
देहरादून: “हमने नंदा-सुनंदा देवियों को साक्षात नहीं देखा, लेकिन इन बालिकाओं के रूप में ये देवियां हमारे बीच हैं। उनकी शिक्षा की बाधाओं को दूर कर उन्हें योग्य बनाना ही इन देवियों की असली वंदना है।” यह भावुक और प्रेरणादायी शब्द देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल के हैं, जिन्होंने शुक्रवार, 13 फरवरी 2026 को कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित ‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ के 13वें संस्करण के दौरान कहे।
एक ऐसी दुनिया में जहां गरीबी अक्सर सपनों का गला घोंट देती है, वहां देहरादून जिला प्रशासन की यह पहल उन 34 बेटियों के लिए संजीवनी बनकर आई है, जिनकी शिक्षा आर्थिक तंगी, माता-पिता की बीमारी या पिता के असमय निधन के कारण रुकने की कगार पर थी।
शिक्षा पर लगा ‘ग्रहण’ हटा: 15 दिन स्कूल के बाहर खड़ी रहने वाली बेटियों को मिला सम्मान
इस कार्यक्रम के दौरान जो कहानियां सामने आईं, वे व्यवस्था और समाज की संवेदनहीनता की पोल खोलती हैं। शदब नाम की बालिका की माता मन्नो ने रोते हुए बताया कि फीस न भर पाने के कारण उनकी होनहार बेटी को स्कूल प्रबंधन ने 15-15 दिनों तक स्कूल के गेट के बाहर खड़ा रखा। उसे परीक्षा से वंचित रखने की धमकी दी जा रही थी।
इसी तरह, घरों में काम करने वाली खुशी कौर की माता ने बताया कि उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि बच्चों की पढ़ाई छूट रही थी। लेकिन प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा ने इन सभी 34 बालिकाओं की 9 लाख रुपये की फीस का भुगतान कर उनके भविष्य की डगर आसान कर दी है।
कैंसर और पैरालिसिस की मार पर भारी पड़ी प्रशासनिक ममता
प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा केवल स्कूल की लड़कियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षा ग्रहण कर रही उन युवतियों का भी सहारा बना है जिनके घर के कमाऊ सदस्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं:
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सृष्टि (BCA 5th Semester): सृष्टि के पिता कैंसर पीड़ित हैं। इलाज में सारा पैसा खर्च होने के कारण उनकी बीसीए की पढ़ाई बीच में ही रुकने वाली थी, जिसे प्रशासन ने पुनर्जीवित किया।
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शिवांगी (BAJMC): शिवांगी की माता एक निजी अस्पताल में सफाईकर्मी हैं। आर्थिक तंगी के कारण उनकी पत्रकारिता की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी, जिसे अब जिला प्रशासन का सहयोग मिला है।
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अलाईका रावत (B.Sc Nursing): पिता के साये से महरूम अलाईका को नर्सिंग की शिक्षा के लिए मदद दी गई।
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अन्य लाभार्थी: आकृति बडोनी (B.Com), तनिका (कक्षा 10), लावण्या (कक्षा 9), दिव्या (कक्षा 6), और नन्ही मानवी (UKG) जैसी कुल 34 बालिकाओं के चेहरों पर अब मुस्कान वापस आ गई है।
मुख्यमंत्री के विज़न को धरातल पर उतार रहे डीएम सविन बंसल
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के मार्गदर्शन में शुरू हुआ यह प्रोजेक्ट अब तक एक बड़े अभियान का रूप ले चुका है। आंकड़ों पर नज़र डालें तो यह पहल बेहद प्रभावी साबित हुई है:
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अब तक कुल लाभार्थी: 126 बालिकाएं।
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कुल वितरित धनराशि: 62 लाख रुपये से अधिक।
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ताजा वितरण: 13वें संस्करण में 34 बालिकाओं को 9 लाख रुपये।
जिलाधिकारी सविन बंसल ने बालिकाओं की हौसला अफजाई करते हुए उन्हें महापुरुषों की जीवनी (Biography) पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा, “आप सफल होकर अन्य बालिकाओं के लिए रोल मॉडल बनें। आपकी शिक्षा की ललक कभी कम नहीं होनी चाहिए।”
भावुक हुए परिजन: मुख्यमंत्री और प्रशासन का जताया आभार
कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद अभिभावकों की आंखों में नमी और दिल में दुआएं थीं। जिया की माता ने साझा किया कि कैसे उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई लगभग छोड़ दी थी, लेकिन जिला प्रशासन ने अभिभावक बनकर जिम्मेदारी संभाली। परिजनों ने सामूहिक रूप से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और जिलाधिकारी का इस मानवीय पहल के लिए आभार व्यक्त किया।
प्रशासनिक टीम की सक्रियता
इस पुनीत कार्य में जिलाधिकारी के साथ उप जिलाधिकारी सदर हरिगिरि, उप जिलाधिकारी कुमकुम जोशी, जिला कार्यक्रम अधिकारी बाल विकास जितेंद्र कुमार और जिला प्रोबेशन अधिकारी मीना बिष्ट सहित पूरी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
समाज के लिए एक संदेश
‘प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा’ ने सिद्ध कर दिया है कि यदि सरकारी तंत्र संवेदनशील हो, तो कोई भी “अलाईका” या “सृष्टि” शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं रहेगी। यह प्रोजेक्ट उन निजी शिक्षण संस्थानों के लिए भी एक आईना है जिन्होंने फीस के लिए बेटियों को स्कूल के बाहर खड़ा किया। देहरादून जिला प्रशासन की यह कोशिश न केवल शिक्षा को पुनर्जीवित कर रही है, बल्कि राष्ट्र निर्माण के लिए सशक्त महिलाओं की एक नई पौध तैयार कर रही है।

