देहरादून: उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) के दौरान सामने आए आंकड़ों ने राजनीतिक दलों के साथ-साथ निर्वाचन तंत्र की भी चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश में मतदाता सूची को अधिक सटीक, पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाने के उद्देश्य से चल रही इस प्रक्रिया के दौरान हजारों आपत्तियां दर्ज की गई हैं। इनमें सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि 40 हजार से ज्यादा मतदाता ऐसे बताए गए हैं, जो सत्यापन के दौरान अपने घरों पर नहीं मिले या स्थायी रूप से दूसरी जगह चले गए हैं। इसके अलावा एक व्यक्ति द्वारा अकेले 5,906 आपत्तियां दर्ज कराए जाने का मामला भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में फॉर्म-10 के माध्यम से कुल 59,604 वास्तविक आपत्तियां दर्ज की गई हैं। इन आपत्तियों का बड़ा हिस्सा मैदानी जिलों और विशेष रूप से ऊधमसिंह नगर तथा हरिद्वार से जुड़े विधानसभा क्षेत्रों से सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार कुल आपत्तियों में 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी मैदानी क्षेत्रों की बताई जा रही है। इससे यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या इन इलाकों में मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव हुए हैं, या फिर राजनीतिक और सामाजिक कारणों से आपत्तियों की संख्या असामान्य रूप से अधिक दर्ज कराई गई है।
सबसे बड़ी चुनौती उन मामलों को लेकर है, जिनमें मतदाताओं के बारे में कहा गया है कि वे अपने पंजीकृत पते पर नहीं मिले या स्थायी रूप से कहीं और स्थानांतरित हो चुके हैं। ऐसे मामलों की संख्या 40,906 बताई गई है, जो कुल वास्तविक आपत्तियों का लगभग 69 प्रतिशत है। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल किसी व्यक्ति का सत्यापन के समय घर पर नहीं मिलना, अपने आप में उसके नाम को मतदाता सूची से हटाने का आधार नहीं हो सकता। निर्वाचन अधिकारियों को प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच करनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में उस पते या विधानसभा क्षेत्र को स्थायी रूप से छोड़ चुका है या केवल अस्थायी रूप से घर से बाहर था।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है। कई लोग नौकरी, पढ़ाई, व्यवसाय या अन्य व्यक्तिगत कारणों से कुछ समय के लिए अपने घर से बाहर रहते हैं। ऐसे मामलों में केवल एक बार घर पर अनुपस्थित पाए जाने के आधार पर उन्हें स्थायी रूप से स्थानांतरित मान लेना उचित नहीं होगा। यही कारण है कि 40,906 मामलों का सत्यापन निर्वाचन आयोग और स्थानीय निर्वाचन अधिकारियों के लिए एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन सकता है।
रिपोर्ट में आपत्तियों के कारणों का अलग-अलग वर्गीकरण भी किया गया है। इसमें Absent/Permanently Shifted श्रेणी में सबसे अधिक 40,906 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा 2,575 मामलों में मतदाता के स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित होने से संबंधित आपत्तियां अलग से दर्ज की गई हैं। इसके साथ ही 14,358 आपत्तियां ऐसे मामलों से संबंधित बताई गई हैं, जहां संबंधित व्यक्ति पहले से ही मतदाता के रूप में नामांकित है। यह श्रेणी मतदाता सूची में संभावित डुप्लीकेट या एक से अधिक स्थानों पर नाम दर्ज होने जैसे मामलों की ओर संकेत करती है।
अन्य आपत्तियों में 804 मामलों में मतदाता की मृत्यु, 143 मामलों में कम उम्र, 205 मामलों में भारतीय नागरिक नहीं होने तथा 607 मामलों में आपत्ति का कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं होने की बात सामने आई है। इन सभी आंकड़ों को मिलाकर कुल 59,604 वास्तविक आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इससे साफ है कि मामला केवल उन मतदाताओं तक सीमित नहीं है जो अपने घरों पर नहीं मिले, बल्कि मतदाता सूची की शुद्धता से जुड़े कई अन्य मुद्दे भी इस पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान सामने आए हैं।
