‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल’ में तेज संगीत और डांस को लेकर शुरू हुआ विवाद अब धार्मिक परंपराओं तक पहुंचा; पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने बदरीनाथ में संगीत की परंपरा का दिया हवाला, चारधाम महापंचायत ने बयान पर जताई कड़ी आपत्ति
देहरादून/बदरीनाथ: उत्तराखंड के विश्व प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम में आयोजित ‘देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026’ को लेकर शुरू हुआ विवाद लगातार गहराता जा रहा है। पहले विवाद कार्यक्रम में तेज संगीत, डीजे और डांस को लेकर था, लेकिन अब यह बहस बदरीनाथ धाम की धार्मिक परंपराओं, शंख ध्वनि और सांस्कृतिक आयोजनों की सीमा तक पहुंच गई है। कार्यक्रम को लेकर तीर्थ पुरोहितों और धार्मिक संतों की आपत्तियों के बीच उत्तराखंड के संस्कृति-धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने बदरीनाथ में संगीत की परंपरा का हवाला देते हुए कार्यक्रम के पक्ष में तर्क रखे। उनके शंख को लेकर दिए गए बयान पर अब चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब बदरीनाथ धाम जैसे धार्मिक और हिमालयी क्षेत्र में आधुनिक मनोरंजन आधारित कार्यक्रमों के आयोजन को लेकर पहले से ही सोशल मीडिया और धार्मिक संगठनों के बीच बहस चल रही है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, दो दिवसीय देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026 का आयोजन 19 और 20 सितंबर को बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में भारतीय सेना और चमोली जिला प्रशासन की ओर से ऑपरेशन सद्भावना के तहत किया गया था। कार्यक्रम की थीम ‘हमारी विरासत, हमारा भविष्य’ थी।
आखिर विवाद शुरू कैसे हुआ?
दरअसल, बदरीनाथ के टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में आयोजित इस महोत्सव में लोक संस्कृति, स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ संगीत कार्यक्रम भी हुए। आयोजन का घोषित उद्देश्य सीमांत क्षेत्र की संस्कृति, स्थानीय प्रतिभाओं, हस्तशिल्प और परंपराओं को मंच उपलब्ध कराना था।
लेकिन कार्यक्रम से जुड़े कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद विवाद शुरू हो गया। इन वीडियो में तेज संगीत के बीच कलाकारों की प्रस्तुति और दर्शकों को नाचते हुए देखा गया। इसके बाद कई लोगों ने सवाल उठाया कि बदरीनाथ जैसे प्रमुख तीर्थस्थल से जुड़े क्षेत्र में इस तरह के तेज संगीत और मनोरंजन आधारित कार्यक्रम आयोजित करना धार्मिक वातावरण और धाम की परंपराओं के अनुरूप है या नहीं।
यानी विवाद का मूल सवाल कार्यक्रम आयोजित करने के उद्देश्य से ज्यादा उसके स्वरूप और प्रस्तुति को लेकर सामने आया।
उत्तराखंड चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने भी यही तर्क रखा कि सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक लोक प्रस्तुतियां अलग विषय हैं, लेकिन धार्मिक स्थल के वातावरण में तेज ध्वनि और आधुनिक डीजे आधारित प्रस्तुति को लेकर अलग मानदंडों पर विचार किया जाना चाहिए।
सेना और प्रशासन के आयोजन पर भी उठे सवाल
यह कार्यक्रम भारतीय सेना और जिला प्रशासन चमोली के संयुक्त तत्वावधान में ऑपरेशन सद्भावना के तहत आयोजित किया गया था। आधिकारिक विवरणों में इसे स्थानीय संस्कृति, सीमांत गांवों और सेना-नागरिक सहयोग को बढ़ावा देने वाला आयोजन बताया गया।
महोत्सव में स्थानीय संस्कृति, लोक परंपराओं, हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पादों और सीमांत गांवों की जीवनशैली को प्रदर्शित किया गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी कार्यक्रम में शामिल हुए और स्थानीय उत्पादों व सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े स्टॉलों का अवलोकन किया।
हालांकि, सोशल मीडिया पर सामने आए संगीत कार्यक्रम के वीडियो ने पूरे आयोजन की चर्चा का केंद्र बदल दिया। अब बहस इस बात पर होने लगी कि क्या बदरीनाथ जैसे धार्मिक क्षेत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति का स्वरूप भी वहां की धार्मिक मर्यादाओं के अनुरूप निर्धारित किया जाना चाहिए?
सतपाल महाराज ने क्या कहा?
