नई दिल्ली: देशभर में रिहायशी संपत्तियों और कॉलोनियों का नियमों के विपरीत व्यावसायिक इस्तेमाल करने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख बेहद सख्त नजर आ रहा है। चेन्नई में रिहायशी क्षेत्र के कथित अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल से शुरू हुए मामले का दायरा बढ़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के संबंधित नगर निकायों और स्थानीय प्राधिकरणों को ऐसे मामलों की पहचान करने और कानून के मुताबिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जहां रिहायशी इस्तेमाल के लिए निर्धारित संपत्ति का नियमों के विरुद्ध गैर-रिहायशी या व्यावसायिक इस्तेमाल पाया जाता है, वहां संबंधित प्राधिकरण कार्रवाई को प्राथमिकता दें और उल्लंघन स्थापित होने पर परिसर को सील करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने 25 मार्च 2026 को चेन्नई से जुड़े मामले का दायरा व्यापक करते हुए राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की राजधानियों के नगर निकायों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया था। अदालत ने संबंधित क्षेत्रों में व्यापक जांच कर यह पता लगाने को कहा था कि कौन-कौन से इलाके विशेष रूप से रिहायशी इस्तेमाल के लिए निर्धारित हैं, लेकिन वहां नियमों के विपरीत गैर-रिहायशी गतिविधियां संचालित हो रही हैं।
रिहायशी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियों पर नजर
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला केवल किसी एक मकान या एक शहर तक सीमित नहीं रहा। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि कई स्थानों पर बिल्डिंग बायलॉज और लैंड-यूज नियमों का उल्लंघन करते हुए रिहायशी इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू कर दी जाती हैं। ऐसे मामलों में संपत्ति का इस्तेमाल उस उद्देश्य से अलग किया जाता है, जिसके लिए सक्षम प्राधिकरण से अनुमति दी गई थी।
मसलन, यदि किसी इलाके को मुख्य रूप से आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित किया गया है और वहां बिना आवश्यक अनुमति के दुकान, कार्यालय, गोदाम, व्यावसायिक प्रतिष्ठान या अन्य गैर-रिहायशी गतिविधि संचालित की जा रही है, तो संबंधित स्थानीय नियमों के तहत उसकी जांच की जा सकती है। हालांकि किसी संपत्ति पर कार्रवाई का आधार संबंधित शहर के मास्टर प्लान, जोनिंग नियमों, भवन उपविधियों, स्वीकृत नक्शे और लागू कानूनों पर निर्भर करेगा।
‘पिक एंड चूज’ तरीके से कार्रवाई नहीं चलेगी
सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय प्राधिकरणों को यह भी संकेत दिया है कि कार्रवाई में भेदभाव नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा कि अधिकारी नियमों के उल्लंघन के मामलों में चयनात्मक रवैया नहीं अपना सकते। यदि किसी क्षेत्र में कार्रवाई की आवश्यकता है तो उसे समान रूप से लागू किया जाना चाहिए।
पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि प्राधिकरणों द्वारा ‘पिक एंड चूज’ यानी चुनिंदा मामलों में कार्रवाई और दूसरे मामलों में आंखें बंद करने की नीति अपनाई गई तो अदालत इस मुद्दे को गंभीरता से देखेगी। इसका सीधा अर्थ यह है कि स्थानीय निकायों को अपने अधिकार क्षेत्र में नियमों के उल्लंघन की पहचान करते समय निष्पक्ष और समान प्रक्रिया अपनानी होगी।
कॉलोनियों के स्वरूप में बदलाव पर भी चिंता
अदालत के सामने ऐसे मामलों का भी उल्लेख हुआ जहां मूल रूप से रिहायशी कॉलोनियों को धीरे-धीरे व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र में बदल दिया जाता है। कई बार एक-दो संपत्तियों से शुरू हुई व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ते-बढ़ते पूरे क्षेत्र के स्वरूप को प्रभावित करने लगती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की स्थिति के व्यापक प्रभावों की ओर भी ध्यान दिलाया। रिहायशी इलाके में बड़ी संख्या में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू होने से यातायात, पार्किंग, शोर, कचरा, सार्वजनिक सुविधाओं पर दबाव और आसपास रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा पर्यावरण और नागरिक सुविधाओं पर भी इसका असर पड़ सकता है।
