संयुक्त राष्ट्र (UN) की ताज़ा रिपोर्ट “द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड” ने दक्षिण एशिया की दो पड़ोसी देशों—भारत और पाकिस्तान—की विकास यात्रा के बीच बढ़ते अंतर को उजागर कर दिया है। रिपोर्ट के अनुसार, जहां भारत ने पिछले दो दशकों में भुखमरी और कुपोषण को कम करने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, वहीं पाकिस्तान में हालात लगातार बिगड़ते गए हैं। देश में कुपोषित लोगों की संख्या में तेज़ वृद्धि दर्ज की गई है और करोड़ों लोग आज भी पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन से वंचित हैं। यह रिपोर्ट केवल खाद्य सुरक्षा की स्थिति नहीं बताती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि किसी देश की नीतिगत प्राथमिकताएं उसके नागरिकों के जीवन स्तर पर कितना गहरा प्रभाव डालती हैं।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भुखमरी के मामलों में लगातार तीसरे वर्ष गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2022 में जहां दुनिया की लगभग 8.6 प्रतिशत आबादी भुखमरी से प्रभावित थी, वहीं वर्ष 2025 तक यह आंकड़ा घटकर 7.8 प्रतिशत रह गया है। इसका अर्थ है कि दुनिया भर में करोड़ों लोगों तक भोजन और पोषण संबंधी सुविधाएं पहले की तुलना में बेहतर तरीके से पहुंच रही हैं। विशेष रूप से एशिया और अफ्रीका में कई देशों ने खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने के लिए प्रभावी योजनाएं लागू की हैं, जिनका सकारात्मक परिणाम देखने को मिला है।
इस वैश्विक सुधार में भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। विशाल जनसंख्या के बावजूद भारत ने पिछले दो दशकों में कुपोषण और भूख को कम करने के लिए कई व्यापक योजनाएं लागू कीं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2004-2006 के दौरान भारत में 24.39 करोड़ लोग कुपोषण का शिकार थे। वर्ष 2023-2025 तक यह संख्या घटकर 14.25 करोड़ रह गई। यानी भारत ने लगभग 41.6 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी दर्ज की है। यह उपलब्धि दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक खाद्य वितरण कार्यक्रमों में से एक और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का परिणाम मानी जा रही है।
भारत सरकार की प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (PMGKAY) को इस सफलता का प्रमुख आधार माना जा रहा है। इस योजना के तहत देश की बड़ी आबादी को हर महीने मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है। पात्र लाभार्थियों को प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम गेहूं या चावल दिया जाता है, जबकि अंत्योदय अन्न योजना के लाभार्थी परिवारों को 35 किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है। इस योजना को वर्ष 2028 तक बढ़ा दिया गया है, जिससे करोड़ों गरीब और जरूरतमंद परिवारों को खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने केवल खाद्यान्न वितरण तक ही अपनी नीति सीमित नहीं रखी, बल्कि कृषि उत्पादन बढ़ाने, किसानों को तकनीकी सहायता देने, डिजिटल वितरण प्रणाली विकसित करने और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को पारदर्शी बनाने जैसे कई सुधार भी किए। इन प्रयासों के कारण गरीब परिवारों तक समय पर अनाज पहुंचा और खाद्य असुरक्षा में लगातार कमी आई।
दूसरी ओर, पाकिस्तान की स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004-2006 में पाकिस्तान में लगभग 2.96 करोड़ लोग कुपोषित थे, लेकिन वर्ष 2023-2025 तक यह संख्या बढ़कर 4.04 करोड़ हो गई। यानी दो दशकों में कुपोषित लोगों की संख्या में लगभग 36.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसी तरह वर्ष 2017 में जहां लगभग 13.24 करोड़ लोग स्वस्थ एवं पौष्टिक भोजन प्राप्त करने में असमर्थ थे, वहीं वर्ष 2025 तक यह संख्या बढ़कर 16 करोड़ पहुंच गई।
रिपोर्ट यह संकेत देती है कि पाकिस्तान में बढ़ती महंगाई, आर्थिक अस्थिरता, खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें, बेरोजगारी और विकास योजनाओं की धीमी गति ने आम नागरिकों के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। आर्थिक संकट के कारण बड़ी आबादी की क्रय शक्ति कमजोर हुई है, जिससे लाखों परिवार पौष्टिक भोजन तक पहुंच बनाने में असफल रहे हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी देश की प्रगति केवल सैन्य क्षमता से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और खाद्य सुरक्षा से तय होती है। यदि विकास की प्राथमिकताओं में आम लोगों की बुनियादी आवश्यकताओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता, तो उसका सीधा असर सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर दिखाई देता है। पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक चुनौतियों, विदेशी कर्ज, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी तनावों से जूझ रहा है। इन परिस्थितियों ने विकास कार्यक्रमों की गति को भी प्रभावित किया है।
हाल के वर्षों में पाकिस्तान को कई मोर्चों पर आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ा है। बढ़ती महंगाई, मुद्रा का अवमूल्यन, ऊर्जा संकट, बेरोजगारी और निवेश में कमी जैसी समस्याओं ने आम नागरिकों की स्थिति को और कठिन बना दिया। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में लगातार वृद्धि के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए दो समय का पौष्टिक भोजन जुटाना भी चुनौती बन गया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े इसी गंभीर स्थिति की ओर संकेत करते हैं।
इसके विपरीत भारत ने कृषि उत्पादन बढ़ाने, खाद्यान्न भंडारण क्षमता मजबूत करने, डिजिटल राशन वितरण प्रणाली लागू करने और गरीब परिवारों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास किए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति पहले की तुलना में काफी बेहतर हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही गति बनी रही तो आने वाले वर्षों में भारत भुखमरी और कुपोषण को और अधिक कम करने में सफल हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह नीति-निर्माताओं के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देती है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जिन देशों ने सामाजिक सुरक्षा, खाद्य वितरण, कृषि सुधार और गरीबों के कल्याण को प्राथमिकता दी, वहां सकारात्मक परिणाम सामने आए। वहीं जिन देशों में आर्थिक और सामाजिक योजनाओं की गति कमजोर रही, वहां भूख और कुपोषण की समस्या बढ़ती गई।
दक्षिण एशिया के इन दोनों पड़ोसी देशों की तुलना यह दर्शाती है कि विकास का वास्तविक पैमाना केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि यह भी है कि देश अपने सबसे कमजोर और जरूरतमंद नागरिकों तक भोजन, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा पाता है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट इस दिशा में भारत की उपलब्धियों को रेखांकित करती है, वहीं पाकिस्तान के सामने खाद्य सुरक्षा और कुपोषण जैसी चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने की आवश्यकता को भी उजागर करती है। आने वाले वर्षों में दोनों देशों की नीतियां और उनके क्रियान्वयन ही तय करेंगे कि करोड़ों लोगों का भविष्य किस दिशा में आगे बढ़ेगा।