हालांकि, SIR के दौरान सबसे ज्यादा ध्यान जिस आंकड़े ने खींचा है, वह है एक व्यक्ति द्वारा हजारों आपत्तियां दर्ज कराना। रिपोर्ट के मुताबिक राजेश तिवारी नाम के व्यक्ति ने अकेले 5,906 आपत्तियां दर्ज कराईं, जो सभी किच्छा विधानसभा क्षेत्र से संबंधित हैं। यह संख्या प्रदेश में दर्ज कुल 59,604 वास्तविक आपत्तियों का करीब दस प्रतिशत है। यानी राज्य भर में जितनी आपत्तियां दर्ज हुईं, उनमें एक बड़ा हिस्सा केवल एक व्यक्ति की ओर से दाखिल किया गया।
किच्छा विधानसभा क्षेत्र में कुल 8,767 आपत्तियां दर्ज की गई हैं और यह प्रदेश में सबसे अधिक आपत्तियों वाला विधानसभा क्षेत्र बताया गया है। इनमें से 5,906 आपत्तियां अकेले राजेश तिवारी की ओर से दर्ज कराई गईं। इसका अर्थ है कि किच्छा में दर्ज कुल आपत्तियों का बड़ा हिस्सा एक ही व्यक्ति से जुड़ा हुआ है। इतनी बड़ी संख्या में एक व्यक्ति द्वारा आपत्तियां दाखिल किए जाने के बाद अब हर आपत्ति के आधार, प्रमाण और वास्तविकता की जांच करना निर्वाचन अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है।
SIR प्रक्रिया में आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था इसलिए की जाती है ताकि मतदाता सूची में मौजूद गलतियों, डुप्लीकेट नामों, मृत व्यक्तियों के नाम, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों और अन्य त्रुटियों को दूर किया जा सके। लेकिन जब हजारों आपत्तियां सीमित संख्या में व्यक्तियों की ओर से आती हैं, तो निर्वाचन अधिकारियों के सामने यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे किसी भी आपत्ति को केवल संख्या के आधार पर सही न मानें, बल्कि प्रत्येक मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करें।
इसी मुद्दे को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा से जुड़े लोग कथित रूप से कुछ खास मतदाताओं को निशाना बनाकर उनके नामों के खिलाफ आपत्तियां दर्ज करा रहे हैं। कांग्रेस नेता अमेंद्र बिष्ट का आरोप है कि मुस्लिम मतदाताओं या कांग्रेस समर्थक माने जाने वाले मतदाताओं को टारगेट करने की कोशिश की जा रही है, ताकि उनके नाम मतदाता सूची से हट सकें। कांग्रेस का कहना है कि बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज कराना अपने आप में चिंता का विषय है और प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
कांग्रेस ने विशेष रूप से राजेश तिवारी द्वारा दर्ज कराई गई 5,906 आपत्तियों का मुद्दा उठाया है। पार्टी का आरोप है कि राजेश तिवारी भाजपा के BLA-1 के रूप में कार्य कर रहे हैं और उन्होंने कथित रूप से उन लोगों के खिलाफ बड़ी संख्या में आपत्तियां दर्ज की हैं, जिन्हें कांग्रेस समर्थक मतदाता के रूप में चिह्नित किया गया है। हालांकि, इन आरोपों की जांच और अंतिम सत्यापन निर्वाचन अधिकारियों की प्रक्रिया के तहत ही होगा।
दूसरी ओर, भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस एक विशेष समाज को खुश करने के उद्देश्य से SIR प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर रही है, जबकि निर्वाचन आयोग अपने स्तर पर नियमों के अनुसार पूरी प्रक्रिया को संचालित कर रहा है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी का कहना है कि निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक राजनीतिक आरोप लगाने के बजाय सभी पक्षों को निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया का इंतजार करना चाहिए।
राजनीतिक बहस के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपत्ति दर्ज होने मात्र से किसी मतदाता का नाम सूची से स्वतः नहीं हट जाता। निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया के तहत जिस व्यक्ति के नाम के खिलाफ आपत्ति दर्ज की जाती है, उसे अपनी बात रखने का अवसर मिलता है। आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति को भी अपने दावे का आधार स्पष्ट करना पड़ सकता है। दोनों पक्षों की बात और उपलब्ध दस्तावेजों या तथ्यों पर विचार करने के बाद ही संबंधित अधिकारी अंतिम निर्णय लेते हैं।
