
पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में इस समय हालात पूरी तरह बेकाबू हो चुके हैं। पिछले कुछ दिनों से जारी नागरिक असंतोष अब एक पूर्ण जन-विद्रोह का रूप ले चुका है। पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की बर्बर गोलीबारी में कई नागरिकों की मौत और दर्जनों लोगों के गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद, जनता का हौसला टूटने के बजाय और बुलंद हो गया है। दमनकारी नीतियों के खिलाफ अब पीओके में विरोध प्रदर्शन अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है। इलाके के कई प्रमुख शहरों और कस्बों से लाखों की संख्या में प्रदर्शनकारी ‘आजादी’ के गगनभेदी नारों के साथ रावलकोट की ओर मार्च कर रहे हैं। इस्लामाबाद सरकार और सेना के जनविरोधी रवैये ने स्थानीय नागरिकों के सब्र का बांध तोड़ दिया है, जिससे यह क्षेत्र इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक और सामाजिक संकट से घिर गया है।
‘इसके पीछे वर्दी है…’ बलूचिस्तान और केपीके के बाद अब PoK में गूंजा सेना विरोधी नारा
इस ऐतिहासिक आंदोलन के दौरान मुजफ्फराबाद और रावलकोट की वादियों में एक ऐसा नारा गूंज रहा है, जिसने पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय (GHQ) की रातों की नींद उड़ा दी है। प्रदर्शनकारियों के हुजूम से लगातार आवाज आ रही है— ‘ये जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है।’ यह नारा पारंपरिक रूप से सैन्य दमन के शिकार बलूचिस्तान और खैबर पख्तुनख्वा (KPK) प्रांतों में गूंजता था, लेकिन अब यह PoK के नागरिकों की भी मुख्य आवाज बन चुका है।
रावलकोट की सीमा पर हजारों प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए प्रमुख आंदोलनकारी नेता सरदार अमन खान ने पाकिस्तानी हुकूमत को जमकर आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि अस्पताल, रोजगार, सम्मानजनक रोटी और बुनियादी मानवाधिकार मांगने वाली निहत्थी और शांतिप्रिय जनता को पाकिस्तान की सेना और इस्लामाबाद की कठपुतली सरकार ‘आतंकवादी’ घोषित कर रही है।
आंदोलनकारी नेता सरदार अमन खान का तीखा बयान:
“अगर आपको जानना है कि असली आतंकवादी कौन है, तो बलूचिस्तान के मजलूमों से पूछिए, वे सेना की ओर इशारा करेंगे। खैबर पख्तुनख्वा के लोग भी यही गवाही देंगे। आज सिंध और पंजाब में भी यही आवाजें उठ रही हैं। आज हम खुलकर कह रहे हैं कि इस मुल्क में असली डर और आतंक का माहौल उन लोगों ने पैदा किया है जो वर्दी पहनकर सत्ता पर काबिज हैं।”
डेढ़ लाख से अधिक लोग सड़कों पर: कई शहरों में फैला आजादी का आंदोलन
क्षेत्र से मिल रही जमीनी रिपोर्टों के अनुसार, यह आंदोलन अब किसी एक शहर तक सीमित नहीं रह गया है। रावलकोट, बाग, हट्टियां बाला, कोटली, मीरपुर, सुधनोती, धीरकोट, डडयाल और प्रांतीय राजधानी मुजफ्फराबाद समेत समूचा क्षेत्र पूरी तरह बंद है। आंदोलन के समन्वयकों का दावा है कि विभिन्न काफिलों, धरनों और मार्चों में इस समय 1.5 लाख से अधिक लोग सीधे तौर पर शामिल हैं।
सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों के हाथों में बैनर, तख्तियां और पारंपरिक लकड़ी की लाठियां हैं। वे पूरी ताकत से कश्मीर की आजादी और पाकिस्तानी नियंत्रण को समाप्त करने के समर्थन में नारे लगा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि यह हाल के दशकों में इस विवादित क्षेत्र का सबसे बड़ा और सबसे अधिक संगठित सरकार विरोधी आंदोलन बनकर उभरा है, जिसे दबाना अब पाकिस्तानी प्रतिष्ठान के बस में नजर नहीं आ रहा।
रावलकोट बनेगा महासंग्राम का केंद्र: मुजफ्फराबाद घेराव की तैयारी, 38 मांगें तैयार
