नई दिल्ली: ओटीटी की दुनिया के लोकप्रिय अभिनेता और हाल ही में वेब सीरीज़ ग्राम चिकित्सालय में अपने अभिनय से चर्चा में आए अमोल पराशर ने राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित ‘चलो संसद’ छात्र प्रदर्शन में अपनी मौजूदगी और वहां के अनुभव को सार्वजनिक करते हुए एक भावुक पोस्ट साझा की है। अभिनेता ने बताया कि वह 20 जुलाई को बिना किसी पूर्व सूचना और बिना किसी प्रचार के प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे थे। उनका उद्देश्य किसी प्रकार की सुर्खियां बटोरना नहीं था, बल्कि छात्रों के बीच एक सामान्य नागरिक की तरह खड़े होकर उनकी भावनाओं, उम्मीदों और संघर्ष को करीब से समझना था।
अमोल पराशर ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने विस्तृत संदेश में लिखा कि जंतर-मंतर पर बिताए गए कुछ घंटे उनके जीवन के उन अनुभवों में शामिल हो गए हैं जिन्हें वह कभी नहीं भूल पाएंगे। उन्होंने कहा कि पिछले कई दिनों से उनके मन में छात्रों के बीच जाने की इच्छा थी। एक मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बढ़े होने के कारण वह शिक्षा के महत्व को भली-भांति समझते हैं और उनका मानना है कि किसी भी देश के भविष्य के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी शिक्षा व्यवस्था अत्यंत आवश्यक होती है।
अभिनेता ने स्पष्ट किया कि उन्होंने प्रदर्शन स्थल पर जाने की जानकारी किसी को नहीं दी थी। वह मास्क और गॉगल्स पहनकर पहुंचे ताकि उनकी पहचान न हो सके और प्रदर्शन का मूल मुद्दा ही चर्चा का केंद्र बना रहे। हालांकि, वहां मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें पहचान लिया, लेकिन उन्होंने किसी मंच पर जाने, भाषण देने या कैमरे के सामने आने से परहेज किया। उनका कहना था कि वह केवल छात्रों की बातें सुनना चाहते थे और उनके बीच रहकर यह समझना चाहते थे कि आखिर वे किस भावना के साथ इस आंदोलन में शामिल हुए हैं।
अपने अनुभव साझा करते हुए अमोल ने लिखा कि पुलिस कार्रवाई से पहले प्रदर्शन स्थल का माहौल गुस्से से ज्यादा उम्मीदों से भरा हुआ था। उन्होंने बताया कि वहां मौजूद युवा एक बेहतर भविष्य की उम्मीद के साथ एकजुट दिखाई दे रहे थे। कई समूहों में छात्र आपस में चर्चा कर रहे थे, गीत गा रहे थे, सवाल पूछ रहे थे और एक-दूसरे का हौसला बढ़ा रहे थे। उनके अनुसार, इतनी बड़ी भीड़ होने के बावजूद वहां अनुशासन और संयम देखने को मिला। किसी प्रकार की बदसलूकी, धक्का-मुक्की या असामाजिक व्यवहार का माहौल नहीं था। लोग एक-दूसरे की मदद कर रहे थे और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे थे।
अमोल पराशर ने अपने पोस्ट में एक महत्वपूर्ण पहलू का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में शामिल सभी लोग केवल NEET परीक्षा से जुड़े छात्र नहीं थे। वहां विभिन्न विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अलग-अलग शैक्षणिक क्षेत्रों से जुड़े विद्यार्थी मौजूद थे। कुछ ऐसे लोग भी थे जिनका NEET परीक्षा से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। इसके बावजूद वे प्रदर्शन में शामिल हुए क्योंकि उनका मानना था कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता केवल एक परीक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश के भविष्य का सवाल है।
अभिनेता ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि वहां मौजूद कई लोगों से NEET का पूरा नाम पूछा जाता तो संभव है कि वे उसका सही उत्तर भी न दे पाते, लेकिन फिर भी वे प्रदर्शन में इसलिए मौजूद थे क्योंकि वे निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और जवाबदेह शासन व्यवस्था की मांग का समर्थन कर रहे थे। उन्होंने इस बात पर भी टिप्पणी की कि ऐसे आंदोलनों को बाहरी या विदेशी प्रभाव से जोड़कर देखने की बजाय यह समझना चाहिए कि युवाओं की चिंता उनके अपने भविष्य, शिक्षा और समान अवसरों को लेकर है।
अमोल पराशर ने अपने संदेश में कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों का शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखना और जनहित के मुद्दों पर आवाज उठाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों के चेहरों पर उन्हें निराशा से अधिक उम्मीद दिखाई दी। वे अपने भविष्य को लेकर चिंतित जरूर थे, लेकिन उनमें व्यवस्था से सकारात्मक बदलाव की अपेक्षा भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी।
उनकी यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और हजारों लोग इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। कई लोगों ने अभिनेता की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों का सामाजिक मुद्दों को समझने और युवाओं के बीच जाकर उनकी बातें सुनने का प्रयास स्वागत योग्य है। वहीं कुछ लोगों ने उनके विचारों पर अलग-अलग दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किए हैं, जिससे यह विषय सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गया है।
हाल के दिनों में देशभर में शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन और बहस देखने को मिली है। ऐसे समय में अमोल पराशर जैसे चर्चित अभिनेता का स्वयं प्रदर्शन स्थल पर पहुंचना और वहां के अनुभवों को साझा करना इस पूरे विषय को एक नया आयाम देता है। हालांकि उन्होंने अपने संदेश में किसी राजनीतिक दल या संगठन का समर्थन नहीं किया, बल्कि केवल छात्रों की भावनाओं और अपने व्यक्तिगत अनुभवों को सामने रखा।
अमोल पराशर की यह आंखोंदेखी केवल एक अभिनेता के अनुभव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों युवाओं की उम्मीदों, चिंताओं और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने की भावना को भी सामने लाती है, जो बेहतर और निष्पक्ष शिक्षा व्यवस्था की मांग को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनकी पोस्ट ने एक बार फिर इस बहस को तेज कर दिया है कि देश के युवाओं की आकांक्षाओं, शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संवाद को गंभीरता से सुना जाना कितना आवश्यक है।
