भोपाल। कभी आर्थिक तंगी के कारण महंगी निशानेबाजी की बंदूक खरीदना मुश्किल था। शुरुआत के लिए रिश्तेदार से बंदूक उधार लेनी पड़ी और अभ्यास के दौरान टीन के डिब्बों को निशाना बनाना पड़ा। लेकिन मेहनत, लगन और प्रतिभा ने ऐसी कहानी लिखी कि वही खिलाड़ी आज एशियन गेम्स के मंच पर भारत का नाम रोशन कर रही है। मध्यप्रदेश शूटिंग अकादमी की निशानेबाज नीरू ढांडा ने महिला ट्रैप स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। वहीं, भोपाल की ही प्रतिभाशाली निशानेबाज मनीषा कीर ने टीम स्पर्धा में सिल्वर मेडल हासिल कर मध्यप्रदेश को गौरवान्वित किया।
नीरू की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि वह भारत की पहली महिला ट्रैप चैंपियन बनने में सफल रही हैं। फाइनल मुकाबले में उन्होंने मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद बेहद सटीक निशाने लगाए और चीन की खिलाड़ी को पीछे छोड़ते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
बीमारी के बीच जापान पहुंचीं और कर दिया कमाल
नीरू ढांडा की एशियन गेम्स तक पहुंचने की कहानी भी संघर्ष और जज्बे से भरी हुई है। प्रतियोगिता से करीब दस दिन पहले तक उनकी तबीयत खराब थी और उनके खेलने को लेकर संशय बना हुआ था। बीमारी के कारण कमजोरी के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के बीच उन्होंने जापान पहुंचकर प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और अपनी शानदार निशानेबाजी से सभी को चौंका दिया।
महिला ट्रैप के फाइनल में बारिश और कम दृश्यता जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियां भी नीरू के निशाने को नहीं डिगा सकीं। उन्होंने 30 में से 28 सटीक निशाने लगाए और चीन की सुन यूनोंग को पीछे छोड़ते हुए गोल्ड मेडल पर कब्जा किया। उनकी इस जीत के साथ ही भारतीय शूटिंग के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया।
उधार की बंदूक से शुरू हुआ निशानेबाजी का सफर
नीरू ढांडा की सफलता की सबसे प्रेरक बात यह है कि उनका शुरुआती सफर किसी महंगे शूटिंग सेटअप से नहीं, बल्कि उधार की बंदूक और सीमित संसाधनों से शुरू हुआ था।
मध्यप्रदेश शूटिंग अकादमी के शॉटगन कोच इंद्रजीत सिरदार के मुताबिक, नीरू बचपन से ही बेहद प्रतिभाशाली और मेहनती रही हैं। निशानेबाजी के प्रति उनका रुझान रिश्ते में भाई लक्ष्य से प्रेरित होकर बढ़ा। हालांकि, यह खेल महंगा होने के कारण परिवार के लिए इसे अपनाना आसान नहीं था।
इसके बाद परिवार में ही एक बड़ी प्रेरणा मिली। नीरू के ममेरे भाई लक्ष्य श्योराण ने जब जकार्ता में रजत पदक हासिल किया, तो नीरू के भीतर भी निशानेबाजी में आगे बढ़ने का जुनून पैदा हुआ। संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने भाई से बंदूक उधार लेकर अभ्यास शुरू किया।
शुरुआती दिनों में वह टीन के डिब्बों पर निशाना साधकर अपनी सटीकता और एकाग्रता को मजबूत करती थीं। सीमित साधनों के बीच किया गया यही अभ्यास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
19 साल की उम्र में अकादमी में दाखिला
नीरू ने 19 साल की उम्र में मध्यप्रदेश राज्य निशानेबाजी अकादमी में प्रवेश लिया। अकादमी में आने के बाद उनके खेल को बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलीं और उनकी प्रतिभा लगातार निखरती चली गई।
