लोकसभा में एंटी पेपर लीक कानून में संशोधन को लेकर हुई चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने केंद्र सरकार पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने सरकार की शिक्षा नीति, पेपर लीक मामलों में कार्रवाई, छात्र आंदोलनों पर पुलिस की कार्रवाई और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। गोगोई ने कहा कि सरकार शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय केवल सख्त सजा का दिखावा कर रही है, जबकि जमीनी स्तर पर समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
चर्चा के दौरान गौरव गोगोई ने कहा कि सरकार जिस संशोधन विधेयक को ऐतिहासिक बता रही है, वह वास्तव में उसकी विफलताओं का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि यदि वर्ष 2024 में सरकार एंटी पेपर लीक कानून लेकर आई थी तो फिर वर्ष 2026 में देश में बड़े स्तर पर पेपर लीक कैसे हुआ? उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय भी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ही थे और उन्होंने लगातार यह दावा किया कि पेपर लीक नहीं हुआ है। गोगोई के मुताबिक, मंत्री करीब ढाई महीने तक अपने बयान पर अड़े रहे, जबकि छात्रों और अभिभावकों की चिंताएं लगातार बढ़ती रहीं।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि सरकार कानून का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। यदि कानून लागू होने के बावजूद परीक्षाओं में गड़बड़ियां होती हैं, तो यह साबित करता है कि व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं। उन्होंने कहा कि केवल कानून बना देने से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि उसे प्रभावी ढंग से लागू करना भी उतना ही आवश्यक है।
गौरव गोगोई ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का नाम लेते हुए कहा कि जब देशभर के लाखों छात्र पेपर लीक से परेशान थे, तब सरकार ने उनकी पीड़ा को समझने के बजाय मंत्री का सम्मान किया। उन्होंने दावा किया कि नीट पेपर लीक विवाद के कारण 21 छात्रों ने आत्महत्या की और इसके बावजूद सरकार ने किसी तरह की जवाबदेही तय नहीं की। उन्होंने सवाल उठाया कि जब इतने गंभीर आरोप सामने आए तो मंत्री की जिम्मेदारी तय करने के बजाय उनका सम्मान क्यों किया गया?
अपने भाषण के दौरान गोगोई ने प्रसिद्ध कवि गोपाल दास ‘नीरज’ की चर्चित पंक्तियां भी सदन में पढ़ीं—
“स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से,
लूट लिये बाग के सिंगार सब फूल से,
हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे,
कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे…”
इन पंक्तियों के माध्यम से उन्होंने कहा कि सरकार लगातार समस्याओं को नजरअंदाज करती रही और जब तक हालात बिगड़ गए तब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
कांग्रेस सांसद ने छात्र आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि देश के युवाओं ने यह साबित कर दिया कि लोकतंत्र आज भी जीवित है और सवाल पूछना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। उन्होंने उन छात्रों की सराहना की जिन्होंने अपनी आवाज उठाई और शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन किया। गोगोई ने कहा कि कई छात्राओं ने कहा कि उन्हें जंतर-मंतर पर अपनी बात रखने में सुरक्षा का एहसास हुआ, क्योंकि वे वहां लोकतांत्रिक तरीके से अपनी मांगें रख रही थीं।
उन्होंने कहा कि यदि प्रदर्शन के दौरान किसी व्यक्ति ने आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया तो उसका समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन इससे पूरे आंदोलन को गलत ठहराना भी उचित नहीं है। उन्होंने उन लोगों का भी आभार व्यक्त किया जिन्होंने आंदोलनरत छात्रों की मदद की। उन्होंने कहा कि कई वकीलों ने छात्रों को कानूनी सहायता दी, वहीं फूड डिलीवरी के माध्यम से भी लोगों ने प्रदर्शनकारियों तक भोजन पहुंचाया। यह लोकतंत्र और इंसानियत की मिसाल थी।
