नई दिल्ली/देहरादून | ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओवैसी ने उत्तराखंड में हाल ही में घटी दो प्रमुख घटनाओं—हरिद्वार में ‘गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित’ वाले पोस्टर और देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की हत्या—को लेकर तीखे सवाल दागे।
ओवैसी ने आरोप लगाया कि उत्तराखंड में जो कुछ भी हो रहा है, वह सोची-समझी नफरत की राजनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाना है।
हरिद्वार पोस्टर विवाद: “संविधान का मखौल और आधुनिक छुआछूत”
हरिद्वार की हरकी पैड़ी और आसपास के क्षेत्रों में ‘गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित’ के पोस्टर लगाए जाने के मामले ने अब राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक तूल पकड़ लिया है। इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए ओवैसी ने कहा कि सार्वजनिक स्थलों पर इस तरह के प्रतिबंध लगाना सीधे तौर पर भारत के संविधान का मखौल उड़ाना है।
ओवैसी ने कड़े शब्दों में कहा, “यह छुआछूत का एक नया रूप है और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14 और 15) का सीधा उल्लंघन है। अगर आप ऐसी विचारधारा रखते हैं कि किसी सार्वजनिक या धार्मिक क्षेत्र में किसी विशेष समुदाय का प्रवेश प्रतिबंधित है, तो इसका मतलब है कि आप देश के कानून और संविधान को नहीं मानते।”
उन्होंने आगे कहा कि यद्यपि हर धर्म के अपने नियम और मर्यादाएं होती हैं जिनका पालन होना चाहिए, लेकिन किसी भौगोलिक क्षेत्र को किसी के लिए प्रतिबंधित कर देना लोकतंत्र के विपरीत है। ओवैसी ने सवाल किया कि क्या प्रशासन सो रहा है या वह ऐसे तत्वों को मौन सहमति दे रहा है?
#WATCH | Hyderabad: On the entry of Non-Hindus barred at Haridwar's Har ki Pauri, AIMIM chief Asaduddin Owaisi says, "This is against the constitution… This is against the right to equality. If you keep enacting such laws, what will happen then?… In the TTD (Tirumala Tirupati… pic.twitter.com/NmPtHqjiag
— ANI (@ANI) January 17, 2026
एंजेल चकमा हत्याकांड: “नस्लभेदी टिप्पणी और प्रशासनिक लीपापोती”
हरिद्वार के मामले पर बोलते हुए ओवैसी ने राजधानी देहरादून में हुई त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की हत्या का मुद्दा भी पुरजोर तरीके से उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में प्रशासन सच्चाई को छिपाने की कोशिश कर रहा है।
ओवैसी के अनुसार, एंजेल चकमा पर नस्लभेदी टिप्पणियां की गई थीं और यह स्पष्ट रूप से नफरत से प्रेरित अपराध (Hate Crime) था। उन्होंने प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा, “वहां का प्रशासन इस जघन्य कृत्य को जस्टिफाई (न्यायोचित ठहराना) करने में लगा है। हकीकत सबके सामने है कि उस छात्र के साथ क्या हुआ, लेकिन हमारी याददाश्त कमजोर है और धीरे-धीरे लोग इस घटना को भूल जाएंगे।”
बीजेपी पर हमला: “असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की साजिश”
एआईएमआईएम प्रमुख ने बीजेपी और धामी सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि वे जानबूझकर सांप्रदायिक और विवादास्पद मुद्दों को हवा दे रहे हैं। ओवैसी ने कहा कि उत्तराखंड आज बेरोजगारी, रोजगार के अवसरों की कमी, बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और चरमराती शिक्षा व्यवस्था जैसे गंभीर संकटों से जूझ रहा है।
उन्होंने कहा, “बीजेपी इन नफरती मामलों को उछालकर लोगों का ध्यान भटकाने में कामयाब हो रही है। युवा नौकरी मांग रहा है, जनता बेहतर अस्पताल मांग रही है, लेकिन उन्हें ‘प्रवेश वर्जित’ और नफरत के मुद्दे परोसे जा रहे हैं। उत्तराखंड में आज जो कुछ भी घट रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ नफरत का खेल है।”
संविधान और कानून के शासन पर सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ओवैसी ने जनता और न्यायपालिका से अपील की कि वे इस बात पर गौर करें कि देश किस दिशा में जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर आज संविधान की रक्षा नहीं की गई, तो कल किसी की भी मर्जी के हिसाब से कानून चलेगा। उन्होंने धामी सरकार से मांग की कि वे ऐसे पोस्टर लगाने वाले अराजक तत्वों और नफरत फैलाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करें ताकि प्रदेश की शांति भंग न हो।
विश्लेषण: उत्तराखंड में बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड में पिछले कुछ महीनों से ‘मजार जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’ और अब ‘प्रवेश वर्जित’ जैसे मुद्दों ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से ध्रुवीकृत कर दिया है। ओवैसी का यह हमला न केवल मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश है, बल्कि यह बीजेपी के ‘कट्टर हिंदुत्व’ के एजेंडे को सीधे चुनौती देने का भी प्रयास है।
क्या शांत होगी नफरत की आग?
उत्तराखंड जिसे ‘देवभूमि’ के नाम से जाना जाता है, वहां इस तरह के विवाद पर्यटन और राज्य की छवि पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। असदुद्दीन ओवैसी के बयानों ने एक बार फिर केंद्र और राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि धामी सरकार इन आरोपों पर क्या सफाई देती है और विवादित पोस्टरों पर क्या कार्रवाई की जाती है।



