देहरादून: उत्तराखंड के हजारों नाशपाती उत्पादक किसानों और बागवानों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। राज्य सरकार नाशपाती के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी की तैयारी कर रही है। उद्यान विभाग ने मौजूदा न्यूनतम मूल्य 6 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़ाकर 7 रुपये प्रति किलोग्राम करने का प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया है। अब इस प्रस्ताव पर अंतिम फैसला वित्त विभाग की मंजूरी के बाद लिया जाएगा। यदि प्रस्ताव को स्वीकृति मिल जाती है तो राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में नाशपाती की खेती करने वाले किसानों को उनकी उपज का पहले से बेहतर न्यूनतम मूल्य मिल सकेगा।
यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब खेती की लागत लगातार बढ़ रही है और किसानों को उत्पादन पर उचित लाभ नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में सरकार का यह कदम बागवानी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्यों जरूरी है न्यूनतम मूल्य में बढ़ोतरी?
उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में नाशपाती केवल एक फल नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है। खेती के साथ-साथ फल उत्पादन यहां के किसानों की आय का प्रमुख स्रोत है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उर्वरक, मजदूरी, परिवहन, पैकेजिंग और बागानों की देखभाल पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ा है।
ऐसी स्थिति में किसानों का कहना रहा है कि मौजूदा 6 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम मूल्य उनकी लागत के मुकाबले काफी कम है। इसी को देखते हुए उद्यान विभाग ने मूल्य में 1 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी का प्रस्ताव तैयार किया है।
हालांकि यह बढ़ोतरी सुनने में छोटी लग सकती है, लेकिन बड़ी मात्रा में उत्पादन करने वाले किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती है।
वित्त विभाग की मंजूरी के बाद होगा अंतिम फैसला
उद्यान विभाग ने प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेज दिया है और अब इसकी फाइल वित्त विभाग के पास है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार प्रस्ताव पर विचार किया जा चुका है और अंतिम स्वीकृति मिलने के बाद सरकार आधिकारिक आदेश जारी कर सकती है।
कृषि एवं उद्यान विभाग के सचिव एस.एन. पांडे ने कहा कि सरकार किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। नाशपाती के न्यूनतम मूल्य में बढ़ोतरी का प्रस्ताव भेजा गया है और उम्मीद है कि जल्द ही इस पर सकारात्मक निर्णय लिया जाएगा।
यदि वित्त विभाग से मंजूरी मिलती है तो आगामी सीजन से किसानों को बढ़े हुए न्यूनतम मूल्य का लाभ मिलने लगेगा।
पर्वतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है फल उत्पादन
उत्तराखंड की पहाड़ी अर्थव्यवस्था में बागवानी की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। सेब, आड़ू, प्लम, खुबानी, माल्टा और नाशपाती जैसे फलों की खेती हजारों किसानों की आय का प्रमुख साधन है।
विशेष रूप से नाशपाती की खेती राज्य के कई पर्वतीय जिलों में बड़े पैमाने पर की जाती है। यह फल न केवल स्थानीय बाजारों में लोकप्रिय है, बल्कि राज्य के बाहर भी इसकी अच्छी मांग रहती है।
फल उत्पादकों का कहना है कि यदि उन्हें उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले तो वे उत्पादन बढ़ाने के साथ आधुनिक तकनीकों को भी अपनाने के लिए प्रेरित होंगे।
कुमाऊं की गोला नाशपाती की देशभर में पहचान
उत्तराखंड की गोला नाशपाती अपनी मिठास, रसीले स्वाद और गुणवत्ता के कारण विशेष पहचान रखती है। खासतौर पर कुमाऊं क्षेत्र में इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है।
सीजन के दौरान यह फल देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के बाजारों तक पहुंचता है। इसकी बढ़ती मांग किसानों के लिए बेहतर आमदनी का अवसर बनती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि न्यूनतम मूल्य में बढ़ोतरी के साथ बेहतर विपणन व्यवस्था और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं भी विकसित की जाएं तो उत्तराखंड की नाशपाती राष्ट्रीय बाजार में और मजबूत पहचान बना सकती है।
एमएसपी से किसानों को कैसे मिलता है लाभ?
न्यूनतम समर्थन मूल्य या न्यूनतम खरीद मूल्य का उद्देश्य किसानों को बाजार में अत्यधिक कम कीमत मिलने की स्थिति से बचाना होता है। जब बाजार में कीमतें गिर जाती हैं तब सरकार द्वारा तय न्यूनतम मूल्य किसानों के हितों की सुरक्षा करता है।
हालांकि नाशपाती का उत्पादन प्रदेश में बहुत बड़े स्तर पर नहीं होता, लेकिन अलग-अलग जिलों से बड़ी मात्रा में फल बाजार तक पहुंचता है। ऐसे में न्यूनतम मूल्य तय होने से किसानों को अपनी उपज बेचने में मनोवैज्ञानिक और आर्थिक दोनों तरह की सुरक्षा मिलती है।
बढ़ती लागत के बीच राहत की उम्मीद
किसानों का कहना है कि बागवानी में सिंचाई, खाद, दवाइयों, मजदूरी और परिवहन पर खर्च लगातार बढ़ा है। ऐसे में यदि न्यूनतम मूल्य में बढ़ोतरी होती है तो इससे उत्पादन लागत का कुछ हिस्सा निकल सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल न्यूनतम मूल्य बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ-साथ किसानों को आधुनिक बागवानी तकनीक, बेहतर पौधे, फसल बीमा, प्रसंस्करण इकाइयों और बाजार तक सीधी पहुंच जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी।
सरकार के फैसले पर टिकी किसानों की उम्मीदें
फिलहाल पूरे मामले में अंतिम फैसला वित्त विभाग की मंजूरी पर निर्भर है। प्रस्ताव को स्वीकृति मिलने के बाद ही नाशपाती का न्यूनतम मूल्य 6 रुपये से बढ़कर 7 रुपये प्रति किलोग्राम किया जा सकेगा।
राज्यभर के किसान और बागवान अब सरकार के अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि प्रस्ताव को जल्द मंजूरी मिल जाती है तो यह केवल एक रुपये की बढ़ोतरी नहीं होगी, बल्कि पर्वतीय किसानों की मेहनत और बागवानी को प्रोत्साहन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में, जहां कृषि और बागवानी लाखों लोगों की आजीविका का आधार हैं, ऐसे निर्णय किसानों के आर्थिक भविष्य को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। अब सभी की निगाहें वित्त विभाग और शासन के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जिससे तय होगा कि नाशपाती उत्पादकों को उनकी मेहनत का बेहतर मूल्य कब से मिलना शुरू होगा।
