
हरिद्वार। उत्तर प्रदेश के पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में अपनी सियासी जमीन तलाश रही समाजवादी पार्टी (सपा) ने एक बड़ा और चौंकाने वाला प्रयोग किया है। सपा सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्तराखंड की कमान एक युवा और शिक्षित संत के हाथों में सौंपी है। हरिद्वार के खड़खड़ी क्षेत्र के रहने वाले 35 वर्षीय महंत शुभम गिरी को उत्तराखंड का कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
देवभूमि की राजनीति में इसे सपा के एक बड़े ‘हृदय परिवर्तन’ और ‘रणनीतिक बदलाव’ के रूप में देखा जा रहा है। अब तक मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण और पिछड़ों की राजनीति के लिए जानी जाने वाली सपा ने उत्तराखंड में हिंदुत्व और संत समाज के बीच पैठ बनाने के लिए ‘भगवा’ चेहरे पर दांव खेला है।
कौन हैं महंत शुभम गिरी? शिक्षा और सियासी सफर
महंत शुभम गिरी महज 35 वर्ष के हैं और संत समाज का एक उभरता हुआ चेहरा हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि है। उन्होंने संस्कृत से आचार्य की उपाधि प्राप्त की है और वैदिक अध्ययन में गहरी रुचि रखते हैं। धर्म और राजनीति के समन्वय को वे उत्तराखंड के विकास के लिए अनिवार्य मानते हैं।
शुभम गिरी लंबे समय से समाजवादी पार्टी की विचारधारा से जुड़े रहे हैं। पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा और युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को देखते हुए हाईकमान ने उन्हें यह बड़ी जिम्मेदारी दी है। नियुक्ति के बाद शुभम गिरी ने कहा, “सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मुझ पर जो विश्वास जताया है, मैं उसे पूरी ईमानदारी से निभाऊंगा। हम देवभूमि की मर्यादा और समाजवादी मूल्यों को साथ लेकर चलेंगे।”
भंग पड़ी कमेटियों का होगा पुनर्गठन: ‘मिशन 2027’ की तैयारी
उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से सांगठनिक रूप से निष्क्रिय नजर आ रही थी। वर्तमान में प्रदेश की सभी जिला और ब्लॉक स्तर की कमेटियां भंग हैं। नए प्रदेश अध्यक्ष के सामने सबसे पहली और बड़ी चुनौती संगठन को शून्य से खड़ा करना है।
शुभम गिरी ने स्पष्ट किया है कि जल्द ही हाईकमान के निर्देशों पर एक नई, ऊर्जावान प्रदेश कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड एक देवनगरी है, इसलिए पार्टी में अन्य साधु-संतों और प्रबुद्ध वर्ग को भी प्राथमिकता दी जाएगी। उनका लक्ष्य विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश के कोने-कोने में ‘साइकिल’ की धमक पहुंचाना है।
हरिद्वार से चुनाव लड़ने के संकेत: क्या बदलेगा सियासी समीकरण?
प्रेस से रूबरू होते हुए शुभम गिरी ने अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भी साझा किया। उन्होंने कहा कि यदि पार्टी नेतृत्व उन्हें मौका देता है, तो वे आगामी विधानसभा चुनाव में हरिद्वार विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरने के लिए तैयार हैं।
विदित हो कि हरिद्वार की राजनीति में संतों का हमेशा से बड़ा प्रभाव रहा है। शुभम गिरी के आने से भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
सपा का उत्तराखंड इतिहास: स्वर्णिम अतीत और वर्तमान की चुनौती
उत्तराखंड राज्य गठन (9 नवंबर 2000) से पहले समाजवादी पार्टी का इस क्षेत्र में मजबूत आधार था। अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी हिस्सों से सपा के विधायक चुने जाते थे। राज्य गठन के बाद भी, हरिद्वार लोकसभा सीट से सपा के राजेंद्र बाड़ी सांसद चुने गए थे, जो पार्टी के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।
हालांकि, राजेंद्र बाड़ी के बाद सपा का ग्राफ लगातार गिरता गया। राज्य की राजनीति ‘बीजेपी बनाम कांग्रेस’ के दो ध्रुवीय मुकाबले में सिमट गई। बसपा और अब आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने तीसरे विकल्प की कोशिश की, लेकिन सपा पिछड़ती गई। अब महंत शुभम गिरी के रूप में पार्टी ने एक ऐसा चेहरा पेश किया है जो स्थानीय संस्कृति, भाषा और धर्म के करीब है।
चुनौतियां अभी भी बरकरार
भले ही शुभम गिरी के नाम से कार्यकर्ताओं में उत्साह है, लेकिन राह आसान नहीं है। उत्तराखंड में सपा को बाहरी दल (यूपी की पार्टी) के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा, पर्वतीय क्षेत्रों में सपा की पहुंच बहुत सीमित है। शुभम गिरी को न केवल मैदानी इलाकों बल्कि पहाड़ के जिलों में भी पार्टी का जनाधार बढ़ाना होगा।
आने वाले दिनों में प्रदेश प्रभारी की नियुक्ति भी की जानी है, जिससे यह साफ होगा कि आगामी स्थानीय निकाय चुनावों और विधानसभा चुनाव में सपा का रोडमैप क्या होने वाला है।
महंत शुभम गिरी की नियुक्ति उत्तराखंड की राजनीति में एक दिलचस्प मोड़ है। क्या एक आचार्य और वैदिक विद्वान समाजवादी पार्टी को उस ऊंचाई पर ले जा पाएगा जहां वह 2000 से पहले थी? यह तो समय बताएगा, लेकिन अखिलेश यादव के इस ‘मास्टरस्ट्रोक’ ने भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खेमों में चर्चा जरूर छेड़ दी है।



