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मुंबई पुलिस कमिश्नर देवेन भारती के जनता दरबार में फर्जी ‘केंद्रीय मंत्री का पीए’ बनकर पहुंचा गिरोह, एक गिरफ्तार

The Hill India News
Last updated: October 30, 2025 2:59 am
The Hill India News
Published: October 30, 2025
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मुंबई: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में पुलिस मुख्यालय के भीतर एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। तीन लोगों ने खुद को एक केंद्रीय मंत्री के निजी सहायक (पीए) से जुड़ा बताकर सीधे मुंबई पुलिस कमिश्नर देवेन भारती के जनता दरबार में प्रवेश कर लिया। जांच में जब मामला फर्जी निकला, तो पुलिस ने धोखाधड़ी का केस दर्ज कर एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।

Contents
जनता दरबार में घुसकर कहा— “हम केंद्रीय मंत्री के पीए से आए हैं”‘भरत मन्न’ नाम का कोई सरकारी पीए नहीं मिलामोबाइल में मिला सरकारी चिन्ह वाला फर्जी व्हाट्सऐप प्रोफाइल2015 में भी हो चुका है धोखाधड़ी का केस दर्जधारा 204, 319 और 61 के तहत केस दर्जक्राइम ब्रांच यूनिट 1 ने संभाली जांचसुरक्षा तंत्र पर भी उठे सवालमुंबई पुलिस की तेज कार्रवाई से यह मामला भले ही तुरंत नियंत्रण में आ गया, लेकिन इससे यह साफ है कि सरकारी पदों और पहचान का दुरुपयोग कर ठगी करने वाले गिरोह अब और अधिक चालाकी से सक्रिय हैं। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी व्यक्ति के सरकारी पहचान या सिफारिश के दावे को सत्यापित किए बिना भरोसा न करें।

जनता दरबार में घुसकर कहा— “हम केंद्रीय मंत्री के पीए से आए हैं”

सूत्रों के अनुसार, यह घटना 28 अक्टूबर की दोपहर करीब साढ़े तीन बजे की है, जब तीन व्यक्ति — अशोक शाह (58) निवासी सांताक्रूज़, जीतेंद्र व्यास (57) निवासी कांदिवली, और धीरेंद्र कुमार व्यास (52) निवासी भायंदर — पुलिस मुख्यालय पहुंचे।

उन्होंने वहां मौजूद पुलिसकर्मियों से कहा कि वे एक केंद्रीय मंत्री के पीए भरत मन्न की सिफारिश पर कमिश्नर से मिलने आए हैं। हर मंगलवार को कमिश्नर देवेन भारती जनता दरबार लगाते हैं, जहां आम नागरिक अपनी शिकायतें सीधे उन्हें सौंप सकते हैं।

शुरुआत में पुलिसकर्मियों ने उन्हें अंदर जाने दिया, लेकिन जब उनसे सिफारिश पत्र या आधिकारिक पहचान के दस्तावेज मांगे गए, तो उनकी कहानी पर संदेह हुआ।


‘भरत मन्न’ नाम का कोई सरकारी पीए नहीं मिला

पूछताछ के दौरान धीरेंद्र व्यास ने बताया कि अशोक शाह किसी वित्तीय धोखाधड़ी के शिकार हैं, और “भरत मन्न” ने ही कमिश्नर से मिलने का समय तय कराया है। हालांकि जब अधिकारियों ने मंत्रालय स्तर पर सत्यापन कराया, तो यह पता चला कि किसी भी केंद्रीय मंत्री के पास भरत मन्न नाम का कोई पीए नहीं है।

इसके बाद पुलिस ने तुरंत तीनों को रोका और उनसे विस्तृत पूछताछ शुरू की।


मोबाइल में मिला सरकारी चिन्ह वाला फर्जी व्हाट्सऐप प्रोफाइल

जांच आगे बढ़ाते हुए पुलिस ने धीरेंद्र व्यास का मोबाइल फोन जब्त किया। उसमें ‘भरत मन्न’ नाम से सेव एक नंबर मिला, जिसकी व्हाट्सऐप डीपी पर भारत सरकार का अशोक स्तंभ लगा हुआ था — ताकि सामने वाले को यह भ्रम हो कि नंबर किसी सरकारी अधिकारी का है।

