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Reading: एक खबर पढ़ी और बदल दी लाखों की किस्मत! 40 हजार कैदियों को दिलाई आजादी, इसलिए कहलाती थीं ‘Mother of PIL’
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एक खबर पढ़ी और बदल दी लाखों की किस्मत! 40 हजार कैदियों को दिलाई आजादी, इसलिए कहलाती थीं ‘Mother of PIL’

The Hill India News
Last updated: August 25, 2026 4:33 am
The Hill India News
Published: August 25, 2026
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भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्होंने सिर्फ अदालतों में मुकदमे नहीं लड़े, बल्कि कानून और न्याय की दिशा ही बदल दी। ऐसी ही एक असाधारण महिला थीं कपिला हिंगोरानी, जिन्हें देश में ‘Mother of PIL’ यानी जनहित याचिका की जननी के रूप में याद किया जाता है। एक अखबार में छपी खबर ने उन्हें इतना झकझोर दिया कि उन्होंने उन लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया, जिनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था। न उनके पास पैसे थे, न ताकत और न ही इतने संसाधन कि वे देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच सकें।

Contents
एक अखबार की खबर ने बदल दी जिंदगी की दिशाजब कपिला ने नियमों की दीवार को चुनौती दीसुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और कैदियों को मिली नई उम्मीदयहीं से मजबूत हुई जनहित याचिका की ताकतभागलपुर का वह मामला, जिसने देश को झकझोर दियामहिलाओं के अधिकारों से लेकर फैमिली कोर्ट तक उठाई आवाजकर्मचारियों और गरीब परिवारों की भी बनीं आवाजरिश्वत के खिलाफ अपनी निजी लड़ाई भी बनी मिसालकेन्या से भारत तक, न्याय के लिए समर्पित रही जिंदगीआज भी जिंदा है कपिला हिंगोरानी की विरासत

कपिला हिंगोरानी की इस कानूनी लड़ाई ने न केवल हजारों विचाराधीन कैदियों को आजादी दिलाई, बल्कि भारतीय न्याय व्यवस्था में जनहित याचिका यानी PIL की उस सोच को भी मजबूत किया, जिसने आम और गरीब व्यक्ति के लिए न्याय के दरवाजे खोल दिए। कहा जाता है कि उनकी पहल के बाद देश की विभिन्न जेलों में वर्षों से बंद हजारों विचाराधीन कैदियों को राहत मिली और एक ऐसी न्यायिक क्रांति की शुरुआत हुई, जिसकी गूंज आज भी भारतीय अदालतों में सुनाई देती है।

एक अखबार की खबर ने बदल दी जिंदगी की दिशा

बात साल 1979 की है। जनवरी के शुरुआती दिनों में एक अखबार में बिहार की पटना और मुजफ्फरपुर जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की स्थिति को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित हुई। रिपोर्ट में बताया गया कि कई कैदी वर्षों से जेलों में बंद थे, लेकिन उनके मामलों की सुनवाई तक शुरू नहीं हुई थी।

इनमें कुछ महिलाएं भी शामिल थीं। सबसे दर्दनाक बात यह थी कि कई कैदियों ने जेल में उतना या उससे भी ज्यादा समय बिता दिया था, जितनी सजा उन्हें दोषी साबित होने पर मिल सकती थी। यानी जिन लोगों का अपराध अदालत में साबित भी नहीं हुआ था, वे सालों से सलाखों के पीछे जिंदगी गुजार रहे थे।

जब सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली वकील कपिला हिंगोरानी और उनके पति निर्मल हिंगोरानी ने यह खबर पढ़ी तो वे बेहद व्यथित हो उठे। उनके सामने सवाल था कि आखिर ऐसे लोगों की आवाज कौन बनेगा? गरीब और बेबस कैदियों के पास न तो महंगे वकील करने के लिए पैसे थे और न ही सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने की क्षमता।

यहीं से शुरू हुई एक ऐसी कानूनी लड़ाई, जिसने भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया।

