
थराली (चमोली): देवभूमि उत्तराखंड के जंगलों में आग (Uttarakhand Forest Fire) का तांडव थमने का नाम नहीं ले रहा है। चमोली जनपद के थराली क्षेत्र के अंतर्गत बदरीनाथ वन प्रभाग की मध्य पिंडर रेंज इस समय भीषण आग की चपेट में है। चेपड़ों और सौगांव के जंगलों से शुरू हुई यह आग अब विकराल रूप धारण कर खाड़ीबगड़, जूनिधार और गोठिंडा के विस्तृत वन क्षेत्रों तक फैल गई है। इस आपदा ने न केवल करोड़ों की वन संपदा को राख कर दिया है, बल्कि अब रिहायशी इलाकों और गौशालाओं पर भी अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है।
रिहायशी इलाकों की ओर बढ़ती लपटें और बढ़ता खतरा
थराली के जंगलों में आग इतनी भयावह है कि इसकी लपटें कई फीट ऊंची उठ रही हैं। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, चेपड़ों गांव के समीप स्थित गौशालाएं अब सीधे तौर पर आग की जद में आ गई हैं। ग्रामीण भयभीत हैं और अपनी संपत्ति व मवेशियों को बचाने की जुगत में लगे हैं। आग की लपटें पहाड़ी के ऊपरी छोर पर स्थित जूनिधार गांव तक पहुंच गई हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल है।
हाईवे पर गिरते पत्थर और जलते पेड़: राहगीर जोखिम में
वनाग्नि का असर अब यातायात और सार्वजनिक सुरक्षा पर भी दिखने लगा है। थराली-देवाल स्टेट हाईवे पर आग के कारण जलते हुए पेड़ और पहाड़ियों से टूटकर गिरते पत्थर राहगीरों और वाहन चालकों के लिए काल बन रहे हैं। प्रशासन ने इस मार्ग पर यात्रा करने वाले लोगों को बेहद सतर्क रहने की सलाह दी है। धुएं के गुबार के कारण दृश्यता (Visibility) कम हो गई है, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ गई है।
लाचार सिस्टम और भौगोलिक चुनौतियां
घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम और अग्निशमन कर्मचारी मौके पर पहुंच गए हैं, लेकिन भौगोलिक परिस्थितियां बाधा बनी हुई हैं। मध्य पिंडर रेंज के वन क्षेत्राधिकारी मनोज देवराड़ी ने बताया कि:
“हमारी टीमें पूरी निष्ठा से आग बुझाने में जुटी हैं, लेकिन खड़ी चट्टानें और घने चीड़ के जंगल ऑपरेशन को कठिन बना रहे हैं। रात के समय पत्थरों के गिरने और गहरी खाई होने के कारण कर्मचारियों के जीवन पर भी खतरा बना रहता है।”
चीड़ के जंगलों में गिरने वाली सूखी पत्तियां (पिरुल) ईंधन का काम कर रही हैं, जिससे आग बुझने के बजाय और तेजी से फैल रही है।
पारिस्थितिकी तंत्र और जनस्वास्थ्य पर गहरा आघात
इस आग ने क्षेत्र की बहुमूल्य वनस्पतियों और वन्यजीवों को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। कई हेक्टेयर जंगल पूरी तरह जलकर खाक हो चुके हैं। जंगलों में रहने वाले दुर्लभ जीव-जंतु अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं, तो कई इस भीषण गर्मी में दम तोड़ चुके हैं।
पर्यावरण के साथ-साथ स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। पूरे थराली और आसपास के क्षेत्रों में धुंध की एक मोटी चादर बिछ गई है। वातावरण में बढ़ते प्रदूषण के कारण स्थानीय निवासियों, विशेषकर बुजुर्गों और बच्चों में आंखों में जलन और श्वसन संबंधी समस्याएं (Respiratory issues) देखी जा रही हैं।
शरारती तत्वों पर वन विभाग की पैनी नजर
वन विभाग ने इस आग के पीछे मानवीय लापरवाही या शरारती तत्वों का हाथ होने की आशंका जताई है। अक्सर घास उगाने के लालच में या अन्य कारणों से जंगलों में आग लगा दी जाती है। वन क्षेत्राधिकारी ने स्पष्ट किया है कि आग लगने के कारणों की गहन पड़ताल की जा रही है और यदि कोई व्यक्ति दोषी पाया गया, तो उसके विरुद्ध भारतीय वन अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
स्थानीय स्तर पर बढ़ता आक्रोश
क्षेत्रीय जनता का कहना है कि वनाग्नि की घटनाएं हर साल होती हैं, लेकिन सरकार और विभाग के पास इससे निपटने के लिए कोई ठोस आधुनिक तंत्र नहीं है। केवल झाड़ियों से आग बुझाने की परंपरागत तकनीक इतने बड़े स्तर की आग पर काबू पाने के लिए नाकाफी है। ग्रामीणों ने मांग की है कि प्रभावित क्षेत्रों में हवाई छिड़काव या अन्य आधुनिक संसाधनों का प्रयोग किया जाए ताकि गांवों को जलने से बचाया जा सके।
थराली के जंगलों की यह आग केवल पेड़ों का जलना नहीं है, बल्कि यह हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक बड़ा अलार्म है। यदि समय रहते मध्य पिंडर रेंज की इस आग पर पूरी तरह काबू नहीं पाया गया, तो नुकसान का आंकड़ा और भी भयावह हो सकता है। फिलहाल, वन विभाग के जांबाज कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालकर आग पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहे हैं।



