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Uttarakhand: हिमालयी सीमाओं पर बनेगा ‘अभेद्य कवच’, राज्यपाल और सीएम धामी का नया सामरिक विजन; सैन्य-नागरिक समन्वय पर जोर

देहरादून (07 जनवरी, 2026): भारत की उत्तरी सीमाओं, विशेषकर उत्तराखंड से लगे ‘मध्य सेक्टर’ (Middle Sector) की सुरक्षा को लेकर एक नई और प्रोएक्टिव रणनीति तैयार की जा रही है। देहरादून के क्लेमेंट टाउन में आयोजित “फोर्टिफाइंग द हिमालयाज: ए प्रोएक्टिव मिलिट्री-सिविल-सोसाइटी फ्यूजन स्ट्रेटजी” विषयक संगोष्ठी में उत्तराखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि अब सीमा सुरक्षा केवल सेना के भरोसे नहीं, बल्कि सैन्य-नागरिक-समाज के एकीकृत समन्वय से सुनिश्चित की जाएगी।

राज्यपाल गुरमीत सिंह का संबोधन: “हिमालय केवल भूगोल नहीं, रणनीतिक प्रणाली है”

राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (से नि) ने अपने संबोधन में हिमालयी सीमाओं की संवेदनशीलता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के दौर में सुरक्षा चुनौतियां केवल प्रत्यक्ष युद्ध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हाइब्रिड वारफेयर और ग्रे-जोन गतिविधियों (अप्रत्यक्ष दबाव) के रूप में सामने आ रही हैं।

राज्यपाल के संबोधन की 4 मुख्य बातें:

  1. सैन्य-नागरिक फ्यूजन: सीमाओं की रक्षा के लिए सेना, नागरिक प्रशासन और स्थानीय समाज को एक ‘फ्यूजन स्ट्रेटजी’ के तहत काम करना होगा।

  2. हाइब्रिड वारफेयर का मुकाबला: तकनीक और आधारभूत संरचना का ऐसा जाल बिछाना होगा जो दुश्मन के किसी भी मनोवैज्ञानिक या तकनीकी दबाव को विफल कर सके।

  3. प्रौद्योगिकी और AI: ड्रोन, उन्नत निगरानी प्रणालियां और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग सामरिक तैयारियों के लिए अनिवार्य है।

  4. पर्यावरण और सुरक्षा: राज्यपाल ने जोर देकर कहा कि हिमालय का पर्यावरणीय संतुलन सीधे तौर पर हमारी परिचालन क्षमता (Operational Capability) को प्रभावित करता है।


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी: “सीमांत नागरिक देश की शक्ति, अब माणा अंतिम नहीं ‘प्रथम’ गांव”

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सामरिक नीति को सुदृढ़ बनाने के लिए इस सेमिनार को मील का पत्थर बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को दोहराते हुए कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों का विकास सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

  • वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम (Vibrant Village Program): सीएम ने कहा कि सीमावर्ती गांवों का सशक्तिकरण ही राष्ट्रीय सुरक्षा की पहली गारंटी है। उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी ने माणा को देश का अंतिम नहीं बल्कि ‘प्रथम गांव’ घोषित कर सीमांत क्षेत्रों के प्रति दृष्टिकोण बदल दिया है।”

  • आंख और कान हैं स्थानीय लोग: मुख्यमंत्री ने स्थानीय समुदायों को राष्ट्रीय सुरक्षा का ‘आंख और कान’ बताया, जो विषम परिस्थितियों में भी सेना के सहायक बनकर खड़े रहते हैं।

  • अवसंरचना विकास: चारधाम परियोजना और सीमांत क्षेत्रों में बन रही सड़कें, सुरंगें और पुल न केवल पर्यटन के लिए हैं, बल्कि सामरिक गतिशीलता (Strategic Mobility) के लिए रीढ़ की हड्डी हैं।


मध्य सेक्टर की चुनौतियां: सेंट्रल कमांड की रणनीति

संगोष्ठी में जीओसी-इन-सी (सेंट्रल कमांड) लेफ्टिनेंट जनरल अनिंद्य सेनगुप्ता ने मध्य क्षेत्र के बॉर्डर की विशिष्ट चुनौतियों पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि तकनीक के अपग्रेडेशन और इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के माध्यम से हम किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं।

प्रमुख सामरिक विशेषज्ञों की उपस्थिति

इस उच्च स्तरीय संगोष्ठी में देश के नामचीन सामरिक विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया, जिनमें शामिल थे:

  • राजदूत अशोक के. कांथा (सेवानिवृत्त)

  • लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (सेवानिवृत्त)

  • ब्रिगेडियर अंशुमान नारंग (सेवानिवृत्त)


सुरक्षा का त्रिकोणीय मॉडल

देहरादून में हुई इस संगोष्ठी का सार यह है कि हिमालयी सीमाओं की रक्षा अब एक बहुआयामी विषय है। इसमें सैन्य शक्ति, प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक विश्वास का संगम होना आवश्यक है। ‘वाइब्रेंट विलेज’ के माध्यम से सीमांत गांवों में आबादी को स्थिर रखना और वहां आधुनिक सुविधाएं पहुंचाना ही भारत की सीमाओं को ‘अभेद्य’ बनाएगा।

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