इस्लामाबाद: पश्चिम एशिया में लगातार बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच पाकिस्तान एक और महत्वपूर्ण रक्षा समझौते की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान अब कुवैत के साथ भी उसी तरह का रक्षा एवं सुरक्षा सहयोग समझौता करने की तैयारी में है, जैसा उसने पहले सऊदी अरब के साथ किया था। हालांकि यह बातचीत अभी शुरुआती चरण में बताई जा रही है, लेकिन क्षेत्र में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने इस संभावित समझौते को बेहद अहम बना दिया है।
पाकिस्तान लंबे समय से खुद को मुस्लिम देशों के बीच एक प्रभावशाली सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता रहा है। परमाणु हथियारों से लैस होने के कारण वह दुनिया का एकमात्र परमाणु संपन्न मुस्लिम देश है। आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई, विदेशी कर्ज और बेरोजगारी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझने के बावजूद पाकिस्तान अपनी सैन्य क्षमता को विदेश नीति का प्रमुख आधार बनाकर खाड़ी देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत करने में जुटा हुआ है।
पिछले वर्ष पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए रक्षा सहयोग समझौते को इसी रणनीति का हिस्सा माना गया था। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने सुरक्षा संबंधी मामलों में एक-दूसरे का सहयोग करने और किसी भी गंभीर खतरे की स्थिति में मिलकर जवाब देने की प्रतिबद्धता जताई थी। बदले में पाकिस्तान को सऊदी अरब से निवेश, ऊर्जा सहयोग और आर्थिक सहायता मिलने की उम्मीद भी बनी रही।
अब इसी मॉडल को आगे बढ़ाते हुए पाकिस्तान कुवैत के साथ भी रक्षा साझेदारी स्थापित करना चाहता है। रिपोर्टों के अनुसार, कुवैत सहित कई खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताएं हाल के महीनों में बढ़ी हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों ने इन देशों को अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने के लिए नए सहयोगियों की तलाश करने पर मजबूर किया है। ऐसे में पाकिस्तान खुद को एक भरोसेमंद रक्षा साझेदार के रूप में पेश कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो पाकिस्तान को आर्थिक और रणनीतिक दोनों स्तरों पर लाभ मिल सकता है। कुवैत ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध देश है और पाकिस्तान लंबे समय से तेल आपूर्ति, निवेश तथा वित्तीय सहयोग बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। रक्षा सहयोग के बदले आर्थिक साझेदारी को मजबूत करना पाकिस्तान की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
इस बीच पश्चिम एशिया में ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने भी इस संभावित समझौते को नई चर्चा में ला दिया है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव और ईरान समर्थित समूहों की गतिविधियों को लेकर कई खाड़ी देशों में सुरक्षा चिंताएं बनी हुई हैं। विशेष रूप से यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा समय-समय पर सऊदी अरब पर किए गए हमलों ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है। इसी कारण खाड़ी देशों के बीच सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई रणनीतियों पर विचार किया जा रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए रक्षा समझौते में यह व्यवस्था की गई थी कि यदि किसी एक देश की सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न होता है तो दोनों देश आवश्यक सहयोग प्रदान करेंगे। इसी समझौते के तहत पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैन्य प्रशिक्षकों, सैनिकों तथा विभिन्न रक्षा प्रणालियों की तैनाती भी की है। इसमें वायु रक्षा प्रणाली, ड्रोन संचालन, सैन्य प्रशिक्षण और अन्य सुरक्षा सहयोग शामिल बताया जाता है।
हालांकि कुवैत के साथ प्रस्तावित समझौते की आधिकारिक शर्तें अभी सार्वजनिक नहीं हुई हैं, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसका ढांचा सऊदी अरब के साथ हुए समझौते जैसा ही हो सकता है। इसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, रक्षा प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी साझा करना, समुद्री सुरक्षा और आपातकालीन रक्षा सहयोग जैसे प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं।
दूसरी ओर, पाकिस्तान की संभावित भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं कि यदि क्षेत्रीय तनाव और बढ़ता है तो क्या वह किसी बड़े सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनेगा। फिलहाल पाकिस्तान की ओर से किसी प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। पाकिस्तान लगातार यह कहता रहा है कि वह क्षेत्र में शांति, स्थिरता और संवाद का समर्थन करता है, लेकिन अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा को लेकर भी प्रतिबद्ध है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान की यह रणनीति केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आर्थिक हित भी जुड़े हुए हैं। खाड़ी देशों से मिलने वाला निवेश, ऊर्जा आपूर्ति, विदेशी मुद्रा और वहां कार्यरत लाखों पाकिस्तानी नागरिकों की भूमिका पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में इस्लामाबाद अपने रणनीतिक संबंधों को और मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
फिलहाल पाकिस्तान और कुवैत के बीच प्रस्तावित रक्षा समझौते पर बातचीत प्रारंभिक स्तर पर है और दोनों देशों की ओर से कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। आने वाले समय में यदि यह समझौता आकार लेता है तो इससे न केवल पाकिस्तान और कुवैत के संबंध मजबूत होंगे, बल्कि पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी इसका महत्वपूर्ण प्रभाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर इस संभावित रक्षा साझेदारी और उससे जुड़ी आगामी कूटनीतिक गतिविधियों पर बनी हुई है।
