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OBC आरक्षण की 50% सीमा पर सुप्रीम कोर्ट में ‘आर-पार’ की जंग, क्या निकलेगा स्थायी समाधान?

नई दिल्ली/मुंबई: महाराष्ट्र में लंबे समय से लंबित स्थानीय निकाय चुनावों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बने ‘ओबीसी आरक्षण’ (OBC Reservation) के मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट ने निर्णायक रुख अख्तियार कर लिया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह 50 प्रतिशत की तय सीमा से अधिक आरक्षण की वैधता पर अंतिम सुनवाई करेगी। अदालत का मानना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर एक विस्तृत और गंभीर बहस अनिवार्य है, ताकि भविष्य में बार-बार उठने वाले कानूनी विवादों पर हमेशा के लिए विराम लगाया जा सके।

संवैधानिक मर्यादा और राजनीतिक भविष्य का टकराव

महाराष्ट्र के राजनीतिक गलियारों में ‘स्थानीय निकाय चुनाव’ और ‘ओबीसी आरक्षण’ दो ऐसे विषय हैं, जिन्होंने पिछले कई वर्षों से राज्य की सियासत को गरमाया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अब समय-सीमा निर्धारित कर दी है। कोर्ट ने दोनों पक्षों—राज्य सरकार और याचिकाकर्ताओं—को स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अब इस मामले को और अधिक लटकाया नहीं जा सकता।

सॉलिसिटर जनरल की दलील: क्यों अटके हैं चुनाव?

सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कोर्ट को वर्तमान स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि राज्य की कई नगर परिषदों और पंचायतों में चुनाव केवल इसलिए लंबित हैं क्योंकि ओबीसी आरक्षण के क्रियान्वयन को लेकर कानूनी पेंच फंसा हुआ है।

हालांकि, मेहता ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासन ने उन क्षेत्रों में प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है जहाँ कानूनी अड़चनें कम थीं। उन्होंने जानकारी दी कि:

  • 12 जिला परिषदों और 125 पंचायत समितियों में चुनाव संपन्न कराए जा चुके हैं।

  • इन क्षेत्रों में चुनाव इसलिए संभव हो सके क्योंकि यहाँ कुल आरक्षण (SC/ST/OBC मिलाकर) 50% की संवैधानिक सीमा के भीतर था।

  • विवाद केवल उन निकायों में है जहाँ ओबीसी कोटा शामिल करने के बाद कुल आरक्षण 50% से ऊपर चला जाता है।

कोर्ट की टिप्पणी: “बार-बार के विवाद का स्थायी अंत जरूरी”

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जहाँ अंतरिम निर्देशों का पालन हो चुका है, वहाँ अब उस मूल प्रश्न को संबोधित करना आवश्यक है कि क्या विशेष परिस्थितियों में आरक्षण की सीमा 50% से अधिक हो सकती है।

CJI ने जोर देकर कहा, यह विवाद हर चुनाव के समय दोबारा खड़ा हो जाता है। हमें इस पर एक समग्र और अंतिम निर्णय लेना होगा ताकि भविष्य के चुनावी ढांचे के लिए एक स्पष्ट मिसाल कायम हो सके।”

सुनवाई का रोडमैप: सुप्रीम कोर्ट की तैयारी

अदालत ने इस मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाने के लिए एक सख्त रूपरेखा तैयार की है:

  1. संक्षिप्त नोट: कोर्ट ने दोनों पक्षों को अपने तर्कों का एक संक्षिप्त नोट (Brief Note) दाखिल करने का निर्देश दिया है।

  2. समय प्रबंधन: मौखिक दलीलों के लिए दोनों पक्षों को एक-एक कार्यदिवस (Working Day) का समय दिया जाएगा।

  3. तारीख का निर्धारण: सुप्रीम कोर्ट जल्द ही अंतिम सुनवाई की तारीख तय करेगा, जिसके बाद लगातार बहस के जरिए फैसला सुरक्षित किया जा सकता है।

50% की सीमा का पेंच और महाराष्ट्र की राजनीति

गौरतलब है कि ‘इंद्रा साहनी’ मामले के ऐतिहासिक फैसले के अनुसार, आरक्षण की कुल सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए। हालांकि, महाराष्ट्र सरकार का तर्क रहा है कि ओबीसी समुदाय की विशाल जनसंख्या और उनके पिछड़ेपन के डेटा (Triple Test) के आधार पर उन्हें प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।

विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच इस मुद्दे पर अक्सर ‘क्रेडिट वॉर’ भी देखी जाती है। जहाँ महायुति सरकार इसे अपनी प्रतिबद्धता बता रही है, वहीं विपक्षी दल इसे सरकार की विफलता के तौर पर पेश करते रहे हैं। अब सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वह न केवल महाराष्ट्र बल्कि देश के अन्य राज्यों के लिए भी ‘नजीर’ साबित होगा जहाँ स्थानीय निकायों में ओबीसी कोटे को लेकर विवाद चल रहा है।

महाराष्ट्र निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से उन हजारों उम्मीदवारों को उम्मीद जगी है जो पिछले दो-तीन वर्षों से चुनावों का इंतजार कर रहे हैं। यदि अदालत 50% की सीमा पर कोई ऐतिहासिक स्पष्टीकरण देती है, तो यह भारतीय चुनावी राजनीति के ‘आरक्षण मॉडल’ में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

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