घर खरीदने वाले लोगों के हित का भी मुद्दा
अदालत ने इस पहलू को भी महत्वपूर्ण माना कि लोग रिहायशी कॉलोनियों में घर या जमीन खरीदते समय उस क्षेत्र के निर्धारित उपयोग और वहां उपलब्ध सुविधाओं को ध्यान में रखते हैं। यदि बाद में उसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अनधिकृत व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाएं तो इससे वास्तविक निवासियों को परेशानी हो सकती है।
ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय निवासियों को यातायात और पार्किंग की समस्या के साथ-साथ शोर, भीड़ और अन्य नागरिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। अदालत ने इसी व्यापक सार्वजनिक हित के संदर्भ में रिहायशी संपत्तियों के अनधिकृत गैर-रिहायशी इस्तेमाल पर निगरानी की आवश्यकता पर जोर दिया है।
नगर निकायों को करना होगा सर्वे
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित नगर निकायों को अपने-अपने अधिकार क्षेत्र में व्यापक जांच करने को कहा है। इसका उद्देश्य उन क्षेत्रों की पहचान करना है जिन्हें विशेष रूप से रिहायशी उपयोग के लिए निर्धारित किया गया है, लेकिन वहां नियमों के विपरीत गैर-रिहायशी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। अदालत ने इस प्रक्रिया को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रखने के बजाय वास्तविक स्थिति की जांच पर जोर दिया है।
यह मामला मूल रूप से चेन्नई में एक रिहायशी संपत्ति के कथित अनधिकृत इस्तेमाल से जुड़ा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे के व्यापक स्वरूप को देखते हुए इसे राष्ट्रीय स्तर पर देखने का फैसला किया। इससे देश के विभिन्न शहरों में रिहायशी और व्यावसायिक भूमि उपयोग से जुड़े नियमों के पालन पर स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी बढ़ गई है।
उल्लंघन मिला तो कार्रवाई संभव
अदालत के निर्देशों का प्रमुख संदेश यह है कि रिहायशी क्षेत्र में नियमों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधि संचालित करने के मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। जहां सक्षम प्राधिकरण की जांच में स्पष्ट उल्लंघन सामने आता है, वहां लागू कानून और नियमों के अनुसार सीलिंग, ध्वस्तीकरण या अन्य वैधानिक कार्रवाई की जा सकती है।
हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि देश के हर रिहायशी मकान में चल रही हर गतिविधि स्वतः अवैध मानी जाएगी। किसी संपत्ति का उपयोग वैध है या नहीं, यह संबंधित क्षेत्र के भूमि उपयोग नियमों, स्थानीय भवन उपविधियों, स्वीकृत नक्शे, अनुमति और अन्य लागू प्रावधानों के आधार पर तय होगा।
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से अब नगर निगमों, नगर पालिकाओं और अन्य स्थानीय निकायों पर अपने क्षेत्रों में भूमि उपयोग और भवन नियमों के पालन को लेकर निगरानी बढ़ाने की जिम्मेदारी आ गई है। आने वाले समय में इस प्रक्रिया के तहत सामने आने वाले मामलों से यह भी स्पष्ट होगा कि अलग-अलग शहरों में रिहायशी क्षेत्रों के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर स्थानीय स्तर पर किस तरह की कार्रवाई की जाती है।
फिलहाल अदालत का जोर इस बात पर है कि रिहायशी क्षेत्रों का अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल नियमों की अनदेखी करके नहीं किया जा सकता और उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित प्राधिकरणों को कानून के मुताबिक प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।