इस मामले में निर्वाचन आयोग के ACEO विजय कुमार जोगदंडे ने भी स्पष्ट किया है कि केवल किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति दर्ज हो जाने से उसका नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जाता। उन्होंने कहा कि आपत्ति दर्ज करने वाले और जिस व्यक्ति के खिलाफ आपत्ति की गई है, दोनों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाता है। इसके बाद संबंधित तथ्यों और प्रक्रिया के आधार पर निर्णय लिया जाता है। यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है ताकि किसी भी पात्र मतदाता का नाम बिना उचित जांच के मतदाता सूची से न हटे।
उत्तराखंड में आपत्तियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो किच्छा के बाद हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र में 7,312 और जसपुर में 6,720 आपत्तियां दर्ज की गई हैं। इसके बाद काशीपुर में 5,704, रुद्रपुर में 4,958, गदरपुर में 4,785, झबरेड़ा में 2,333, सितारगंज में 1,612, बाजपुर में 1,475 और हरिद्वार ग्रामीण में 1,400 आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि आपत्तियों का बड़ा हिस्सा उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों में केंद्रित है। खासकर ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार से जुड़े क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाता सूची के खिलाफ आवेदन दर्ज कराए गए हैं। इसके पीछे वास्तविक कारण क्या हैं, इसका पता विस्तृत सत्यापन के बाद ही चल सकेगा। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर आपत्तियां सामने आने के कारण SIR प्रक्रिया की अहमियत और बढ़ गई है।
रिपोर्ट में एक और दिलचस्प आंकड़ा सामने आया है। 3,233 ऐसे आवेदन दर्ज हुए हैं, जिनमें आपत्ति दर्ज कराने वाले व्यक्ति का नाम ही संबंधित मतदाता सूची में दर्ज नाम के समान बताया गया है। यह कुल वास्तविक आपत्तियों का लगभग 5.4 प्रतिशत है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि कुछ मतदाता स्वयं अपने नाम से संबंधित जानकारी में सुधार, बदलाव या किसी अन्य प्रकार की आपत्ति दर्ज करा रहे हैं। हालांकि प्रत्येक मामले की प्रकृति अलग-अलग हो सकती है और इसका अंतिम निष्कर्ष संबंधित आवेदन की जांच के बाद ही निकलेगा।
सबसे ज्यादा आपत्तियां दर्ज कराने वालों की सूची में राजेश तिवारी के बाद किशोर कुमार ने 824, चंकित हुरिया ने 680 और अमित कुमार पांडे ने 440 आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इसके अलावा सूची में एरो नाम से 329 और 278, राकेश द्वारा 277, गोपी किशन द्वारा 225, कृष्ण पाल राठी द्वारा 215 और लतिका सिकदार द्वारा 199 आपत्तियां दर्ज होने का उल्लेख है। यह आंकड़ा भी दर्शाता है कि बड़ी संख्या में आपत्तियां कुछ सीमित व्यक्तियों द्वारा दाखिल की गई हैं।
यही स्थिति निर्वाचन अधिकारियों के लिए जांच को और जटिल बनाती है। यदि एक व्यक्ति ने सैकड़ों या हजारों मतदाताओं के खिलाफ आपत्ति दर्ज कराई है, तो अधिकारियों को हर मतदाता के मामले को अलग-अलग देखना होगा। केवल इसलिए कि एक आवेदनकर्ता ने हजारों आपत्तियां दर्ज कराई हैं, सभी आपत्तियों को एक साथ सही या गलत नहीं माना जा सकता। हर मामले में यह देखना होगा कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में उस पते पर रहता है या नहीं, उसका नाम किसी अन्य मतदाता सूची में दर्ज है या नहीं और आपत्ति दर्ज कराने वाले के पास अपने दावे का क्या आधार है।
मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण आधारभूत व्यवस्थाओं में से एक है। यदि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हट जाता है, तो उसका मतदान का अधिकार प्रभावित हो सकता है। वहीं, यदि मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों या डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम सूची में बने रहते हैं, तो यह भी मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल खड़े करता है। इसलिए SIR जैसी प्रक्रिया का उद्देश्य केवल नाम हटाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सूची में प्रत्येक नाम सही, पात्र और अद्यतन हो।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की व्यापक पुनरीक्षण प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सत्यापन और प्राकृतिक न्याय का होता है। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपत्ति आने के बाद उसे सूचना देना, अपनी बात रखने का अवसर देना और उपलब्ध तथ्यों की निष्पक्ष जांच करना आवश्यक होता है। यही वजह है कि 40 हजार से अधिक अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित बताए गए मतदाताओं के मामलों में जल्दबाजी के बजाय विस्तृत सत्यापन की जरूरत होगी।