जब कपिला ने नियमों की दीवार को चुनौती दी

उस समय न्यायालय तक पहुंचने के नियम आज की तुलना में काफी सीमित थे। आमतौर पर किसी मामले में वही व्यक्ति अदालत जा सकता था, जो सीधे तौर पर पीड़ित हो या फिर उसके पास पीड़ित की ओर से कानूनी अधिकार हो। ऐसे में किसी अखबार की रिपोर्ट के आधार पर उन अज्ञात और गरीब कैदियों की तरफ से सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचना आसान नहीं था।

लेकिन कपिला हिंगोरानी ने इस कानूनी बाधा को ही चुनौती देने का फैसला किया। उन्होंने ठान लिया कि अगर पीड़ित अपनी आवाज अदालत तक नहीं पहुंचा सकते तो कोई और उनकी आवाज बनेगा।

11 जनवरी 1979 को उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। यह मामला आगे चलकर ‘हुसैनआरा खातून बनाम बिहार राज्य’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। हुसैनआरा खातून उन विचाराधीन कैदियों में शामिल एक महिला थीं, जिनकी स्थिति ने देश का ध्यान जेलों में बंद गरीब कैदियों की ओर खींचा।

यह सिर्फ एक मुकदमा नहीं था। यह उस व्यवस्था के खिलाफ सवाल था, जिसमें किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के वर्षों तक जेल में रखा जा सकता था।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और कैदियों को मिली नई उम्मीद

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को नोटिस जारी किया। इसके बाद जो हुआ, उसने देश की न्याय व्यवस्था में गरीब और कमजोर वर्गों के अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी।

9 मार्च 1979 को न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती की अगुवाई वाली पीठ ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने विचाराधीन कैदियों की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई और उन्हें राहत देने के निर्देश दिए।

इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था त्वरित सुनवाई के अधिकार को मौलिक अधिकारों से जोड़ना। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को अनिश्चित समय तक मुकदमे की प्रतीक्षा में जेल में नहीं रखा जा सकता। न्याय केवल फैसला सुनाने का नाम नहीं है, बल्कि समय पर न्याय मिलना भी उतना ही जरूरी है।

कपिला हिंगोरानी की इस लड़ाई ने यह सवाल पूरे देश के सामने रख दिया कि अगर कोई गरीब व्यक्ति वकील की फीस नहीं दे सकता तो क्या उसका न्याय पाने का अधिकार खत्म हो जाना चाहिए? अदालत ने इस मुद्दे पर भी गंभीरता दिखाई और गरीब आरोपियों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता को मजबूत किया।

इसके बाद देश की जेलों में बंद हजारों विचाराधीन कैदियों को राहत मिलने का रास्ता खुला। रिपोर्टों और विभिन्न विवरणों में बताया गया कि इस कानूनी हस्तक्षेप के बाद बड़ी संख्या में ऐसे कैदी जेलों से बाहर आए, जो लंबे समय से बिना प्रभावी सुनवाई के बंद थे।

यहीं से मजबूत हुई जनहित याचिका की ताकत

कपिला हिंगोरानी की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल हजारों कैदियों को राहत दिलाना नहीं थी। उनकी लड़ाई ने भारतीय न्याय व्यवस्था में उस सिद्धांत को मजबूती दी, जिसे आज हम जनहित याचिका या PIL के रूप में जानते हैं।

PIL की मूल भावना यही है कि यदि कोई गरीब, कमजोर या वंचित व्यक्ति अपनी स्थिति के कारण अदालत तक नहीं पहुंच सकता तो कोई सामाजिक कार्यकर्ता, संस्था या संवेदनशील नागरिक सार्वजनिक हित में उसकी ओर से न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

इस व्यवस्था ने भारतीय न्यायपालिका को आम जनता के और करीब लाने में बड़ी भूमिका निभाई। पर्यावरण, मानवाधिकार, श्रमिकों के अधिकार, जेल सुधार, महिलाओं की सुरक्षा और गरीबों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों में जनहित याचिकाओं ने न्यायिक हस्तक्षेप का रास्ता खोला।