विवाद के बीच उत्तराखंड के संस्कृति-धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने बदरीनाथ में संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों को लेकर उठ रहे सवालों पर अपना पक्ष रखा।
उन्होंने बदरीनाथ की भौगोलिक स्थिति और वहां होने वाली अलग-अलग परंपराओं का उदाहरण देते हुए कहा कि धाम में संगीत को पूरी तरह निषिद्ध मानना उचित नहीं है। उन्होंने मंदिर, नर पर्वत और नारायण पर्वत का उल्लेख करते हुए बदरीनाथ आने वाले श्रद्धालुओं के मार्ग और आसपास होने वाली गतिविधियों का संदर्भ दिया।
महाराज ने शंख बजाने के सवाल पर भी अपनी बात रखी। उनका कहना था कि यह कहना सही नहीं है कि बदरीनाथ में कहीं भी शंख नहीं बजता। उनके अनुसार मंदिर के अंदर पूजा के दौरान शंख के इस्तेमाल को लेकर अलग धार्मिक मान्यता है, जबकि मंदिर के बाहर शंख बजाए जाने की बात कही जाती है।
उन्होंने भगवान विष्णु और भगवान कृष्ण से जुड़े शंख का उदाहरण भी दिया।
यही बयान अब विवाद का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है।
‘शंख जानवर की हड्डी से बना होता है’—इस बयान पर क्यों भड़के पुरोहित?
सतपाल महाराज के बयान में शंख को लेकर कही गई बात पर चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत ने आपत्ति जताई। महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती ने मंत्री के बयान पर सवाल उठाते हुए इसे धार्मिक और शास्त्रीय दृष्टि से आपत्तिजनक बताया।
बृजेश सती के मुताबिक सनातन परंपरा में शंख का धार्मिक महत्व रहा है और शुभ अवसरों तथा धार्मिक अनुष्ठानों में शंखनाद की परंपरा विभिन्न स्थानों पर देखने को मिलती है। उन्होंने मंत्री से शास्त्रों और पुराणों का अध्ययन करने तथा ऐसे विषयों पर बयान देने से पहले विशेषज्ञों से सलाह लेने की बात कही।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मंत्री का बयान और पुरोहित महापंचायत की प्रतिक्रिया दोनों संबंधित पक्षों के अपने-अपने दावे और व्याख्याएं हैं। इन धार्मिक मान्यताओं की अलग-अलग परंपराओं में अलग व्याख्या हो सकती है।
बदरीनाथ में शंख को लेकर क्या मान्यता है?
बदरीनाथ धाम में शंख ध्वनि को लेकर एक विशिष्ट धार्मिक मान्यता का उल्लेख लंबे समय से किया जाता रहा है। धार्मिक परंपरा से जुड़े लोगों का कहना है कि बदरीकाश्रम क्षेत्र में भगवान नर-नारायण की तपस्या से जुड़ी मान्यताओं के कारण शंख बजाने को लेकर विशेष परंपरा है।
तीर्थ पुरोहितों और संतों का तर्क है कि यदि किसी स्थान पर सदियों से कोई विशिष्ट धार्मिक मर्यादा चली आ रही है, तो वहां आयोजित होने वाले आधुनिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उस परंपरा का ध्यान रखा जाना चाहिए।
अमर उजाला की रिपोर्ट में भी चारधाम महापंचायत और ज्योतिर्मठ से जुड़े संतों द्वारा बदरीनाथ में शंख ध्वनि से संबंधित धार्मिक मान्यता का हवाला देते हुए तेज संगीत पर आपत्ति दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।
सतपाल महाराज ने सेना के बैंड का भी दिया उदाहरण
पर्यटन मंत्री ने अपने पक्ष में बदरीनाथ धाम में होने वाले मिलिट्री बैंड का भी उदाहरण दिया। उनका तर्क था कि कपाट खुलने और बंद होने के अवसरों पर सैन्य बैंड की मौजूदगी और वादन की परंपरा रही है। ऐसे में यह कहना कि बदरीनाथ में संगीत के लिए कोई स्थान नहीं है, पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता।
महाराज ने बदरीनाथ क्षेत्र के अन्य सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों का भी उदाहरण दिया। उन्होंने उर्वशी पीठ और माणा गांव की परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि स्थानीय जीवन में संगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का अपना स्थान है।
माणा गांव में विवाह जैसे पारंपरिक अवसरों पर ढोल-दमाऊं बजाए जाने का उदाहरण भी उन्होंने दिया।
इस तर्क का मूल आधार यह है कि संगीत अपने आप में निषिद्ध नहीं है, बल्कि स्थान, अवसर और उसके स्वरूप को लेकर अंतर किया जाना चाहिए।
महापंचायत ने कहा—पारंपरिक वाद्य और DJ को एक नहीं माना जा सकता
दूसरी ओर चारधाम महापंचायत के महासचिव बृजेश सती ने मंत्री के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि पारंपरिक धार्मिक वाद्ययंत्रों और आधुनिक डीजे या तेज ध्वनि वाले साउंड सिस्टम को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
उनका तर्क है कि मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर होने वाले पारंपरिक वादन का उद्देश्य और आधुनिक मनोरंजन कार्यक्रम का स्वरूप अलग होता है।
महापंचायत की ओर से यह भी कहा गया कि धार्मिक स्थल पर तेज ध्वनि का इस्तेमाल केवल धार्मिक परंपरा का मुद्दा नहीं है, बल्कि ध्वनि प्रदूषण और वहां के शांत वातावरण का भी सवाल है।
विवाद अब सिर्फ DJ तक सीमित नहीं
बदरीनाथ का यह विवाद अब कई स्तरों पर चर्चा में है।
पहला सवाल है कि क्या धार्मिक स्थल के आसपास आधुनिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होना चाहिए?
