रुद्रप्रयाग/देहरादून। हिमालय की गगनचुंबी और बर्फ की सफेद चादर ओढ़े वादियों के बीच, जहां अध्यात्म और प्रकृति मिलकर एक अद्भुत संसार रचते हैं, वहां इस वर्ष एक नया कीर्तिमान स्थापित हो रहा है। विश्व के सबसे ऊंचे शिव मंदिर और पंच केदारों में प्रतिष्ठित ‘तृतीय केदार’ भगवान तुंगनाथ धाम में चल रही Tungnath Yatra 2026 आस्था का एक ऐसा महाकुंभ बनकर उभरी है, जिसने पिछले सभी वर्षों के आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया है। इस यात्रा सत्र में अब तक रिकॉर्ड 1,18,381 श्रद्धालु बाबा तुंगनाथ के दरबार में शीश नवा चुके हैं। यह अभूतपूर्व संख्या न केवल इस दुर्गम और पावन धाम के प्रति देश-विदेश के भक्तों की अटूट आस्था को बयां कर रही है, बल्कि यह भी साबित कर रही है कि उत्तराखंड का यह अंचल अब वैश्विक पटल पर आध्यात्मिक पर्यटन के सबसे बड़े केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है।
21 अप्रैल से शुरू हुआ आस्था का सफर, गुलजार हुआ बुग्यालों का रास्ता
बीती 21 अप्रैल को जब वैदिक मंत्रोच्चारण और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भगवान तुंगनाथ के कपाट खोले गए थे, तभी से यह अंदेशा था कि इस बार की यात्रा ऐतिहासिक होगी। कपाट खुलने के पहले ही दिन से धाम में प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। मिनी स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले चोपता से लेकर तुंगनाथ धाम तक का करीब पांच किलोमीटर का खड़ी चढ़ाई वाला पैदल मार्ग इन दिनों ‘बम-बम भोले’ और ‘जय बाबा तुंगनाथ’ के जयकारों से लगातार गुंजायमान है।
इस बार देवभूमि का सुहावना मौसम, चारों तरफ फैली हरियाली, मखमली बुग्याल और दूर क्षितिज में दिखाई देने वाली हिमालय की बर्फाच्छादित चोटियों का मनमोहक दृश्य श्रद्धालुओं की सारी थकान को पल भर में दूर कर रहा है। देश के कोने-कोने से आ रहे भक्त और ट्रैकर इस यात्रा को अपने जीवन का सबसे अविस्मरणीय और अलौकिक अनुभव बता रहे हैं। कड़ाके की ठंड और ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र की विषम परिस्थितियों के बावजूद बाबा के दर्शन की ललक भक्तों के कदमों को रुकने नहीं दे रही है।
पूरी घाटी की आर्थिकी को मिले नए पंख, युवाओं को मिला स्वरोजगार
इस अभूतपूर्व Uttarakhand Spiritual Tourism Growth का सीधा और बेहद सकारात्मक प्रभाव पूरे तुंगनाथ घाटी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दे रहा है। श्रद्धालुओं की भारी आमद के कारण चोपता, बणियाकुंड, दुगलबिट्टा, मक्कूमठ और उखीमठ सहित आसपास के तमाम छोटे-बड़े क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं। क्षेत्र के सभी होटल, होमस्टे, लॉज और रेस्टोरेंट इस सीजन में पूरी तरह से पैक चल रहे हैं। स्थानीय छोटे दुकानदारों, ढाबा संचालकों, हस्तशिल्प बेचने वालों और सबसे महत्वपूर्ण—घोड़ा-खच्चर तथा डंडी-कंडी सेवा देने वाले स्थानीय ग्रामीणों के व्यवसायों में उल्लेखनीय उछाल आया है।
सबसे सुखद पहलू यह है कि इस धार्मिक पर्यटन ने स्थानीय युवाओं के पहाड़ों से होने वाले पलायन पर एक बड़ा ब्रेक लगाया है। घाटी के सैकड़ों शिक्षित और कुशल युवाओं को अपने ही घर-आंगन में होटल मैनेजमेंट, टूर गाइड, ट्रैवल एजेंसी और साहसिक पर्यटन से जुड़े रोजगार व स्वरोजगार के बेहतरीन और टिकाऊ अवसर प्राप्त हो रहे हैं। यह यात्रा अब केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न रहकर स्थानीय समाज की आजीविका की रीढ़ बन चुकी है।
आंकड़ों की जुबानी: कौन-कौन पहुंचा बाबा के द्वार?