हालांकि, गोगोई ने आरोप लगाया कि दूसरी ओर छात्रों के साथ पुलिस द्वारा बल प्रयोग किया गया। उन्होंने दावा किया कि प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल की तस्वीरें सामने आईं, छात्राओं को थप्पड़ मारे गए और लाठियां चलाई गईं। उन्होंने गृह मंत्री से जवाब मांगते हुए कहा कि आखिर किसके आदेश पर छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया। उन्होंने कहा कि जब पुलिस छात्रों का हौसला नहीं तोड़ सकी, तब सरकार यह संशोधन विधेयक लेकर आई।
गौरव गोगोई ने सरकार के आंकड़ों और कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 के पेपर लीक मामले में 45 लोगों को आरोपी बनाया गया था, लेकिन उनमें से 44 लोगों को जमानत मिल चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले का कथित मास्टरमाइंड लगभग 11 महीने तक फरार रहा और वर्ष 2025 में उसकी गिरफ्तारी हुई, लेकिन उसे भी बाद में जमानत मिल गई। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि आरोपी आसानी से जमानत पर बाहर आ जाते हैं तो केवल कानून में सजा बढ़ाने से कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की बजाय युवाओं को राजनीतिक सोच के आधार पर प्रभावित करने में अधिक रुचि रखती है। उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने के बजाय उन्हें एक विशेष विचारधारा की ओर मोड़ने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य बेहतर नागरिक तैयार करना होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दल का समर्थक बनाना।
उन्होंने विश्वविद्यालयों का भी जिक्र किया। गोगोई ने कहा कि जब देशभर के माता-पिता ने अपने बच्चों को लोकतांत्रिक तरीके से प्रदर्शन करने के लिए दिल्ली के जंतर-मंतर भेजा, तब कुछ विश्वविद्यालयों ने छात्रों को वहां जाने से रोकने की सलाह दी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या इस तरह युवाओं को लोकतांत्रिक अधिकारों से दूर रखा जाएगा? उन्होंने कहा कि एक मां अपने बच्चे को आशीर्वाद देकर आंदोलन में भेजती है, क्योंकि उसे अपने बच्चे के भविष्य की चिंता है। ऐसे में सरकार को छात्रों की भावनाओं को समझना चाहिए।
गौरव गोगोई ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल दंड बढ़ाने से नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि यदि परीक्षा प्रणाली पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह नहीं होगी तो सख्त कानून भी प्रभावी साबित नहीं होंगे। सरकार को तकनीकी सुधार, परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही, समयबद्ध जांच, दोषियों को शीघ्र सजा और छात्रों का विश्वास बहाल करने की दिशा में काम करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि छात्र भूख हड़ताल करते हैं, लाठी खाते हैं और सड़क पर उतरते हैं, तो उसके पीछे गहरा दर्द होता है। कोई भी युवा बिना कारण अपना भविष्य दांव पर लगाकर आंदोलन नहीं करता। उन्होंने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान केवल एक प्रतीक हैं, लेकिन छात्रों का गुस्सा पूरी शिक्षा व्यवस्था को लेकर है। यदि सरकार वास्तव में सुधार चाहती है तो उसे छात्रों की आवाज सुननी होगी और केवल राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे।
अपने संबोधन के अंत में गौरव गोगोई ने कहा कि जंतर-मंतर पर जुटे हजारों युवाओं ने पूरे देश को यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने कहा कि डर खत्म हो चुका है और युवा अपने अधिकारों के लिए खड़े होने को तैयार हैं। सरकार को चाहिए कि वह छात्रों की पीड़ा को समझे, शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार करे और ऐसी व्यवस्था बनाए, जिसमें मेहनत करने वाले छात्रों का भविष्य किसी पेपर लीक या प्रशासनिक लापरवाही की भेंट न चढ़े।
लोकसभा में दिए गए इस भाषण के जरिए कांग्रेस सांसद ने सरकार की शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक मामलों में जवाबदेही, छात्र आंदोलनों पर पुलिस कार्रवाई और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे कई मुद्दों को केंद्र में लाने का प्रयास किया। अब इस पर सरकार की ओर से क्या जवाब आता है और संसद में इस बहस का क्या निष्कर्ष निकलता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