कोच इंद्रजीत सिरदार के अनुसार, नीरू की सफलता के पीछे उनकी मेहनत, अनुशासन और खेल के प्रति समर्पण की बड़ी भूमिका है। अकादमी में प्रशिक्षण लेने के बाद नीरू ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू की। इससे पहले भी उन्होंने इटली में आयोजित ISSF शॉटगन वर्ल्ड कप में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी क्षमता का परिचय दिया था।
अब एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने के बाद नीरू का नाम भारतीय शूटिंग की नई उपलब्धियों के साथ जुड़ गया है।
टीम स्पर्धा में भी नीरू का शानदार प्रदर्शन
नीरू की सफलता सिर्फ व्यक्तिगत स्पर्धा तक सीमित नहीं रही। उन्होंने महिला ट्रैप टीम चैंपियनशिप में भी शानदार प्रदर्शन किया। मनीषा कीर और आशिमा के साथ भारतीय टीम का हिस्सा रहते हुए नीरू ने टीम इवेंट में भी सिल्वर मेडल हासिल किया।
इस तरह एशियन गेम्स में नीरू ने व्यक्तिगत स्पर्धा में गोल्ड और टीम स्पर्धा में सिल्वर जीतकर अपने प्रदर्शन को और खास बना दिया।
आठ भाई-बहनों में सातवें नंबर की मनीषा ने भी रचा इतिहास
वहीं, भोपाल की मनीषा कीर की कहानी भी संघर्ष और परिवार के सहयोग की मिसाल है। आठ भाई-बहनों में सातवें नंबर की मनीषा का परिवार मछली पालन के काम से जुड़ा हुआ है। ऐसे परिवार से आने के बावजूद मनीषा ने निशानेबाजी को अपना करियर बनाया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
मनीषा को खेल की दुनिया में आगे बढ़ाने में उनकी बड़ी बहन सोना कीर की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सोना स्वयं वॉटर स्पोर्ट्स में अंतरराष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं। जब अकादमी की ओर से परिवार से किसी एक बच्चे को खेल के लिए आगे भेजने के लिए कहा गया, तो सोना ने अपनी छोटी बहन मनीषा का नाम दिया।
इसके बाद वर्ष 2013 में अकादमी के ट्रायल में मनीषा का चयन हुआ। निशानेबाजी को अपनाने के बाद उन्होंने लगातार मेहनत की और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर तय किया।
बहन ने पहचानी प्रतिभा, अब देश के लिए जीता मेडल
मनीषा की बहन सोना कीर के मुताबिक, मनीषा ने निशानेबाजी चुनने के बाद खेल के प्रति पूरी गंभीरता दिखाई। लगातार अभ्यास और मेहनत के बाद अब एशियन गेम्स में उनके हाथ में सिल्वर मेडल है।
मनीषा की उपलब्धि यह भी बताती है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर सामान्य परिवारों से आने वाले खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
मध्यप्रदेश के लिए गौरव का पल
एशियन गेम्स में नीरू ढांडा के गोल्ड और मनीषा कीर के सिल्वर ने मध्यप्रदेश शूटिंग अकादमी की प्रतिभा को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया है। दोनों खिलाड़ियों की उपलब्धि पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी उन्हें बधाई दी और उनके शानदार प्रदर्शन की सराहना की।
नीरू की कहानी खास तौर पर उन खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है, जिनके पास शुरुआत में महंगे संसाधन नहीं होते। उधार की बंदूक से निशाना लगाने वाली नीरू ने टीन के डिब्बों से शुरू किया सफर एशियन गेम्स के गोल्ड मेडल तक पहुंचाया है। उनकी यह कामयाबी साबित करती है कि प्रतिभा के साथ मेहनत, अनुशासन और अवसर मिल जाए तो सीमित संसाधनों से शुरू हुआ सफर भी दुनिया के सबसे बड़े खेल मंचों तक पहुंच सकता है।
