल ही में दिए गए बयानों ने अमेरिका-ईरान संघर्ष को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। एक ओर जहां यह जंग सैन्य और रणनीतिक मुद्दों पर आधारित मानी जा रही थी, वहीं अब इसमें धार्मिक रंग भी जुड़ता दिखाई दे रहा है। ट्रंप ने ईरान में एक अमेरिकी पायलट के रेस्क्यू ऑपरेशन को “ईस्टर का चमत्कार” बताया, जिससे यह संकेत गया कि वे सैन्य कार्रवाई को धार्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहे हैं।

आलोचकों का कहना है कि इस तरह की भाषा न केवल युद्ध को वैचारिक रूप से प्रभावित करती है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में धर्म और सत्ता के बीच की सीमाओं को भी धुंधला करती है। अमेरिका जैसे देश में, जहां संविधान धर्म और राज्य को अलग रखने की बात करता है, वहां इस तरह के बयान गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं।

इसके साथ ही ट्रंप द्वारा ईरान को धमकी देते हुए “अल्लाह की जय हो” जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी विवाद का कारण बना है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह दो अलग-अलग धार्मिक प्रतीकों का एक साथ उपयोग कर युद्ध को एक ‘नैरेटिव’ देने की कोशिश हो सकती है, जो राजनीतिक रूप से लाभकारी हो लेकिन सामाजिक रूप से खतरनाक साबित हो सकता है।

बाइबिल की भविष्यवाणियां और सैन्य रणनीति—क्या है पूरा मामला?
Bible में वर्णित “अंतिम समय” या “कयामत” की भविष्यवाणियों का जिक्र इस विवाद के केंद्र में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका के कुछ सैन्य कमांडरों पर आरोप लगा है कि वे ईरान के खिलाफ युद्ध को सही ठहराने के लिए इन धार्मिक भविष्यवाणियों का हवाला दे रहे हैं।

इन भविष्यवाणियों का उल्लेख खास तौर पर Book of Revelation में मिलता है, जिसमें दुनिया के अंत से पहले बड़े युद्ध, आपदाओं और एक “एंटीक्राइस्ट” के उदय की बात कही गई है। कुछ कट्टर धार्मिक समूह इन भविष्यवाणियों को वर्तमान वैश्विक घटनाओं से जोड़कर देखते हैं और मानते हैं कि दुनिया एक निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है।

इसी मुद्दे पर अमेरिका के 30 डेमोक्रेटिक सांसदों ने रक्षा विभाग से जांच की मांग की है। उनका कहना है कि सैन्य फैसले तथ्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर होने चाहिए, न कि धार्मिक विश्वासों या भविष्यवाणियों पर। सांसदों ने चेतावनी दी कि अगर सेना के भीतर इस तरह की सोच को बढ़ावा दिया गया, तो यह न केवल सैनिकों की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी युद्ध को “दैवीय योजना” या “धार्मिक कर्तव्य” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे संघर्ष और भी जटिल हो जाता है। इससे दोनों पक्षों में कट्टरता बढ़ सकती है और शांति की संभावनाएं कमजोर पड़ सकती हैं।


अमेरिका ही नहीं, ईरान पर भी धार्मिक भाषा के इस्तेमाल के आरोप
Iran भी लंबे समय से अपनी राजनीतिक और सैन्य रणनीति में धार्मिक भाषा का इस्तेमाल करता रहा है। ईरान की शासन व्यवस्था शिया इस्लाम पर आधारित है और वहां अक्सर अमेरिका को “ग्रेट शैतान” कहा जाता है।

ईरानी सैन्य प्रचार में मारे गए सैनिकों को “शहीद” का दर्जा दिया जाता है और संघर्ष को धार्मिक कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस तरह दोनों पक्षों द्वारा धार्मिक प्रतीकों और भाषा का इस्तेमाल इस युद्ध को और अधिक संवेदनशील बना रहा है।

ट्रंप के हालिया बयानों की आलोचना सिर्फ अमेरिका में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रही है। Council on American-Islamic Relations (CAIR) ने इसे “खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना” बताया है। संगठन का कहना है कि धार्मिक शब्दों का इस तरह इस्तेमाल न केवल एक धर्म का अपमान है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर धार्मिक तनाव को भी बढ़ा सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब दोनों पक्ष अपने-अपने धार्मिक नैरेटिव के साथ युद्ध को पेश करते हैं, तो यह संघर्ष केवल भू-राजनीतिक नहीं रह जाता, बल्कि एक वैचारिक और धार्मिक टकराव का रूप ले लेता है। ऐसे में शांति वार्ता और कूटनीतिक समाधान की राह और भी कठिन हो जाती है।

अंततः, यह सवाल अहम हो जाता है कि क्या आधुनिक युद्धों में धर्म का इस्तेमाल एक रणनीतिक उपकरण बनता जा रहा है? और अगर ऐसा है, तो इसका वैश्विक शांति और सामाजिक सद्भाव पर क्या असर पड़ेगा—यह आने वाले समय में दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा हो सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button