दूसरा सवाल कार्यक्रम के स्वरूप और ध्वनि स्तर को लेकर है।
तीसरा सवाल धार्मिक परंपराओं और आधुनिक सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच संतुलन का है।
और चौथा सवाल यह है कि यदि ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं, तो उनके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और ध्वनि सीमा पहले से तय होनी चाहिए या नहीं।
इसी वजह से यह विवाद अब केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि धार्मिक स्थलों पर सांस्कृतिक आयोजनों की नीति को लेकर व्यापक बहस का रूप ले रहा है।
प्रशासन ने भी लोगों से की तथ्य जांच की अपील
विवाद के बीच प्रशासन की ओर से लोगों से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही सामग्री के आधार पर तुरंत निष्कर्ष नहीं निकालने की अपील की गई है। प्रशासन ने कहा है कि इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित किसी भी सूचना या पोस्ट को साझा करने से पहले उसके तथ्यों की पुष्टि की जानी चाहिए।
यह अपील इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वायरल वीडियो अक्सर पूरे कार्यक्रम की बजाय उसके किसी एक हिस्से को दिखाते हैं। ऐसे में किसी आयोजन के पूरे उद्देश्य और स्वरूप को समझने के लिए आधिकारिक जानकारी और प्रत्यक्ष तथ्यों को देखना जरूरी होता है।
धार्मिक मर्यादा बनाम सांस्कृतिक आयोजन—अब आगे क्या?
बदरीनाथ में हुआ यह विवाद उत्तराखंड के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रखता है—क्या देवभूमि के धार्मिक स्थलों पर सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देते समय वहां की पारंपरिक मर्यादाओं के लिए अलग नियम होने चाहिए?
एक पक्ष का कहना है कि लोक संस्कृति, स्थानीय कलाकारों और सीमांत क्षेत्रों की परंपराओं को मंच देना जरूरी है। दूसरी ओर तीर्थ पुरोहित और धार्मिक संगठन चाहते हैं कि ऐसे कार्यक्रमों का स्वरूप धार्मिक वातावरण और परंपराओं के अनुरूप रहे।
दरअसल, देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल का घोषित उद्देश्य स्थानीय संस्कृति और विरासत को सामने लाना था, लेकिन कार्यक्रम में हुए कुछ संगीत प्रस्तुतियों के वीडियो ने आयोजन की चर्चा को धार्मिक मर्यादा के सवाल में बदल दिया।
ऐसे में आगे का रास्ता शायद इसी बात पर निर्भर करेगा कि प्रशासन, पर्यटन विभाग, सेना, स्थानीय समुदाय और धार्मिक प्रतिनिधि मिलकर ऐसे आयोजनों के लिए किस तरह की स्पष्ट व्यवस्था तैयार करते हैं।
फिलहाल इतना साफ है कि बदरीनाथ का DJ विवाद अभी थमा नहीं है। एक तरफ मंत्री सतपाल महाराज संगीत की परंपरा, सैन्य बैंड और स्थानीय संस्कृति के उदाहरण देकर अपना पक्ष रख रहे हैं, वहीं चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत धाम की धार्मिक मर्यादा, शंख से जुड़ी मान्यताओं और तेज ध्वनि वाले आधुनिक कार्यक्रमों के बीच अंतर पर जोर दे रही है।
और अब विवाद का सबसे चर्चित हिस्सा बन चुका है ‘शंख’ वाला बयान, जिसने पहले से चल रही बहस को और तीखा कर दिया है। आने वाले दिनों में इस मामले पर प्रशासनिक स्तर पर क्या रुख सामने आता है और क्या धार्मिक स्थलों पर ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए कोई नई व्यवस्था या दिशा-निर्देश तय किए जाते हैं, इस पर सबकी नजर रहेगी।
