
नैनीताल: उत्तराखंड के सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील बिंदुखत्ता राजस्व गांव मामला में नैनीताल हाईकोर्ट ने अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शुक्रवार को हुई सुनवाई के बाद अदालत ने बिंदुखत्ता को राजस्व गांव घोषित करने की मांग वाली जनहित याचिका पर कोई भी राहत देने से इनकार करते हुए उसे पूरी तरह निस्तारित (Dispose) कर दिया है। इस फैसले से लालकुआं क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले बिंदुखत्ता के लाखों निवासियों की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है, जो दशकों से अपने मालिकाना हक और बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हाईकोर्ट की खंडपीठ का कड़ा रुख
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने चोरगलिया निवासी भुवन चंद्र पोखरिया द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ता की दलील थी कि लगभग 5 लाख की आबादी वाला यह क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं और हक-हकूक से वंचित है। हालाँकि, अदालत ने तथ्यों और केंद्र सरकार के पुराने प्रतिबंधों को आधार बनाते हुए स्पष्ट किया कि मौजूदा परिस्थितियों में भूमि हस्तांतरण का आदेश देना संभव नहीं है।
दलील: “जब हरिद्वार में हो सकता है, तो बिंदुखत्ता में क्यों नहीं?”
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रदेश सरकार पूर्व में हरिद्वार जिले के दो वन ग्रामों को राजस्व गांव का दर्जा दे चुकी है। इसी आधार पर बिंदुखत्ता के साथ भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया:
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वर्ष 2009 और 2024 में तत्कालीन सरकारों ने बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम बनाने की सार्वजनिक घोषणा की थी।
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उत्तराखंड विधानसभा से भी इसे राजस्व ग्राम घोषित करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो चुका है।
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राजस्व गांव न होने के कारण यहाँ के 12 गांवों के लाखों ग्रामीण सरकारी योजनाओं और भूमि के मालिकाना हक (Ownership Rights) से वंचित हैं।
केंद्र का 2006 का प्रतिबंध बना ‘रोड़ा’
मामले में राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए पक्ष ने कानूनी स्थिति स्पष्ट की। सरकार ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार ने 4 दिसंबर 2006 को नैनीताल, चंपावत और ऊधमसिंह नगर जिलों में वन भूमि के किसी भी प्रकार के परिवर्तन (Conversion) पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया था।
अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण मौजूद नहीं है जो यह दर्शाए कि नैनीताल जिले की वन भूमि हस्तांतरण पर लगा यह प्रतिबंध हटा लिया गया है। बिंदुखत्ता राजस्व गांव मामला में कानूनी बाधाओं को देखते हुए खंडपीठ ने कहा कि जब तक प्रतिबंध प्रभावी है, तब तक अदालत की ओर से राहत देना मुमकिन नहीं है।
सियासी वादों की भेंट चढ़ा बिंदुखत्ता
बिंदुखत्ता का मुद्दा उत्तराखंड की राजनीति में हमेशा से ‘हॉट टॉपिक’ रहा है। इसे राजस्व गांव बनाने की पहली बड़ी घोषणा साल 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी ने की थी। उनके बाद साल 2011 में मुख्यमंत्री बने रमेश पोखरियाल निशंक ने भी इसे दोहराया। चुनाव दर चुनाव, हर राजनीतिक दल ने बिंदुखत्ता के लोगों से राजस्व गांव का वादा किया, लेकिन शासन स्तर पर फाइलें कभी आगे नहीं बढ़ पाईं।
बिंदुखत्ता का भूगोल और जनसांख्यिकी
लालकुआं विधानसभा के अंतर्गत आने वाला बिंदुखत्ता उत्तराखंड का संभवतः सबसे बड़ा ‘वन ग्राम’ क्षेत्र है।
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जनसंख्या: यहाँ की आबादी करीब 5 लाख के आसपास मानी जाती है।
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गांव: इसके दायरे में 12 से अधिक मुख्य बस्तियां और गांव आते हैं।
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समस्या: राजस्व गांव का दर्जा न होने से यहाँ के लोगों को बैंक लोन मिलने में दिक्कत होती है, स्थायी निवास प्रमाण पत्र की प्रक्रिया जटिल है और कृषि भूमि पर उनका कोई कानूनी हक नहीं है।
ग्रामीणों का आक्रोश और भविष्य की राह
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद बिंदुखत्ता में मायूसी के साथ-साथ आक्रोश का माहौल है। स्थानीय निवासी इसे सरकारों की नाकामी बता रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब चुनाव आते हैं तो नेता वोट मांगने यहाँ आते हैं, लेकिन जब हक देने की बारी आती है तो वन भूमि और केंद्र के नियमों का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया जाता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब इस मामले में केवल दो ही रास्ते बचे हैं:
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राज्य सरकार केंद्र सरकार से विशेष अनुमति लेकर 2006 के प्रतिबंध को शिथिल करवाए।
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या फिर सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी जाए।
बिंदुखत्ता राजस्व गांव मामला केवल एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि लाखों लोगों के वजूद की लड़ाई है। हाईकोर्ट के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि केवल विधानसभा में प्रस्ताव पास करने या चुनावी रैलियों में घोषणा करने से जमीनी बदलाव नहीं आएगा। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर वन कानूनों के पेच सुलझाने होंगे। फिलहाल, बिंदुखत्ता के निवासी एक बार फिर अनिश्चितता के भंवर में फंस गए हैं।