सूत्रों के अनुसार, व्यास इस प्रोफाइल का इस्तेमाल लोगों को प्रभावित करने और अधिकारियों तक पहुंच का दावा करने के लिए करता था। पुलिस को शक है कि इसी तरीके से वह सरकारी स्तर पर सिफारिश कराने के नाम पर लोगों से धोखाधड़ी कर रहा था।


2015 में भी हो चुका है धोखाधड़ी का केस दर्ज

पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि धीरेंद्र व्यास के खिलाफ साल 2015 में कलाचौकी पुलिस थाने में भी धोखाधड़ी का मामला दर्ज हो चुका है। तब भी उसने खुद को सरकारी विभागों से जुड़ा बताकर लोगों से आर्थिक लाभ लेने की कोशिश की थी।

इस बार मामला सीधे पुलिस कमिश्नर ऑफिस तक पहुंचने के कारण अधिक गंभीर माना जा रहा है। मौके पर मौजूद अधिकारियों ने तुरंत कार्रवाई करते हुए व्यास को वहीं से हिरासत में ले लिया और उसे आजाद मैदान पुलिस थाने ले जाया गया।


धारा 204, 319 और 61 के तहत केस दर्ज

आजाद मैदान थाने में दर्ज एफआईआर में आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराएँ लगाई गई हैं —

  • धारा 204: सरकारी पद का झूठा दावा करना
  • धारा 319: भेष बदलकर ठगी करना
  • धारा 61: आपराधिक साजिश रचना

पूछताछ के बाद धीरेंद्र व्यास को गिरफ्तार कर नोटिस देकर रिहा किया गया, जबकि अशोक शाह और जीतेंद्र व्यास से भी पूछताछ जारी है।


क्राइम ब्रांच यूनिट 1 ने संभाली जांच

मामला गंभीरता को देखते हुए अब मुंबई क्राइम ब्रांच की यूनिट 1 ने जांच अपने हाथ में ले ली है। अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि ‘भरत मन्न’ नाम से इस्तेमाल किया जा रहा मोबाइल नंबर आखिर किसके नाम पर रजिस्टर्ड है और क्या इसके पीछे कोई बड़ा गिरोह सक्रिय है।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि

“पहली नज़र में यह संगठित धोखाधड़ी का मामला लगता है। आरोपी सरकारी संपर्क का झांसा देकर प्रभावशाली व्यक्तियों से मुलाकात का प्रयास करते हैं। इस तरह की घटनाएं प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाती हैं।”


सुरक्षा तंत्र पर भी उठे सवाल

यह मामला मुंबई पुलिस मुख्यालय जैसे संवेदनशील परिसर में घटा है, जहाँ आम तौर पर उच्च सुरक्षा व्यवस्था रहती है। ऐसे में तीन संदिग्धों का बिना पूर्व अनुमति कमिश्नर के जनता दरबार तक पहुंच जाना खुद सुरक्षा व्यवस्था में चूक का संकेत देता है।

हालांकि पुलिस ने दावा किया है कि “किसी भी स्तर पर सुरक्षा से समझौता नहीं हुआ”, और संदिग्धों को जल्द ही पहचान कर रोक लिया गया। फिर भी इस घटना ने प्रशासनिक सतर्कता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


मुंबई पुलिस की तेज कार्रवाई से यह मामला भले ही तुरंत नियंत्रण में आ गया, लेकिन इससे यह साफ है कि सरकारी पदों और पहचान का दुरुपयोग कर ठगी करने वाले गिरोह अब और अधिक चालाकी से सक्रिय हैं। पुलिस ने लोगों से अपील की है कि किसी भी व्यक्ति के सरकारी पहचान या सिफारिश के दावे को सत्यापित किए बिना भरोसा न करें।

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