भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि केवल गाली-गलौज, अपशब्द या अभद्र भाषा का इस्तेमाल अपने आप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294 के तहत ‘अश्लीलता’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी शब्द या अभिव्यक्ति को अश्लील मानने के लिए यह साबित होना आवश्यक है कि उसमें कामुकता या यौन उत्तेजना पैदा करने वाला तत्व मौजूद हो और उसका प्रभाव ऐसा हो जो लोगों के नैतिक चरित्र को भ्रष्ट या विकृत करने की प्रवृत्ति रखता हो। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि अभद्रता और अश्लीलता दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएं हैं, इसलिए दोनों को एक समान नहीं माना जा सकता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह फैसला तमिलनाडु के एक 70 वर्षीय व्यक्ति द्वारा दायर अपील पर सुनवाई के दौरान सुनाया। यह मामला वर्ष 2017 में हुए एक जमीन विवाद से जुड़ा था, जिसमें आरोपी पर शिकायतकर्ता के साथ गाली-गलौज करने, जान से मारने की धमकी देने और धारदार हथियार (बिलहुक) से हमला करने का आरोप लगाया गया था। इस घटना में शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी टूट गई थी, जिसे मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर चोट बताया गया।
अभियोजन पक्ष के अनुसार अगस्त 2017 में जमीन को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद हुआ। बहस के दौरान आरोपी ने शिकायतकर्ता के खिलाफ कथित रूप से अभद्र भाषा का प्रयोग किया और बाद में धारदार हथियार से हमला कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत भी दोषी ठहराया था। हालांकि बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी को एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपों से बरी कर दिया और IPC की धारा 294(बी) तथा धारा 506(II) के आरोप भी हटा दिए। केवल धारा 326 के तहत गंभीर चोट पहुंचाने का अपराध बरकरार रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को सही ठहराते हुए कहा कि IPC की धारा 294 तभी लागू होगी जब कथित शब्द वास्तव में अश्लील हों। अदालत ने कहा कि केवल गुस्से में अपशब्द कहना या किसी को भला-बुरा कहना कानून की नजर में अश्लीलता नहीं है। धारा 294 का उद्देश्य उन शब्दों या कृत्यों को दंडित करना है जिनका संबंध कामुकता, यौन उत्तेजना या अशोभनीय यौन अभिव्यक्ति से हो और जिनका समाज पर नकारात्मक नैतिक प्रभाव पड़ सकता हो।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अश्लीलता की कानूनी परिभाषा को विस्तार से समझाते हुए कहा कि किसी शब्द को अश्लील मानने के लिए यह देखा जाएगा कि क्या वह यौन या कामुक भावना उत्पन्न करता है, क्या उससे वासनात्मक रुचि पैदा होती है और क्या उसका प्रभाव समाज के नैतिक मूल्यों को प्रभावित करने वाला है। यदि कोई शब्द केवल अपमानजनक, असभ्य या अशिष्ट है, लेकिन उसमें कामुकता का कोई तत्व नहीं है, तो उसे धारा 294 के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
पीठ ने यह भी कहा कि इस अपराध को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को दो महत्वपूर्ण तथ्यों को सिद्ध करना आवश्यक होगा। पहला, कथित अश्लील शब्द किसी सार्वजनिक स्थान या उसके आसपास बोले गए हों, और दूसरा, उन शब्दों के कारण वहां मौजूद अन्य लोगों को वास्तविक रूप से परेशानी या असुविधा हुई हो। केवल शिकायतकर्ता के नाराज होने या उसकी भावनाएं आहत होने से धारा 294 का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता। वर्तमान मामले में अदालत ने पाया कि इन दोनों आवश्यक शर्तों को साबित नहीं किया गया था, इसलिए धारा 294 के तहत दोषसिद्धि उचित नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 506(II), यानी आपराधिक धमकी, के संबंध में भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि किसी झगड़े या विवाद के दौरान गुस्से में कही गई हर धमकी कानूनन आपराधिक धमकी नहीं मानी जा सकती। अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि आरोपी का उद्देश्य वास्तव में सामने वाले व्यक्ति में भय उत्पन्न करना था या उसे किसी कार्य को करने अथवा न करने के लिए मजबूर करना था। यदि ऐसा उद्देश्य और उसका प्रभाव प्रमाणित नहीं होता, तो केवल तीखी या आक्रामक भाषा के आधार पर धारा 506(II) लागू नहीं की जा सकती। इस मामले में भी अदालत को ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने कानूनी अर्थों में आपराधिक धमकी दी थी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी द्वारा बिलहुक जैसे धारदार हथियार से हमला कर शिकायतकर्ता की नाक की हड्डी तोड़ना गंभीर अपराध है। अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य साक्ष्यों का हवाला देते हुए माना कि आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 326 के तहत गंभीर चोट पहुंचाने का अपराध पूरी तरह सिद्ध होता है। इसलिए इस धारा के तहत उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।
सजा के प्रश्न पर अदालत ने आरोपी की लगभग 70 वर्ष की आयु, खराब स्वास्थ्य और इस तथ्य को ध्यान में रखा कि विवाद जमीन से संबंधित था तथा घटना कई वर्ष पुरानी है। इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा को घटाकर ‘अदालत उठने तक की कैद’ कर दिया, जबकि उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना बरकरार रखा गया।
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के कई महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों का भी उल्लेख किया और दोहराया कि समय-समय पर अदालतें यह स्पष्ट करती रही हैं कि अभद्र भाषा, अपमानजनक शब्द और अश्लीलता एक जैसी नहीं हैं। किसी अभिव्यक्ति को अश्लील मानने का परीक्षण समकालीन सामाजिक मानकों, उसके वास्तविक प्रभाव और उसमें मौजूद यौन या कामुक तत्व के आधार पर किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्ध होगा, जहां केवल गाली-गलौज या अभद्र भाषा के आधार पर IPC की धारा 294 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य हर अपमानजनक शब्द को अश्लीलता की श्रेणी में रखना नहीं है, बल्कि केवल उन अभिव्यक्तियों को दंडित करना है जो वास्तव में अश्लील हों और समाज पर यौन या नैतिक दृष्टि से प्रतिकूल प्रभाव डालती हों। यह फैसला अभिव्यक्ति की कानूनी सीमाओं, नागरिक अधिकारों और आपराधिक कानून की सही व्याख्या के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जा रहा है।
