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उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड में जमीन विवादों पर बड़ा बदलाव: पुलिस की सीधी दखल खत्म, लैंड फ्रॉड कमेटी के बाद ही होगी एफआईआर

The Hill India News
Last updated: April 6, 2026 11:19 am
The Hill India News
Published: April 6, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने जमीन से जुड़े विवादों और लैंड फ्रॉड के मामलों को लेकर एक बड़ा और अहम प्रशासनिक फैसला लिया है, जो राज्य की कानून-व्यवस्था और राजस्व प्रणाली दोनों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। नई व्यवस्था के तहत अब जमीन से जुड़े किसी भी विवाद या धोखाधड़ी के मामले में पुलिस सीधे एफआईआर दर्ज नहीं करेगी। ऐसे मामलों में पहले लैंड फ्रॉड कमेटी द्वारा जांच और सत्यापन किया जाएगा, और उसी की संस्तुति के बाद ही पुलिस आगे की कार्रवाई करेगी।

सरकार का यह कदम लंबे समय से उठ रही उन शिकायतों के बाद आया है, जिनमें कहा जा रहा था कि जमीन विवादों में पुलिस की अनावश्यक दखलंदाजी से मामलों का स्वरूप जटिल और कई बार अनावश्यक रूप से आपराधिक हो जाता है। खासतौर पर देहरादून और अन्य मैदानी जिलों में फर्जी रजिस्ट्री, कब्जा विवाद और जमीन की खरीद-फरोख्त से जुड़े मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी, जिससे प्रशासन और पुलिस दोनों पर दबाव बढ़ रहा था।

नई व्यवस्था के तहत अब यह स्पष्ट कर दिया गया है कि किसी भी जमीन विवाद या कथित लैंड फ्रॉड के मामले को पहले लैंड फ्रॉड कमेटी के समक्ष प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। यह कमेटी मामले की जांच करेगी, दस्तावेजों का सत्यापन करेगी और यह तय करेगी कि मामला वास्तव में आपराधिक प्रकृति का है या सिविल/राजस्व से जुड़ा विवाद है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि मामला लैंड फ्रॉड का है, तभी पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए जाएंगे।

सरकार के इस फैसले के पीछे मुख्य उद्देश्य यह है कि सिविल प्रकृति के मामलों में पुलिस की भूमिका को सीमित किया जाए और केवल वास्तविक आपराधिक मामलों में ही पुलिस कार्रवाई हो। इससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी, बल्कि लोगों को अनावश्यक पुलिस कार्रवाई और मुकदमों से भी राहत मिलेगी।

इस फैसले के पीछे भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की सलाह को भी अहम माना जा रहा है। उन्होंने पहले भी सार्वजनिक रूप से यह मुद्दा उठाया था कि पुलिस का काफी समय जमीन विवादों में खर्च हो जाता है, जिससे कानून-व्यवस्था पर असर पड़ता है। उनका मानना था कि ऐसे मामलों का समाधान मुख्य रूप से राजस्व और प्रशासनिक तंत्र के जरिए होना चाहिए, न कि पुलिस के माध्यम से।

इसी दिशा में हाल ही में लैंड फ्रॉड कमेटी की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता गढ़वाल कमिश्नर और मुख्यमंत्री के सचिव विनय शंकर पांडे ने की। बैठक में जमीन से जुड़े लंबित मामलों की विस्तृत समीक्षा की गई और कई अहम निर्देश जारी किए गए।

समीक्षा के दौरान यह सामने आया कि वर्ष 2021 से लेकर अब तक जमीन विवादों के सैकड़ों मामले लंबित पड़े हैं। केवल गढ़वाल क्षेत्र में ही करीब 200 से अधिक लैंड फ्रॉड के मामले लंबित पाए गए हैं। इनमें से लगभग 40 मामलों का निस्तारण किया जा चुका है, जबकि करीब 160 मामले अब भी लंबित हैं।

इन लंबित मामलों के समाधान के लिए कमेटी ने एक विशेष अभियान चलाने का निर्णय लिया है। इसके तहत सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे 15 दिनों के भीतर इन मामलों से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इसके अलावा, इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए नियमित अंतराल पर बैठकें आयोजित करने का भी निर्णय लिया गया है, ताकि लंबित मामलों का जल्द से जल्द निपटारा किया जा सके।

बैठक में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में जमीन धोखाधड़ी के स्पष्ट प्रमाण मिले हैं। ऐसे करीब 8 मामलों में कमेटी ने पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, जिन मामलों में जांच अभी जारी है, उनमें संबंधित अधिकारियों को जल्द रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है।

इसके अलावा, कई मामले तहसीलदार और उपजिलाधिकारी (एसडीएम) स्तर पर भी लंबित पाए गए हैं। इन मामलों के समाधान के लिए अधिकारियों को अधिकतम तीन महीने के भीतर निस्तारण करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार का मानना है कि इससे वर्षों से लंबित पड़े विवादों को खत्म करने में मदद मिलेगी।

नई व्यवस्था को लेकर आम लोगों की भी मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है। जहां एक ओर लोग इसे पारदर्शिता और न्यायसंगत प्रक्रिया की दिशा में सकारात्मक कदम मान रहे हैं, वहीं कुछ लोगों का कहना है कि लैंड फ्रॉड कमेटी की बैठकें समय पर और नियमित रूप से होनी चाहिए, ताकि मामलों में अनावश्यक देरी न हो।

एक व्यक्ति ने बताया कि जून 2025 के बाद अब जाकर उसे कमेटी के सामने पेश होने का मौका मिला, जिससे यह साफ होता है कि प्रक्रिया में समयबद्धता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।

कुल मिलाकर, उत्तराखंड सरकार का यह फैसला जमीन विवादों के समाधान की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और संतुलित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। यदि इसे प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो इससे न केवल लोगों को राहत मिलेगी, बल्कि पुलिस और प्रशासन के कामकाज में भी स्पष्टता और दक्षता आएगी।

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