चमोली (उत्तराखंड)। देवभूमि उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा की सुप्रसिद्ध राजजात यात्रा को लेकर जारी संशय के बादल अब छंटने लगे हैं। चमोली जिले के नंदानगर (घाट) में आयोजित एक विशाल महापंचायत ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए स्पष्ट कर दिया है कि विश्व प्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा हर हाल में साल 2026 में ही आयोजित की जाएगी। महापंचायत ने ‘श्री नंदा राजजात समिति नौटी’ के उस निर्णय को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें यात्रा को 2027 तक स्थगित करने की बात कही गई थी।
‘नंदा की बड़ी जात’ के नाम से जानी जाएगी यात्रा
नंदानगर के ब्लॉक सभागार में आयोजित इस महापंचायत में न केवल यात्रा की तिथि पर मुहर लगी, बल्कि इसके स्वरूप और नाम को लेकर भी महत्वपूर्ण घोषणा की गई। सर्वसम्मति से तय किया गया कि अब इस यात्रा को ‘नंदा राजजात’ के बजाय ‘नंदा की बड़ी जात’ (ठुलि जात) के नाम से संबोधित किया जाएगा। ग्रामीणों और मंदिर समितियों का तर्क है कि यह नाम स्थानीय लोक परंपराओं और सदियों पुरानी संस्कृति के अधिक निकट है।
23 जनवरी को निकलेगा शुभ मुहूर्त
महापंचायत में मौजूद धर्माचार्यों और हक-हकूकधारियों ने निर्णय लिया है कि आगामी 23 जनवरी को बसंत पंचमी के पावन पर्व पर नंदा देवी सिद्धपीठ कुरुड़ में विधिवत पूजा-अर्चना की जाएगी। इसी दिन यात्रा का आधिकारिक मुहूर्त निकाला जाएगा। इसके साथ ही बसंत पंचमी के दिन ‘दिनपटा’ निकालने की रस्म भी शुरू होगी, जो यात्रा की औपचारिक तैयारी का पहला चरण माना जाता है।
सेवानिवृत्त कर्नल हरेंद्र सिंह रावत संभालेंगे कमान
यात्रा को व्यवस्थित और भव्य रूप देने के लिए एक नई संचालन समिति का गठन किया गया है। भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्नल हरेंद्र सिंह रावत को इस समिति का अध्यक्ष चुना गया है। कर्नल रावत ने अपनी प्राथमिकता स्पष्ट करते हुए कहा, “नंदा देवी की यात्रा आस्था और लोक विश्वास का प्रतीक है। इसे राजनीति और राजशाही के प्रभाव से मुक्त रखा जाना चाहिए। हमारा प्रयास होगा कि यात्रा को उसकी मूल भावना के साथ संपन्न कराया जाए।”
क्यों खड़ा हुआ विवाद? (नौटी समिति बनाम महापंचायत)
इस पूरे मामले में विवाद की शुरुआत 18 जनवरी को हुई, जब ‘श्री नंदा राजजात समिति नौटी’ के अध्यक्ष राकेश कुंवर और महासचिव भुवन नौटियाल ने प्रेस वार्ता कर यात्रा को 2027 तक टालने का ऐलान किया था। नौटी समिति का तर्क था कि:
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हिमालयी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का काम अधूरा है।
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सितंबर के महीने में उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी और प्रतिकूल मौसम की संभावना रहती है।
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सुरक्षा और व्यवस्था के लिहाज से 2026 में यात्रा कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, नंदानगर की महापंचायत ने इन तर्कों को एक निजी संस्था (NGO) का व्यक्तिगत निर्णय बताते हुए खारिज कर दिया। कुरुड़ मंदिर समिति के अध्यक्ष सुखवीर रौतेला ने कहा कि यात्रा का स्थगन परंपराओं के विरुद्ध है और जनभावनाएं इसी साल यात्रा कराने के पक्ष में हैं।
सांस्कृतिक पहचान और लोक आस्था का प्रतीक
महापंचायत में उमड़ी महिलाओं, जनप्रतिनिधियों और श्रद्धालुओं की भीड़ ने एक स्वर में कहा कि नंदा देवी राजजात केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान और हिमालयी गौरव का जीवंत प्रतीक है। वक्ताओं ने सरकार से भी मांग की है कि वह इस मामले में अपनी स्थिति स्पष्ट करे और यात्रा की तैयारियों को गति दे।
यात्रा का महत्व: एक कठिन हिमालयी सफर
नंदा देवी राजजात यात्रा को ‘हिमालय का महाकुंभ’ भी कहा जाता है। यह यात्रा घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ों और बर्फीले रास्तों से होकर गुजरती है। महापंचायत का मानना है कि यदि प्रशासन और जनता मिलकर प्रयास करें, तो अगस्त-सितंबर के पारंपरिक समय में यात्रा को सफलतापूर्वक संपन्न कराया जा सकता है।
परंपरा की जीत
नंदानगर की महापंचायत ने साफ संदेश दे दिया है कि लोक आस्था के सामने प्रशासनिक या तकनीकी अड़चनें गौण हैं। अब सबकी नजरें 23 जनवरी यानी बसंत पंचमी पर टिकी हैं, जब कुरुड़ मंदिर से निकलने वाला मुहूर्त इस भव्य ‘बड़ी जात’ की अंतिम रूपरेखा तय करेगा।



