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करियर में प्रगति मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के दो जजों को दी दिल्ली जाने की अनुमति, जानिए पूरा मामला

नई दिल्ली/नैनीताल: भारतीय न्यायपालिका में करियर की प्रगति और व्यक्तिगत विकास को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें दो न्यायिक अधिकारियों को दिल्ली न्यायिक सेवा (DJS) में शामिल होने से रोका गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी अधिकारी को केवल इसलिए आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता कि उनके जाने से संबंधित राज्य में पद रिक्त हो जाएंगे।

क्या है पूरा मामला?

मामले के केंद्र में अनुभूति गोयल और एक अन्य याचिकाकर्ता हैं, जो वर्तमान में उत्तराखंड में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में अपनी सेवा दे रहे थे। दिलचस्प बात यह है कि इन अभ्यर्थियों ने उत्तराखंड न्यायिक सेवा में चयनित होने और कार्यभार संभालने से काफी पहले ही दिल्ली न्यायिक सेवा परीक्षा-2023 के लिए आवेदन कर दिया था।

जब इन अधिकारियों ने दिल्ली की मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार (इंटरव्यू) के चरणों को सफलतापूर्वक पार कर लिया, तो उन्होंने उत्तराखंड उच्च न्यायालय से प्रक्रिया में आगे बढ़ने और तकनीकी औपचारिकताओं को पूरा करने की अनुमति मांगी। हालांकि, उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 19 फरवरी 2025 को उनकी अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि राज्य में जजों की कमी है और उनके जाने से लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ेगा।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: ‘नकारात्मकता पैदा करती है ऐसी रोक’

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने उत्तराखंड हाईकोर्ट की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए मानवीय और संवैधानिक पहलुओं पर जोर दिया।

पीठ ने अपने आदेश में कहा:

“किसी भी व्यक्ति को बेहतर करियर चुनने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत दिए गए पेशे के अधिकार और अन्य मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है। यदि योग्य अधिकारियों को उनकी मेहनत के दम पर मिले बेहतर अवसर से वंचित किया जाता है, तो यह उनके भीतर सेवा के प्रति नकारात्मकता और कुंठा पैदा कर सकता है।”

रिक्तियां और प्रबंधन: कोर्ट का सुझाव

उत्तराखंड हाईकोर्ट की ओर से दी गई दलील कि जजों के जाने से पद खाली होंगे, पर सुप्रीम कोर्ट ने तार्किक रुख अपनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक रिक्तियां एक प्रशासनिक चुनौती हैं, जिसे नई भर्ती प्रक्रियाओं के माध्यम से हल किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति के करियर की प्रगति को प्रशासनिक सुविधा के लिए ‘बंधक’ नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने निर्देश दिया कि इन रिक्तियों को जल्द से जल्द नई नियुक्तियों के माध्यम से भरा जाए।

वरिष्ठता और जॉइनिंग को लेकर विशेष निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने न केवल स्थानांतरण की अनुमति दी, बल्कि याचिकाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए विशेष दिशा-निर्देश भी जारी किए:

  1. वरिष्ठता का संरक्षण: दिल्ली न्यायिक सेवा में शामिल होने में कानूनी प्रक्रिया के कारण जो देरी हुई है, उसका असर उनकी वरिष्ठता पर नहीं पड़ेगा। उनकी वरिष्ठता मूल मेरिट लिस्ट के अनुसार ही तय की जाएगी।

  2. समय सीमा: उत्तराखंड हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया है कि वह याचिकाकर्ताओं की सेवा समाप्ति (Relieving) की प्रक्रिया तत्काल पूरी करे, ताकि वे 13 फरवरी 2026 तक दिल्ली न्यायिक सेवा में अपना कार्यभार संभाल सकें।

फैसले के मायने: न्यायिक सेवाओं पर प्रभाव

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश भर के न्यायिक अधिकारियों के लिए एक नजीर साबित होगा। अक्सर यह देखा गया है कि विभिन्न राज्यों के हाईकोर्ट अपने अधिकारियों को दूसरे राज्यों या उच्च सेवाओं में जाने के लिए ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) देने में आनाकानी करते हैं।

इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि:

  • व्यक्तिगत हित बनाम राज्य का हित: न्यायिक अधिकारियों का व्यक्तिगत विकास और करियर के अवसर, राज्य की प्रशासनिक चिंताओं से ऊपर हैं।

  • मौलिक अधिकार: आजीविका और पेशा चुनने की स्वतंत्रता का अधिकार सरकारी और न्यायिक सेवाओं में भी पूरी तरह लागू होता है।

सुप्रीम कोर्ट के इस प्रगतिशील रुख ने यह संदेश दिया है कि न्यायपालिका के भीतर भी प्रतिभा के सम्मान और करियर की स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उत्तराखंड के इन दो जजों के लिए यह फैसला न केवल एक बड़ी जीत है, बल्कि यह देश के अन्य लोक सेवकों के लिए भी एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा जो निरंतर श्रेष्ठता की ओर अग्रसर हैं।

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