देहरादून | उत्तराखंड की राजधानी देहरादून शनिवार को एक बार फिर राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो गई। राज्य में लगातार बढ़ती आपराधिक घटनाओं और लचर कानून व्यवस्था के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने हुंकार भरी। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल के नेतृत्व में सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने राजपुर रोड से पुलिस मुख्यालय (PHQ) की ओर कूच किया। इस दौरान कांग्रेस के दिग्गजों और पुलिस बल के बीच तीखी नोकझोंक और धक्का-मुक्की देखने को मिली।
बैरिकेडिंग पर चढ़े दिग्गज, पुलिस से हुई जोरदार भिड़ंत
कांग्रेस कार्यकर्ता राजपुर रोड स्थित प्रदेश मुख्यालय में एकत्रित हुए, जहाँ से भारी लाव-लश्कर के साथ वे पैदल मार्च करते हुए पुलिस मुख्यालय की ओर बढ़े। हालांकि, पुलिस प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सुभाष रोड पर भारी बैरिकेडिंग कर रखी थी।
प्रदर्शन का आलम यह था कि चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत, चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह, प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल और बदरीनाथ विधायक लखपत बुटोला खुद बैरिकेडिंग पर चढ़ गए। कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच जबरदस्त धक्का-मुक्की हुई, जिससे कुछ समय के लिए वहां अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कुछ उत्साहित कार्यकर्ता पहली लेयर की बैरिकेडिंग पार करने में सफल रहे, जिन्हें पुलिस ने अगली घेराबंदी पर रोक लिया।
“रोम जल रहा था और नीरो बंसी बजा रहा था” – गणेश गोदियाल
राज्य सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने वर्तमान स्थिति की तुलना ऐतिहासिक संदर्भ से की। उन्होंने कहा, “इस राज्य की कानून व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है। जिस प्रकार कहा जाता है कि जब रोम जल रहा था तो नीरो बंसी बजा रहा था, वही हाल आज उत्तराखंड का है। सरकार भ्रष्टाचार में डूबी है और पुलिस महकमा जनता की सुरक्षा के बजाय सत्ता के कारिंदों के निजी मसलों को सुलझाने में व्यस्त है।“
गोदियाल ने आरोप लगाया कि पुलिस का ध्यान जनता के हितों से हट चुका है। उन्होंने इसे एक ‘सांकेतिक चेतावनी’ करार देते हुए घोषणा की कि यदि सरकार नहीं जागी, तो 16 फरवरी को राजभवन का घेराव कर भाजपा सरकार की जड़ों को उखाड़ फेंकने का काम किया जाएगा।
“अपराधी बेखौफ होकर दिनदहाड़े गोलियां चला रहे हैं, जबकि पुलिस कप्तान अपराध रोकने के बजाय खनन और भू-माफियाओं को संरक्षण देने में मशगूल हैं। शांत फिजाओं वाला देहरादून अब ‘क्राइम हब’ बनता जा रहा है।” > — हरक सिंह रावत, पूर्व कैबिनेट मंत्री
“एजुकेशन हब से क्राइम हब” की ओर देहरादून?
पूर्व कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत ने देहरादून की बदलती छवि पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पूरे देश में देहरादून को एक शांत शहर और ‘एजुकेशन हब’ के रूप में जाना जाता था। अभिभावक बेखौफ होकर अपने बच्चों को यहां पढ़ने भेजते थे, लेकिन आज स्थिति उलट है।
हरक सिंह ने स्थानीय पुलिस प्रशासन (एसएसपी) पर सीधे प्रहार करते हुए कहा कि जिलों के कप्तान अपराध नियंत्रण के बजाय जमीन के सौदों और खनन के खेल में रुचि ले रहे हैं। उन्होंने मैदानी इलाकों में बढ़ते ‘खून-खराबे’ और पहाड़ी इलाकों में ‘जंगली जानवरों के आतंक’ का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पूरा उत्तराखंड आज डर के साये में जीने को मजबूर है।
कानून व्यवस्था पर उठे 5 प्रमुख सवाल:
कांग्रेस ने इस प्रदर्शन के माध्यम से सरकार के सामने पांच प्रमुख चिंताएं रखी हैं:
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दिनदहाड़े फायरिंग: शहर के पॉश इलाकों में बढ़ती गैंगवार और गोलीबारी की घटनाएं।
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भू-माफिया का बोलबाला: जमीनों पर अवैध कब्जों और उससे जुड़ी हिंसा में वृद्धि।
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पुलिस की प्राथमिकता: क्या पुलिस प्रशासन जनसुरक्षा से ज्यादा ‘वीआईपी सेवा’ में लगा है?
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पहाड़ों में असुरक्षा: जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों से ग्रामीण आबादी का पलायन।
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धीमी जांच प्रक्रिया: गंभीर आपराधिक मामलों में दोषियों की गिरफ्तारी में हो रही देरी।
16 फरवरी को राजभवन घेराव की बड़ी तैयारी
PHQ के घेराव के बाद कांग्रेस ने अब अपने आंदोलन को और धार देने का निर्णय लिया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, 16 फरवरी को होने वाले राजभवन कूच में प्रदेश भर से हजारों की संख्या में कार्यकर्ता जुटेंगे। कांग्रेस इस मुद्दे को आगामी चुनावों और सदन के भीतर भी प्रमुखता से उठाने की रणनीति बना रही है।
प्रशासन का पक्ष
दूसरी ओर, पुलिस प्रशासन का कहना है कि कानून व्यवस्था बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है और प्रदर्शन के दौरान किसी भी अप्रिय घटना को रोकने के लिए पर्याप्त बल तैनात किया गया था। शासन की ओर से फिलहाल कांग्रेस के इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन भाजपा प्रवक्ताओं ने इसे कांग्रेस की ‘हताशा’ और ‘राजनीतिक स्टंट’ करार दिया है।
गरमाती उत्तराखंड की सियासत
देहरादून में आज हुआ यह शक्ति प्रदर्शन यह साफ संकेत देता है कि आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में ‘कानून व्यवस्था’ सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है। एक ओर जहां आम जनता सुरक्षा को लेकर आशंकित है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दल इस असंतोष को सड़क पर उतारकर सत्ता की राह देख रहे हैं।


