नई दिल्ली: भारतीय चुनावी राजनीति में ‘धनबल’ के बेलगाम प्रभाव को कम करने की दिशा में उच्चतम न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव के दौरान किए जाने वाले खर्च की सीमा (Ceiling on Election Spending) तय करने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
यह याचिका गैर सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ (Common Cause) द्वारा दायर की गई है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे छह सप्ताह के भीतर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।
क्या है याचिकाकर्ता की मुख्य दलील?
अदालत में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि वर्तमान व्यवस्था में उम्मीदवारों के खर्च पर तो सीमा निर्धारित है, लेकिन राजनीतिक दलों के खर्च पर कोई ठोस कानूनी सीमा नहीं है। भूषण ने दलील दी कि चुनाव के दौरान धनबल का अनियंत्रित इस्तेमाल न केवल चुनावी मैदान को असंतुलित करता है, बल्कि यह लोकतंत्र की बुनियादी संरचना (Basic Structure) पर भी प्रहार करता है।
उन्होंने इलेक्टोरल बॉन्ड मामले का हवाला देते हुए पीठ को याद दिलाया कि “सुप्रीम कोर्ट पहले ही यह स्वीकार कर चुका है कि असीमित धनबल मतदाताओं के सूचना के अधिकार को प्रभावित करता है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विकृत करता है।” उनके अनुसार, जब तक दलों के खर्च पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक निष्पक्ष चुनाव (Free and Fair Election) की परिकल्पना अधूरी रहेगी।
जस्टिस बागची की टिप्पणी: वैश्विक चुनौतियों का जिक्र
सुनवाई के दौरान जस्टिस जोयमाल्य बागची ने इस मांग के व्यावहारिक पहलुओं और उससे जुड़ी चुनौतियों पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने वैश्विक उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी चुनावी खर्च की सीमाएं मौजूद हैं, लेकिन वहां भी इस कानून की काट निकाल ली जाती है।
अदालत ने कहा कि “वहां भी खर्च को उम्मीदवारों के मित्रों, सहयोगियों या तीसरे पक्षों (Third-party spending) के माध्यम से रूट किया जाता है, जिससे खर्च की वास्तविक सीमा का पता लगाना मुश्किल हो जाता है।” कोर्ट ने संकेत दिया कि केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका क्रियान्वयन (Implementation) एक बड़ी चुनौती है।
चुनाव आयोग को SOP पर विचार करने का निर्देश
इससे पहले हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह चुनावों में होने वाले अत्यधिक खर्च पर अंकुश लगाने के लिए अपनी मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) में नए सुझावों को शामिल करने पर विचार करे। कोर्ट ने याचिकाकर्ता (जो एक आईआईटी स्नातक हैं) द्वारा दिए गए तकनीकी और व्यावहारिक सुझावों को ‘विचारणीय’ माना है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह चुनाव खर्च के संबंध में किसी तीसरे पक्ष की रिपोर्ट (Third-party reports) पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर सकता। पीठ ने टिप्पणी की कि चूंकि चुनाव आयोग ने ऐसी कई रिपोर्टों का खंडन किया है, इसलिए केवल आधिकारिक डेटा और ठोस साक्ष्यों को ही आधार बनाया जा सकता है।
धनबल बनाम लोकतंत्र: एक लंबी कानूनी लड़ाई
भारत में लोकसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के खर्च की एक तय सीमा (वर्तमान में बड़े राज्यों के लिए ₹95 लाख) है, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए ऐसी कोई केंद्रीकृत सीमा नहीं होना लंबे समय से बहस का विषय रहा है। याचिका में मांग की गई है कि:
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राजनीतिक दलों द्वारा प्रचार, विज्ञापन और रैलियों पर किए जाने वाले कुल खर्च की एक ‘कैपिंग’ हो।
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चुनाव के दौरान होने वाले हर खर्च की रियल-टाइम रिपोर्टिंग सुनिश्चित की जाए।
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पारदर्शिता लाने के लिए चुनाव आयोग को और अधिक दंडात्मक शक्तियां दी जाएं।
क्या होगा इस नोटिस का असर?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और चुनाव आयोग को जारी यह नोटिस इस दिशा में पहला कदम है। अब छह हफ्ते बाद जब सरकार और आयोग अपना हलफनामा (Affidavit) दाखिल करेंगे, तब यह स्पष्ट होगा कि देश की कार्यपालिका और चुनाव नियामक इस सुधार के प्रति कितने गंभीर हैं। यदि अदालत खर्च की सीमा तय करने का आदेश देती है, तो यह भारतीय चुनावी इतिहास का सबसे बड़ा सुधार माना जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले की सुनवाई इलेक्टोरल बॉन्ड के बाद राजनीति में ‘काले धन’ और ‘कॉर्पोरेट फंडिंग’ के प्रभाव को कम करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।



