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Reading: कक्षा 6 से तीसरी भाषा अनिवार्य: CBSE का बड़ा फैसला, स्कूलों को 7 दिन में लागू करने का निर्देश
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The Hill India > Blog > देश > कक्षा 6 से तीसरी भाषा अनिवार्य: CBSE का बड़ा फैसला, स्कूलों को 7 दिन में लागू करने का निर्देश
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कक्षा 6 से तीसरी भाषा अनिवार्य: CBSE का बड़ा फैसला, स्कूलों को 7 दिन में लागू करने का निर्देश

The Hill India News
Last updated: April 9, 2026 10:46 am
The Hill India News
Published: April 9, 2026
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केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए कक्षा 6 से छात्रों के लिए ‘तीसरी भाषा’ (R3) को अनिवार्य कर दिया है। यह निर्णय राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 के तहत लिया गया है। बोर्ड ने सभी संबद्ध स्कूलों को सख्त निर्देश दिया है कि वे इस नई व्यवस्था को अगले 7 दिनों के भीतर लागू करें।

CBSE द्वारा जारी हालिया सर्कुलर के अनुसार, भले ही तीसरी भाषा के लिए आधिकारिक पाठ्यपुस्तकें अभी उपलब्ध न हों, लेकिन शिक्षण कार्य को तत्काल प्रभाव से शुरू करना अनिवार्य होगा। बोर्ड का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य छात्रों में भाषाई दक्षता, सांस्कृतिक समझ और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करना है।

सर्कुलर में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्कूलों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और अध्ययन सामग्री का उपयोग करके पढ़ाई शुरू करनी होगी। इसके साथ ही, स्कूलों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे चुनी गई भाषा की जानकारी अपने क्षेत्रीय कार्यालय को दें और OASIS पोर्टल पर उसे अपडेट करें। यह प्रक्रिया पूरी तरह मॉनिटर की जाएगी, और CBSE के क्षेत्रीय अधिकारी इसके कार्यान्वयन पर नजर रखेंगे।

इस नई व्यवस्था के तहत कक्षा 6 में जो तीसरी भाषा शुरू की जाएगी, वही आगे चलकर कक्षा 9 और 10 में विकल्प के रूप में उपलब्ध होगी। इसका मतलब है कि छात्रों को शुरू से ही भाषा चयन को गंभीरता से लेना होगा, क्योंकि यही उनकी आगे की पढ़ाई को प्रभावित करेगा।

त्रिभाषा मॉडल (R3) के अनुसार, छात्रों को कक्षा 6 से लेकर कक्षा 10 तक तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा। इस मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इन तीन भाषाओं में से कम से कम दो भारतीय मूल की भाषाएं होना अनिवार्य है। उदाहरण के तौर पर हिंदी, संस्कृत, मराठी, तमिल, तेलुगु, बंगाली आदि भाषाएं इसमें शामिल हो सकती हैं। तीसरी भाषा के रूप में अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा को भी चुना जा सकता है।

इस फैसले को देश में बहुभाषावाद को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छात्रों की भाषाई क्षमता बढ़ेगी और वे विभिन्न संस्कृतियों को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। साथ ही, यह कदम राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत करेगा, क्योंकि विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों की भाषाओं के प्रति सम्मान और समझ विकसित होगी।

हालांकि, इस निर्णय के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। कई स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की कमी है, ऐसे में नई भाषा के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता एक बड़ा सवाल है। इसके अलावा, पाठ्यपुस्तकों की अनुपलब्धता और सीमित समय सीमा भी स्कूलों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और CBSE को इस प्रक्रिया को सुचारू रूप से लागू करने के लिए अतिरिक्त संसाधन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना होगा। खासकर ग्रामीण और छोटे शहरों के स्कूलों में इस तरह के बदलाव को लागू करना आसान नहीं होगा।

CBSE ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह पहल चरणबद्ध तरीके से लागू की जाएगी और इसे 2031 तक पूरी तरह प्रभावी बनाने की योजना है। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में भाषा शिक्षा के क्षेत्र में और भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

कुल मिलाकर, कक्षा 6 से तीसरी भाषा को अनिवार्य करने का यह फैसला भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक बड़ा और दूरगामी बदलाव है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया गया, तो यह छात्रों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसके सफल क्रियान्वयन के लिए स्कूलों, शिक्षकों और प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय और तैयारी की आवश्यकता होगी।

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