कई बार मतदाता अपने मूल गांव या शहर में पंजीकृत रहते हैं, लेकिन रोजगार या शिक्षा के कारण लंबे समय तक किसी दूसरे स्थान पर रहते हैं। कुछ लोग मौसमी काम के लिए बाहर जाते हैं, जबकि कुछ सरकारी या निजी नौकरी के कारण अस्थायी रूप से दूसरे शहरों में रहते हैं। ऐसे मामलों में केवल घर बंद मिलने या व्यक्ति के तत्काल उपलब्ध न होने को स्थायी रूप से स्थानांतरित होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसलिए निर्वाचन अधिकारियों को स्थानीय स्तर पर जांच, संबंधित परिवार के सदस्यों से जानकारी, दस्तावेजों और अन्य उपलब्ध तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
दूसरी तरफ, यदि कोई मतदाता वास्तव में स्थायी रूप से किसी दूसरे स्थान पर जा चुका है और पुराने पते पर उसका नाम वर्षों से दर्ज है, तो मतदाता सूची को अद्यतन करना भी जरूरी है। इसीलिए SIR प्रक्रिया को केवल राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय प्रशासनिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में भी समझना होगा।
उत्तराखंड में सामने आए ये आंकड़े कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हैं। पहला, 59,604 आपत्तियां अपने आप में बताती हैं कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का दायरा काफी व्यापक है। दूसरा, 40,906 मतदाताओं के अनुपस्थित या स्थानांतरित बताए जाने का आंकड़ा निर्वाचन अधिकारियों के सामने बड़े पैमाने पर सत्यापन की चुनौती खड़ी करता है। तीसरा, एक व्यक्ति द्वारा 5,906 आपत्तियां दर्ज कराना इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि सामूहिक या बड़े पैमाने पर दर्ज की गई आपत्तियों की जांच कितनी सावधानी से की जानी चाहिए।
राजनीतिक दलों के आरोप और जवाबी आरोप अपनी जगह हैं, लेकिन अंतिम रूप से सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाचन तंत्र की होगी। निर्वाचन अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न हटे और किसी अपात्र, मृत, डुप्लीकेट या स्थायी रूप से स्थानांतरित व्यक्ति का नाम नियमों के विपरीत सूची में न बना रहे।
SIR के इस चरण ने यह भी दिखा दिया है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक बेहद संवेदनशील लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। एक तरफ राजनीतिक दल अपने-अपने आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी ओर हजारों मतदाताओं के नाम और उनके मतदान अधिकार से जुड़े मामलों का निष्पक्ष निस्तारण भी जरूरी है।
अब सबकी नजर निर्वाचन अधिकारियों की आगे की कार्रवाई पर रहेगी। 40 हजार से अधिक अनुपस्थित या स्थानांतरित बताए गए मतदाताओं का सत्यापन कैसे होगा, हजारों आपत्तियों की जांच किस आधार पर की जाएगी और एक ही व्यक्ति द्वारा दर्ज कराई गई बड़ी संख्या में आपत्तियों पर क्या निष्कर्ष निकलता है—ये सभी सवाल आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण रहेंगे।
फिलहाल इतना साफ है कि उत्तराखंड में SIR के दौरान सामने आए आंकड़ों ने मतदाता सूची की शुद्धता, राजनीतिक आरोपों और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब केवल आपत्तियों की संख्या नहीं, बल्कि हर एक आपत्ति की वास्तविकता और उसके पीछे मौजूद तथ्यों की निष्पक्ष जांच ही इस पूरी प्रक्रिया की सफलता तय करेगी। निर्वाचन आयोग के सामने चुनौती बड़ी है, क्योंकि उसे एक ओर मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना है, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार बिना उचित प्रक्रिया और ठोस सत्यापन के प्रभावित न हो।
