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The Hill India > Blog > देश > मिनिमम बैलेंस पेनल्टी से बैंकों ने वसूले ₹19,083 करोड़, HDFC बैंक सबसे आगे – जानिए किसने कितनी कमाई की और क्या खत्म होगा यह चार्ज?
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मिनिमम बैलेंस पेनल्टी से बैंकों ने वसूले ₹19,083 करोड़, HDFC बैंक सबसे आगे – जानिए किसने कितनी कमाई की और क्या खत्म होगा यह चार्ज?

The Hill India News
Last updated: April 24, 2026 12:08 pm
The Hill India News
Published: April 24, 2026
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महंगाई के इस दौर में जहां आम आदमी अपनी हर छोटी-छोटी बचत को संभालकर खर्च करता है, वहीं बैंक खातों में ‘मिनिमम बैलेंस’ न रखने की वजह से ग्राहकों की जेब पर भारी असर पड़ा है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों ने यह साफ कर दिया है कि सिर्फ एक नियम की अनदेखी के चलते बैंकों ने हजारों करोड़ रुपये की कमाई कर ली है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देशभर के बैंकों ने मिनिमम बैलेंस न रखने पर कुल ₹19,083 करोड़ की पेनल्टी वसूली है, जिसने वित्तीय व्यवस्था और बैंकिंग नियमों पर नई बहस छेड़ दी है।

Contents
तीन साल में ₹19,083 करोड़ की वसूली, प्राइवेट बैंक सबसे आगेHDFC बैंक सबसे आगे, अकेले ₹3,871 करोड़ की कमाईसरकारी बैंकों का योगदान और SBI की स्थितिक्यों लगाया जाता है मिनिमम बैलेंस चार्ज?जनता में नाराजगी और बढ़ती बहसक्या खत्म होगा यह चार्ज?

तीन साल में ₹19,083 करोड़ की वसूली, प्राइवेट बैंक सबसे आगे

‘RupeeTool’ नामक वित्तीय डेटा विश्लेषण प्लेटफॉर्म के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में भारतीय बैंकों ने ग्राहकों से मिनिमम बैलेंस पेनल्टी के रूप में ₹19,083 करोड़ की राशि वसूली है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा प्राइवेट बैंकों का रहा है, जिन्होंने अकेले ₹10,991 करोड़ की कमाई की है। वहीं सरकारी बैंकों ने इस अवधि में ₹8,092 करोड़ की पेनल्टी वसूली।

यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि यह राशि किसी एक शुल्क से नहीं, बल्कि लाखों छोटे खाताधारकों की अलग-अलग पेनल्टी से जमा हुई है। सोशल मीडिया पर इन आंकड़ों के सामने आने के बाद लोगों ने इसे ‘अनफेयर बैंकिंग सिस्टम’ बताया है।

HDFC बैंक सबसे आगे, अकेले ₹3,871 करोड़ की कमाई

प्राइवेट सेक्टर के बैंकों में HDFC बैंक इस सूची में सबसे ऊपर है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में HDFC बैंक ने मिनिमम बैलेंस पेनल्टी के जरिए लगभग ₹3,871 करोड़ की भारी-भरकम राशि वसूली है। यह आंकड़ा बताता है कि बैंक की पेनल्टी पॉलिसी का सीधा असर लाखों ग्राहकों पर पड़ा है।

इसके अलावा अन्य प्रमुख निजी बैंक जैसे Axis Bank और ICICI Bank ने भी इस अवधि में ₹1,000 करोड़ से अधिक की पेनल्टी वसूली की है। इन बैंकों की आक्रामक चार्जिंग पॉलिसी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं, खासकर उन ग्राहकों से जो छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों से आते हैं।

सरकारी बैंकों का योगदान और SBI की स्थिति

सरकारी बैंकों में State Bank of India (SBI) ने बचत खातों (Savings Accounts) पर मिनिमम बैलेंस पेनल्टी पहले ही समाप्त कर दी थी, जो ग्राहकों के लिए एक बड़ी राहत मानी गई थी। हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार SBI ने करंट अकाउंट्स (Current Accounts) से अब भी ₹932 करोड़ की वसूली की है।

इसी तरह Punjab National Bank (PNB) ने भी 1 जुलाई 2025 से यह पेनल्टी पूरी तरह बंद कर दी है, लेकिन इससे पहले की अवधि में बैंक ने कुल ₹1,557 करोड़ की पेनल्टी वसूली थी।

सरकारी बैंकों का रवैया अपेक्षाकृत नरम रहा है, लेकिन निजी बैंकों की तुलना में उनके नियम भी ग्राहकों पर कम बोझ डालते हैं, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है।

क्यों लगाया जाता है मिनिमम बैलेंस चार्ज?

बैंकों का तर्क है कि खातों को सक्रिय रखने और उनके संचालन लागत को कवर करने के लिए मिनिमम बैलेंस आवश्यक होता है। यदि कोई ग्राहक तय न्यूनतम राशि खाते में नहीं रखता है, तो बैंक उसे सेवा शुल्क (Penalty/Charges) के रूप में वसूलता है।

यह नियम बैंक और खाते के प्रकार के अनुसार अलग-अलग होता है। मेट्रो शहरों में यह राशि अधिक होती है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम रखी जाती है।

जनता में नाराजगी और बढ़ती बहस

इन आंकड़ों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक बहस छिड़ गई है। कई वित्तीय विशेषज्ञ और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ने इस सिस्टम को गरीब और मध्यम वर्ग के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि छोटे-छोटे खाताधारकों से ली गई ये पेनल्टी मिलकर हजारों करोड़ रुपये बन जाती है, जो नैतिक रूप से सवालों के घेरे में है।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि डिजिटल बैंकिंग और UPI के दौर में मिनिमम बैलेंस जैसे नियमों की जरूरत पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

क्या खत्म होगा यह चार्ज?

हाल के वर्षों में सरकार और आरबीआई (RBI) के स्तर पर बैंकिंग नियमों को सरल बनाने की दिशा में कई कदम उठाए गए हैं। कुछ सरकारी बैंकों ने पहले ही यह चार्ज खत्म कर दिया है। लेकिन निजी बैंकों में अभी भी यह नियम लागू है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में दबाव बढ़ने पर इस पॉलिसी में और ढील दी जा सकती है या इसे पूरी तरह खत्म भी किया जा सकता है, खासकर बेसिक सेविंग अकाउंट्स के लिए।

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