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देश में दवा सुरक्षा पर खतरा: सीडीएससीओ में आधे दवा निरीक्षकों के पद खाली, आरटीआई से हुआ खुलासा

The Hill India News
Last updated: October 31, 2025 12:54 pm
The Hill India News
Published: October 31, 2025
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नई दिल्ली: देशभर में दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी जिस संस्था पर है — केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) — वहीं अब यह संस्था खुद जनशक्ति के गंभीर अभाव से जूझ रही है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली एक ताजा जानकारी से खुलासा हुआ है कि संगठन में दवा निरीक्षकों (Drug Inspectors) के करीब 50 प्रतिशत पद अभी भी खाली हैं।

Contents
आरटीआई से खुली स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था की पोलराज्यवार दवा निरीक्षक पदों की स्थिति (CDSCO/राज्य औषधि नियंत्रण विभाग)मध्य प्रदेश कफ सिरप कांड के बाद बढ़े सवालसीडीएससीओ क्या करता है और क्यों अहम है इसकी भूमिकाएक निरीक्षक पर कई जिलों का भार‘गुणवत्ता पर भरोसा’ अब वैश्विक चिंता का विषयकेंद्र की दलील: भर्ती प्रक्रिया जारीराज्यों में भी गंभीर कमीदवा सुरक्षा पर निगरानी का ढांचा फिर से बनाने की जरूरतआगे की राह

यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब हाल के वर्षों में देश में खराब गुणवत्ता वाली दवाओं (Substandard Drugs) को लेकर कई राज्यों में गंभीर घटनाएँ सामने आई हैं — जिनमें बच्चों की मौत, नकली कफ सिरप कांड, और निर्यातित दवाओं की गुणवत्ता पर अंतरराष्ट्रीय सवाल शामिल हैं।


आरटीआई से खुली स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल

आरटीआई के तहत केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) से मांगी गई जानकारी के जवाब में सामने आया कि संस्था के पास जितने दवा निरीक्षकों की जरूरत है, उनमें से आधे से भी कम मैदान में कार्यरत हैं।

सूत्रों के अनुसार, देशभर में लगभग 50 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं, जिससे न केवल जांच की गति प्रभावित हो रही है, बल्कि गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी तंत्र भी कमजोर पड़ा है।

संगठन के पास कुल स्वीकृत निरीक्षक पदों की संख्या कई राज्यों की आबादी और औद्योगिक क्षमता के हिसाब से अपर्याप्त बताई जा रही है। इसके ऊपर से आधे पद खाली होने से प्रति निरीक्षक पर औसतन दर्जनों जिलों की जिम्मेदारी आ जाती है।


राज्यवार दवा निरीक्षक पदों की स्थिति (CDSCO/राज्य औषधि नियंत्रण विभाग)

क्रमांक राज्य / केंद्रशासित प्रदेश भरे हुए पद कुल स्वीकृत पद रिक्त पद पद पूर्ति प्रतिशत (%)
1 हिमाचल प्रदेश 39 44 5 88.6%
2 गुजरात 100 150 50 66.7%
3 महाराष्ट्र 50 200 150 25.0%
4 झारखंड 12 42 30 28.6%
5 पश्चिम बंगाल 80 140 60 57.1%
6 उत्तर प्रदेश 70 110 40 63.6%
7 कर्नाटक 8 112 104 7.1%
8 बिहार 130 163 33 79.8%
9 मध्य प्रदेश 80 96 16 83.3%
10 जम्मू-कश्मीर 65 80 15 81.3%
11 राजस्थान 100 116 16 86.2%
12 छत्तीसगढ़ 80 112 32 71.4%
13 तेलंगाना 65 71 6 91.5%
14 आंध्र प्रदेश 47 59 12 79.7%
15 उत्तराखंड 25 40 15 62.5%

मध्य प्रदेश कफ सिरप कांड के बाद बढ़े सवाल

हाल ही में मध्य प्रदेश में कफ सिरप पीने से 24 बच्चों की मौत के बाद दवा निर्माण और निगरानी प्रणाली पर सवाल उठे थे। घटना के बाद राज्य और केंद्र सरकारों ने जांच के आदेश दिए, लेकिन अब इस आरटीआई ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या देश में दवाओं की सुरक्षा की निगरानी करने वाला ढांचा खुद अधूरा है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएँ केवल निर्माण प्रक्रिया की विफलता नहीं हैं, बल्कि निरीक्षण प्रणाली की कमजोरी को भी उजागर करती हैं।


सीडीएससीओ क्या करता है और क्यों अहम है इसकी भूमिका

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है।
इसकी मुख्य जिम्मेदारी है —