इस यात्रा के आधिकारिक और सूक्ष्म प्रबंधन पर नजर रख रहे तुंगनाथ धाम के प्रबंधक प्रकाश पुरोहित ने हाल ही में यात्रा के विस्तृत और प्रामाणिक आंकड़े जारी किए हैं। उनके अनुसार, कपाट खुलने से लेकर अब तक कुल 1,18,381 श्रद्धालुओं ने बाबा तुंगनाथ के दर्शन कर विशेष पूजा-अर्चना, भोग और जलाभिषेक का पुण्य लाभ कमाया है। यदि इस आंकड़े का लिंगवार वर्गीकरण करें, तो इसमें:
-
पुरुष श्रद्धालु: 60,962
-
महिला श्रद्धालु: 50,815
-
बच्चे: 6,384
-
साधु-संत: 151
-
विदेशी पर्यटक: 69
प्रबंधक प्रकाश पुरोहित ने इस दौरान एक बेहद महत्वपूर्ण तकनीकी पहलू को भी स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि यह आंकड़ा केवल उन श्रद्धालुओं का है जो मंदिर परिसर के भीतर पहुंचे और जिन्होंने बकायदा पंजीकरण या दर्शन किए। इसमें चोपता से सीधे चंद्रशिला चोटी की ओर जाने वाले उन हजारों साहसिक ट्रैकरों और प्रकृति प्रेमियों की संख्या को शामिल नहीं किया गया है, जो मंदिर के मुख्य मार्ग से होकर गुजरते हैं। यदि उन्हें भी जोड़ लिया जाए, तो इस क्षेत्र में आने वाले कुल पर्यटकों की संख्या दो लाख के पार पहुंच जाती है। यह विशाल आंकड़ा इस बात की तस्दीक करता है कि यह Highest Shiva Temple In The World अब अध्यात्म और एडवेंचर का एक परफेक्ट ब्लेंड बन चुका है।
व्यवस्थाओं का चक्रव्यूह: स्वच्छता और सुरक्षा पर सामूहिक जोर
इतनी बड़ी संख्या में यात्रियों के पहुंचने के बावजूद यात्रा को सुचारू, सुरक्षित और व्यवस्थित बनाए रखना प्रशासन के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। लेकिन इस बार बदरी-केदार मंदिर समिति (BKTC), स्थानीय तीर्थ पुरोहित समाज, वन विभाग, स्थानीय व्यापार संघ और कई स्वयंसेवी संस्थाओं ने आपसी तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है।
पैदल मार्ग से लेकर मंदिर परिसर तक सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद है। केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग के अंतर्गत आने के कारण पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने के लिए इस बार प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन और स्वच्छता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। जगह-जगह स्वयंसेवकों की टोलियां यात्रियों को प्रकृति को स्वच्छ रखने के लिए जागरूक कर रही हैं। चिकित्सा और आपातकालीन सेवाओं के लिए भी टीमें पैदल मार्ग पर तैनात की गई हैं। यही कारण है कि तमाम व्यवस्थाओं को देखकर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं का भरोसा इस व्यवस्था और धाम के प्रति लगातार और मजबूत हो रहा है।
भविष्य की राह: अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र बनने की असीम संभावनाएं
इस क्षेत्र के अभूतपूर्व विकास और पर्यटन की संभावनाओं को करीब से देखने वाले जाने-माने शिक्षाविद् धीर सिंह नेगी का मानना है कि तुंगनाथ और इसके आस-पास की घाटी में जो प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा है, वह दुनिया में कहीं और नहीं है। उनका कहना है कि यदि सरकार और पर्यटन विभाग इस क्षेत्र में कुछ मूलभूत ढांचागत सुधारों पर योजनाबद्ध तरीके से काम करे, तो इसे और बड़ी ऊंचाइयों पर ले जाया जा सकता है।
धीर सिंह नेगी के अनुसार, चोपता और उसके बेस कैंपों पर व्यवस्थित और आधुनिक पार्किंग की व्यवस्था, पैदल मार्ग पर हर कुछ दूरी पर आधुनिक बायो-टॉयलेट, ठंडे और शुद्ध पेयजल की निरंतर आपूर्ति, उच्च पर्वतीय क्षेत्रों के अनुकूल अत्याधुनिक स्वास्थ्य केंद्र (ताकि किसी को ऑक्सीजन या दिल की समस्या होने पर तुरंत इलाज मिल सके) और सबसे महत्वपूर्ण—पर्यावरण और संवेदनशील इको-सिस्टम के संरक्षण के लिए एक कड़ा मास्टर प्लान तैयार किया जाना चाहिए। यदि इन आवश्यकताओं पर समय रहते काम कर लिया जाए, तो चोपता-तुंगनाथ का यह पूरा क्षेत्र केवल गर्मियों के कुछ महीनों के लिए नहीं, बल्कि पूरे 12 महीने धार्मिक, प्राकृतिक और साहसिक पर्यटन का एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय हब बन सकता है।
लगातार बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या और वैश्विक स्तर पर इसकी गूंज यह साफ इशारा कर रही है कि तृतीय केदार तुंगनाथ धाम अब केवल एक पारंपरिक तीर्थस्थल मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह देवभूमि उत्तराखंड के नक्शे पर एक नए, आधुनिक और भव्य आध्यात्मिक युग की शुरुआत का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है।