कपिला हिंगोरानी ने एक तरह से यह साबित कर दिया कि अदालत की चौखट केवल अमीर और प्रभावशाली लोगों के लिए नहीं है। यदि कानून का सही इस्तेमाल किया जाए तो एक बेबस व्यक्ति की आवाज भी देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच सकती है।

भागलपुर का वह मामला, जिसने देश को झकझोर दिया

कपिला हिंगोरानी की कानूनी लड़ाई यहीं नहीं रुकी। कुछ समय बाद बिहार के भागलपुर से एक और गंभीर मामला सामने आया। आरोप था कि पुलिस हिरासत में कुछ लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और उनकी आंखों को नुकसान पहुंचाकर उन्हें अंधा कर दिया गया।

इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। जब मामले की जानकारी कपिला हिंगोरानी तक पहुंची तो उन्होंने इसे केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और कानून के शासन पर गंभीर हमला माना।

उन्होंने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया। अदालत के हस्तक्षेप के बाद मामले की जांच हुई और पीड़ितों को राहत, इलाज और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर महत्वपूर्ण कार्रवाई की गई। इस प्रकरण ने एक बार फिर साबित किया कि पुलिस या प्रशासन की शक्ति कानून और संविधान से ऊपर नहीं हो सकती।

कपिला हिंगोरानी ने अपनी कानूनी लड़ाइयों के माध्यम से यह संदेश दिया कि राज्य की जिम्मेदारी केवल कानून लागू करना नहीं है, बल्कि हर नागरिक के जीवन, सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना भी है।

महिलाओं के अधिकारों से लेकर फैमिली कोर्ट तक उठाई आवाज

कपिला हिंगोरानी की पहचान केवल कैदियों और मानवाधिकारों की लड़ाई तक सीमित नहीं रही। उन्होंने महिलाओं से जुड़े मुद्दों और पारिवारिक न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए भी महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक प्रयास किए।

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों और दहेज से जुड़े मामलों पर भी उन्होंने आवाज उठाई। उनका मानना था कि कानून केवल किताबों में रहने के लिए नहीं है, बल्कि उसका लाभ उस महिला तक भी पहुंचना चाहिए जो सामाजिक या आर्थिक रूप से कमजोर है।

उन्होंने देश में पारिवारिक विवादों के समाधान के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था की जरूरत पर भी जोर दिया। फैमिली कोर्ट की अवधारणा को आगे बढ़ाने वाले प्रयासों में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है। पारिवारिक मामलों को सामान्य मुकदमों से अलग संवेदनशील तरीके से सुनने की जरूरत को लेकर उन्होंने लगातार आवाज उठाई।

कर्मचारियों और गरीब परिवारों की भी बनीं आवाज

कपिला हिंगोरानी ने अपनी कानूनी क्षमता का इस्तेमाल केवल चर्चित मामलों के लिए नहीं किया। उन्होंने उन लोगों के लिए भी अदालत का रुख किया, जिनकी परेशानियां सुर्खियां नहीं बनती थीं।

जब सरकारी संस्थानों और निगमों के कर्मचारियों को लंबे समय तक वेतन नहीं मिलने जैसी समस्याएं सामने आईं, तब भी उन्होंने न्यायिक माध्यम से राहत दिलाने की कोशिश की। उनके लिए कानून का मतलब केवल बड़े संवैधानिक सवाल नहीं था। उनके लिए वह भूखे कर्मचारी, जेल में बंद गरीब कैदी, अत्याचार झेल रही महिला और अपने अधिकारों के लिए भटकता आम नागरिक भी उतना ही महत्वपूर्ण था।

रिश्वत के खिलाफ अपनी निजी लड़ाई भी बनी मिसाल

कपिला हिंगोरानी की ईमानदारी केवल अदालतों में दिए गए उनके तर्कों तक सीमित नहीं थी। निजी जीवन में भी वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहने के लिए जानी जाती थीं।