  • दवा और चिकित्सा उपकरणों की गुणवत्ता और मानक सुनिश्चित करना,
  • दवाओं के उत्पादन, बिक्री और वितरण पर नियंत्रण रखना,
  • नई दवाओं के अनुमोदन (Approval) और आयात की निगरानी करना,
  • और देशभर में Drug Inspectors के माध्यम से दवा निर्माण इकाइयों का निरीक्षण करना।

देश के विभिन्न हिस्सों में फैली हजारों दवा निर्माण इकाइयों की नियमित जांच इन्हीं निरीक्षकों के माध्यम से होती है। लेकिन अगर आधे निरीक्षक ही अनुपस्थित हैं, तो कई यूनिट्स की जांच महीनों तक नहीं हो पाती।


एक निरीक्षक पर कई जिलों का भार

विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान स्थिति में एक दवा निरीक्षक को कई जिलों की जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है।
कुछ राज्यों में तो निरीक्षकों की कमी इतनी गंभीर है कि एक अधिकारी को 100 से अधिक निर्माण इकाइयों की जांच करनी होती है — जो व्यावहारिक रूप से असंभव है।

दवा नीति विशेषज्ञ डॉ. एस. के. झा कहते हैं,

“भारत में फार्मा उद्योग बहुत बड़ा है, लेकिन निगरानी ढांचा सीमित और असंतुलित है। जब निरीक्षकों की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, तो चाहे नियम कितने भी सख्त हों, ज़मीनी निगरानी नहीं हो पाएगी।”


‘गुणवत्ता पर भरोसा’ अब वैश्विक चिंता का विषय

भारत दुनिया के सबसे बड़े Generic Drug Exporters में से एक है। लेकिन पिछले दो वर्षों में भारत निर्मित कुछ दवाओं पर अफ्रीकी देशों, उज्बेकिस्तान, और गाम्बिया जैसे देशों ने सवाल उठाए हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी कई बार भारत को गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली मजबूत करने की सलाह दी है।

ऐसे में सीडीएससीओ में निरीक्षकों की कमी न केवल घरेलू उपभोक्ताओं के लिए खतरा है, बल्कि भारत की वैश्विक फार्मा साख (Pharma Reputation) पर भी नकारात्मक असर डाल सकती है।


केंद्र की दलील: भर्ती प्रक्रिया जारी

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, सीडीएससीओ में रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया जारी है।
एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा —

“कई पदों पर चयन प्रक्रिया अंतिम चरण में है। केंद्र सरकार अगले कुछ महीनों में बड़ी संख्या में निरीक्षकों की नियुक्ति करने जा रही है ताकि दवा निगरानी प्रणाली को मजबूत किया जा सके।”

हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल भर्ती से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि प्रशिक्षण, संसाधन और राज्य-स्तरीय समन्वय को भी सुदृढ़ करना जरूरी है।


राज्यों में भी गंभीर कमी

आरटीआई में यह भी सामने आया कि कई राज्यों में State Drug Control Departments में भी निरीक्षक पद खाली हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, और उत्तराखंड जैसे राज्यों में दवा निरीक्षकों की संख्या जनसंख्या के अनुपात में बेहद कम है।

कई बार राज्य सरकारें बजट और प्रशासनिक कारणों से नए पदों के सृजन या भर्ती में देरी करती हैं, जिससे पूरा निरीक्षण तंत्र कमजोर पड़ता है।


दवा सुरक्षा पर निगरानी का ढांचा फिर से बनाने की जरूरत

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि देश में Drug Regulatory System को ‘Mission Mode’ में पुनर्गठित करने की आवश्यकता है।
वे सुझाव देते हैं कि—

  • प्रत्येक राज्य में निरीक्षकों की न्यूनतम संख्या तय की जाए,
  • निरीक्षण को डिजिटाइज्ड ट्रैकिंग सिस्टम से जोड़ा जाए,
  • और Pharma Compliance Reporting को सार्वजनिक रूप से सुलभ बनाया जाए।

स्वास्थ्य नीति विश्लेषक डॉ. आरती नायर कहती हैं,

“जब तक निगरानी की प्रक्रिया पारदर्शी और जवाबदेह नहीं होगी, तब तक हर साल ऐसी घटनाएं सामने आती रहेंगी। निरीक्षकों की संख्या केवल एक पहलू है, असली चुनौती प्रणाली की मजबूती है।”


आगे की राह

देश में फार्मा उद्योग की वार्षिक क्षमता ₹3 लाख करोड़ से अधिक है और भारत विश्व स्तर पर 60 प्रतिशत से अधिक वैक्सीन आपूर्ति करता है। ऐसे में दवा गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली का मजबूत होना न केवल उपभोक्ता सुरक्षा बल्कि भारत की वैश्विक विश्वसनीयता के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

आरटीआई के इस खुलासे ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि ‘स्वस्थ भारत’ केवल दवाओं के उत्पादन से नहीं, बल्कि उनकी निगरानी और पारदर्शी व्यवस्था से संभव है।’

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