रणनीति के मुताबिक, PoK के कोने-कोने से निकल रहे प्रदर्शनकारियों के विशाल काफिले मंगलवार रात तक रावलकोट में डेरा डाल देंगे। आयोजकों का कहना है कि यह एक ऐतिहासिक पड़ाव होगा, जहां क्षेत्र की भावी दिशा तय की जाएगी। रावलकोट में एक बड़ी जनसभा के बाद यह जनसैलाब मुजफ्फराबाद की ओर अपनी संयुक्त महायात्रा (Long March) शुरू करेगा।
मुजफ्फराबाद में विधानसभा और प्रशासनिक मुख्यालयों के घेराव के बाद आंदोलनकारी कोर कमेटी प्रशासन के सामने अपनी 38 सूत्रीय मांगें रखेगी। इन मांगों में मुख्य रूप से:
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आर्थिक संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण
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बिजली और आटे पर भारी सब्सिडी
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पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की क्षेत्र से पूर्ण वापसी
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मानवाधिकारों का सम्मान और राजनीतिक बंदियों की रिहाई शामिल है।
गोलीबारी के घायलों से पटे अस्पताल; प्रशासन ने अपनाया दमनकारी रुख
इस जनांदोलन की पृष्ठभूमि में मानवीय संकट की एक दर्दनाक तस्वीर भी छिपी है। एक दिन पहले पाकिस्तानी रेंजर्स द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर की गई सीधी फायरिंग में कई स्थानीय नागरिकों की जान चली गई थी। इस गोलीबारी में घायल हुए दर्जनों लोग वर्तमान में विभिन्न अस्पतालों में जीवन और मौत के बीच झूल रहे हैं। डॉक्टरों के अनुसार, कई घायलों की हालत अत्यंत नाजुक बनी हुई है, जिससे मरने वालों का आंकड़ा बढ़ने की आशंका है। इस बर्बरता ने आग में घी का काम किया है और स्थानीय समाज में पाकिस्तानी सुरक्षाबलों के प्रति नफरत चरम पर पहुंच गई है।
दबाव में आई पाकिस्तानी हुकूमत ने बातचीत का रास्ता चुनने के बजाय दमन और दंडात्मक कार्रवाई तेज कर दी है। प्रशासन ने आंदोलन का नेतृत्व कर रहे चार शीर्ष नेताओं पर 1 करोड़ पाकिस्तानी रुपये का इनाम घोषित कर दिया है। इन नेताओं के खिलाफ आनंद-फानन में देशद्रोह (Sedition) के संगीन मुकदमे दर्ज किए गए हैं। हमेशा की तरह, पाकिस्तानी अधिकारियों ने इन नेताओं को ‘भारतीय एजेंट’ करार देने की पुरानी स्क्रिप्ट दोहराई है। हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने इस आरोप को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पाकिस्तान में जब भी कोई पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता या नेता सेना की तानाशाही पर सवाल उठाता है, तो उसे देशद्रोही या विदेशी एजेंट बता दिया जाता है।
रास्ते बंद, पेड़ काटकर अवरोध: क्या जनभावनाओं को रोक पाएगी सेना?
काफिलों को प्रांतीय राजधानी मुजफ्फराबाद में प्रवेश करने से रोकने के लिए प्रशासन ने दमन के साथ-साथ अवरोधक नीतियां भी अपनाई हैं। मुख्य राजमार्गों और संपर्क मार्गों पर भारी कंक्रीट के बैरिकेड्स लगाए गए हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकारी मशीनरी ने जानबूझकर सैकड़ों हरे-भरे पेड़ों को काटकर सड़कों पर गिरा दिया है ताकि वाहनों की आवाजाही को पूरी तरह ठप किया जा सके।
बहरहाल, पीओके में विरोध प्रदर्शन की यह भयावह और दृढ़ तस्वीर यह साबित करती है कि गोलियां, गिरफ्तारियां, देशद्रोह के मुकदमे और प्रशासनिक अवरोध अब इस जन-आक्रोश को थामने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यह आंदोलन केवल बुनियादी सुविधाओं की मांग से कहीं आगे निकलकर आत्मनिर्णय और सैन्य तानाशाही से मुक्ति की सामूहिक लड़ाई बन चुका है, जिसकी गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुनाई देने लगी है।