एक घटना में उनके घर से जुड़ी पानी की पाइप की समस्या के कारण सड़क पर पानी बहने लगा। इस मामले में नगर निगम की ओर से कार्रवाई की गई। बताया जाता है कि मामला निपटाने के लिए रिश्वत देने का रास्ता भी सुझाया गया, लेकिन कपिला ने इसे स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया।

उन्होंने सिद्धांतों से समझौता करने के बजाय कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया। वर्षों तक चली इस लड़ाई में भी उनका रुख नहीं बदला। यह घटना उनके व्यक्तित्व का एक अलग पक्ष दिखाती है कि वे केवल दूसरों को कानून का सहारा लेने की सलाह नहीं देती थीं, बल्कि खुद भी अपने जीवन में उसी सिद्धांत पर चलती थीं।

केन्या से भारत तक, न्याय के लिए समर्पित रही जिंदगी

कपिला हिंगोरानी का जन्म 27 दिसंबर 1927 को नैरोबी में हुआ था। उन्होंने कानून की पढ़ाई की और बाद में भारत आकर कानूनी क्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया। उस दौर में जब न्यायपालिका और वकालत के क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बेहद कम थी, कपिला ने अपनी अलग पहचान बनाई।

सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने वाली शुरुआती महिला अधिवक्ताओं में शामिल होकर उन्होंने उस समय की सामाजिक सीमाओं को भी चुनौती दी। उन्होंने अपने पति निर्मल हिंगोरानी के साथ मिलकर अनेक महत्वपूर्ण मामलों में काम किया और जनहित से जुड़े मुद्दों को अदालत तक पहुंचाया।

बताया जाता है कि अपने लंबे कानूनी जीवन में उन्होंने बड़ी संख्या में जनहित से जुड़े मामले लड़े और कई बार बिना किसी व्यक्तिगत आर्थिक लाभ की चिंता किए गरीब और वंचित लोगों की मदद की।

30 दिसंबर 2013 को उनके निधन के साथ भारतीय कानूनी जगत ने एक ऐसी आवाज खो दी, जिसने कानून को केवल पेशा नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना।

आज भी जिंदा है कपिला हिंगोरानी की विरासत

आज जनहित याचिकाएं भारतीय न्याय व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समय के साथ PIL के इस्तेमाल और दुरुपयोग दोनों को लेकर बहस भी होती रही है, लेकिन इसकी मूल भावना को समझने के लिए कपिला हिंगोरानी की कहानी को याद करना जरूरी है।

उन्होंने साबित किया कि एक संवेदनशील व्यक्ति की प्रतिक्रिया हजारों लोगों की जिंदगी बदल सकती है। उन्होंने एक अखबार में छपी खबर को केवल पढ़कर भुला नहीं दिया। उन्होंने सवाल पूछा, कानून का सहारा लिया और उन लोगों की तरफ से अदालत पहुंचीं, जिनके पास अपनी बात कहने का कोई माध्यम नहीं था।

कपिला हिंगोरानी की कहानी केवल एक महिला वकील की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस साहस की कहानी है, जिसमें एक व्यक्ति व्यवस्था के सामने खड़ा होकर कहता है कि गरीब होना किसी के अधिकार खत्म होने की वजह नहीं हो सकता।

हजारों कैदियों की आजादी, गरीबों के लिए न्याय की नई राह और जनहित याचिका को मजबूत आधार देने वाली कपिला हिंगोरानी की विरासत आज भी भारतीय लोकतंत्र और न्यायपालिका के लिए प्रेरणा है। शायद यही वजह है कि उन्हें आज भी सम्मान के साथ ‘Mother of PIL’ कहा जाता है—एक ऐसी महिला, जिसने अपनी आवाज से उन लाखों बेजुबान लोगों को बोलने का हक दिलाया, जिनकी आवाज कभी अदालतों तक पहुंच ही नहीं पाती थी।

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