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₹100 के नोट पर छपी अद्भुत धरोहर: 11वीं सदी की ‘रानी-की-वाव’ आज भी वैभव का प्रतीक

The Hill India News
Last updated: April 11, 2026 10:59 am
The Hill India News
Published: April 11, 2026
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रानी की वाव भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और वास्तुकला विरासत का एक ऐसा अनमोल उदाहरण है, जो न केवल देश में बल्कि पूरी दुनिया में अपनी अनूठी पहचान रखता है। गुजरात के पाटन शहर में स्थित यह ऐतिहासिक बावड़ी (सीढ़ीदार कुआं) 11वीं सदी की अद्भुत कारीगरी और जल प्रबंधन प्रणाली का जीवंत प्रमाण है। यही वजह है कि इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे भारतीय ₹100 के नोट पर भी स्थान दिया गया है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज जानकारी के अनुसार, रानी-की-वाव का निर्माण वर्ष 1063 ईस्वी के आसपास रानी उदयमति ने अपने पति भीमदेव प्रथम की स्मृति में करवाया था। रानी उदयमति, जूनागढ़ के चूड़ासमा वंश के शासक रा खेंगार की पुत्री थीं। यह भव्य संरचना सरस्वती नदी के किनारे बनाई गई थी, जो उस समय जल का प्रमुख स्रोत मानी जाती थी।

रानी-की-वाव को केवल एक जल स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्थल के रूप में भी विकसित किया गया था। इसकी बनावट इतनी अनोखी है कि इसे “उल्टे मंदिर” के रूप में जाना जाता है। आमतौर पर मंदिर ऊंचाई की ओर बनाए जाते हैं, लेकिन यह संरचना जमीन के भीतर गहराई की ओर जाती है। इस बावड़ी में कुल सात स्तर (मंजिलें) हैं, जो नीचे की ओर उतरती जाती हैं और हर स्तर पर अद्भुत शिल्पकला देखने को मिलती है।

इस वाव की सबसे बड़ी खासियत इसकी बारीक नक्काशी और मूर्तियां हैं। यहां 500 से अधिक प्रमुख मूर्तियां और 1000 से भी ज्यादा छोटी-छोटी कलाकृतियां मौजूद हैं। इन मूर्तियों में देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं, अप्सराओं और उस समय के दैनिक जीवन के दृश्य बेहद सुंदर ढंग से उकेरे गए हैं। हर पत्थर पर की गई नक्काशी इतनी सजीव लगती है मानो वह आज भी जीवंत हो।

वास्तुकला की दृष्टि से यह संरचना मारू-गुर्जरा शैली का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। इसका डिजाइन संतुलन, गहराई और सौंदर्य का ऐसा संगम प्रस्तुत करता है, जो आधुनिक इंजीनियरिंग को भी चुनौती देता है। चौथे स्तर पर पहुंचने पर लगभग 23 मीटर की गहराई में एक आयताकार जलाशय दिखाई देता है, जबकि इसके भीतर एक 30 मीटर गहरा कुआं भी मौजूद है। यह पूरी संरचना इस तरह से बनाई गई है कि जल संरक्षण और उपयोग दोनों ही प्रभावी तरीके से हो सकें।

समय के साथ कई ऐतिहासिक धरोहरें नष्ट हो गईं, लेकिन रानी-की-वाव ने सदियों की चुनौतियों को पार करते हुए अपनी पहचान बनाए रखी। एक समय ऐसा भी आया जब यह बावड़ी सरस्वती नदी के बाढ़ और गाद (मिट्टी) में दब गई थी। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा इसे पुनः खोजा गया और इसकी सफाई व संरक्षण किया गया। आज यह स्मारक पूरी तरह संरक्षित है और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए यूनेस्को ने वर्ष 2014 में रानी-की-वाव को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि यह संरचना केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक धरोहर है। इसके अलावा, वर्ष 2016 में इसे भारत का “सबसे स्वच्छ प्रतिष्ठित स्थल” का खिताब भी दिया गया, जिसका उद्घाटन नरेंद्र मोदी ने किया था।

आज रानी-की-वाव पर्यटन के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण स्थल बन चुकी है। देश-विदेश से हजारों पर्यटक यहां इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व को देखने आते हैं। यहां आने वाले लोग न केवल इसकी सुंदरता का आनंद लेते हैं, बल्कि प्राचीन भारत की उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली और कला कौशल को भी समझते हैं।

यात्रा के लिहाज से भी यह स्थान काफी सुगम है। पाटन तक सड़क, रेल और हवाई मार्ग से आसानी से पहुंचा जा सकता है। सबसे नजदीकी हवाई अड्डा अहमदाबाद में स्थित है, जो यहां से लगभग 125 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा, पाटन रेलवे नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ है, जिससे देश के कई प्रमुख शहरों से सीधी पहुंच संभव है।

कुल मिलाकर, रानी-की-वाव केवल एक बावड़ी नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, वास्तुकला कौशल और वैज्ञानिक सोच का अद्भुत संगम है। 11वीं सदी में बनी यह संरचना आज भी अपने मूल स्वरूप में कायम है और आने वाली पीढ़ियों को भारत के गौरवशाली इतिहास की झलक दिखाती रहेगी।

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