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असम चुनाव 2026: ‘अस्तित्व की लड़ाई’ या विकास का मुद्दा? CM सरमा ने जनसांख्यिकीय बदलाव पर छेड़ी बड़ी बहस

गुवाहाटी/डिब्रूगढ़: असम में आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एक बार फिर ‘अवैध प्रवासियों’ और ‘राज्य की पहचान’ को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाया है। डिब्रूगढ़ में 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराने के बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने जो हुंकार भरी, उसने आने वाले चुनावों की दिशा और दशा तय कर दी है।

पहचान की रक्षा बनाम बुनियादी ढांचा: सीएम का दो टूक संदेश

मुख्यमंत्री सरमा ने अपने संबोधन में विकास की नई परिभाषा गढ़ी। उन्होंने स्पष्ट किया कि असम का विकास केवल फ्लाईओवरों, सड़कों या बड़े भवनों के निर्माण तक सीमित नहीं है। उनके अनुसार, “वास्तविक विकास वह है जो असम की सदियों पुरानी पहचान और संस्कृति की रक्षा करे।”

सीएम ने मतदाताओं के सामने एक सीधा सवाल रखा: क्या असम की जनता ऐसी सरकार चाहती है जो तुष्टीकरण की राजनीति के तहत अवैध प्रवासियों के सामने घुटने टेक दे, या ऐसी सरकार जो ‘माटी, मानुष और संस्कृति’ की रक्षा के लिए अडिग रहे?

जनसांख्यिकीय बदलाव: 2027 की जनगणना की चेतावनी

मुख्यमंत्री ने आंकड़ों के जरिए राज्य की बदलती सामाजिक संरचना पर गंभीर चिंता व्यक्त की। 2011 की जनगणना के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने भविष्यवाणी की कि 2027 में होने वाली अगली जनगणना के परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।

सरमा ने दावा किया कि पूर्वी बंगाल मूल के लोगों की हिस्सेदारी राज्य की कुल जनसंख्या में 40 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। उन्होंने एक कड़वी सच्चाई साझा करते हुए कहा कि असम के 35 जिलों में से 12 जिलों में हिंदू अब अल्पसंख्यक बन चुके हैं। यह आंकड़ा न केवल सामाजिक बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत संवेदनशील है, जो आगामी असम विधानसभा चुनाव में ध्रुवीकरण का केंद्र बन सकता है।

अतिक्रमण पर प्रहार: 1.5 लाख बीघा जमीन मुक्त

अवैध कब्जे को लेकर पिछली सरकारों को कटघरे में खड़ा करते हुए सीएम ने कहा कि राज्य की लगभग 63.88 लाख बीघा जमीन पर ‘अज्ञात’ लोगों का कब्जा है। उन्होंने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए बताया:

  • सफल अभियान: 2021 से अब तक 1.5 लाख बीघा (लगभग 49,500 एकड़) से अधिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराया गया है।

  • कानूनी मजबूती: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘आप्रवासी अधिनियम 1950’ के प्रावधानों को बरकरार रखने के बाद अब जिला प्रशासन के पास और अधिक शक्तियां हैं।

  • त्वरित कार्रवाई: अब जिला अधिकारी विदेशी न्यायाधिकरणों (Foreign Tribunals) के लंबे इंतजार के बिना, अवैध प्रवासियों को 24 घंटे के भीतर वापस भेजने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।

आतंक के साये से बाहर निकलता असम

अतीत की याद दिलाते हुए हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि एक दौर था जब गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर असम की गलियां वीरान रहती थीं। उग्रवादी संगठनों के बहिष्कार के आह्वान, बम धमाकों की गूंज और गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच राष्ट्रीय पर्व मनाए जाते थे। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है।

“आज असम में भय का माहौल समाप्त हो गया है। अब ये समारोह किसी डर में नहीं, बल्कि समानता, एकता और विकास की विजय यात्रा के रूप में मनाए जाते हैं।”हिमंता बिस्वा सरमा, मुख्यमंत्री

चुनावी बिसात पर ‘अवैध विदेशी’ का मुद्दा

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी इस बार चुनाव को ‘असमिया पहचान बनाम घुसपैठ’ के मुद्दे पर केंद्रित करना चाहती है। पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) से आए लोगों की मौजूदगी को राज्य के सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा बताकर, सरकार बहुसंख्यक आबादी को एकजुट करने की कोशिश में है।

विपक्ष की चुनौतियां और भविष्य की राह

जहां एक ओर मुख्यमंत्री इन मुद्दों को लेकर आक्रामक हैं, वहीं विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति करार दे रहा है। हालांकि, सीएम सरमा के ये आंकड़े और तीखे तेवर यह संकेत दे रहे हैं कि आगामी चुनाव में एनआरसी (NRC), परिसीमन (Delimitation) और अवैध प्रवास जैसे मुद्दे सबसे ऊपर रहने वाले हैं।

असम अब उस चौराहे पर खड़ा है जहां उसे अपने भविष्य का फैसला करना है। मुख्यमंत्री का यह संबोधन महज एक भाषण नहीं, बल्कि 2026 के लिए बीजेपी का ‘चुनावी घोषणापत्र’ नजर आता है। क्या जनता जनसांख्यिकीय सुरक्षा के इस आह्वान पर मुहर लगाएगी? यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि ‘अवैध प्रवासियों’ की गूंज अब असम के हर गांव और शहर में सुनाई देगी।

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