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यूरोप पर प्रस्तावित 10% टैरिफ को किया रद्द; इटली की PM जॉर्जिया मेलोनी ने इसे बताया स्वागत योग्य कदम

दावोस (स्विट्जरलैंड)। स्विट्जरलैंड के बर्फीले शहर दावोस में आयोजित वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) से एक बड़ी वैश्विक आर्थिक खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को चौंकाते हुए उन प्रस्तावित टैरिफ को रद्द करने की घोषणा की है, जो वे फ्रांस, डेनमार्क और जर्मनी समेत कई यूरोपीय देशों पर लगाने वाले थे। ट्रंप के इस फैसले ने न केवल वैश्विक बाजारों को राहत दी है, बल्कि अटलांटिक के दोनों पार (अमेरिका और यूरोप) के कूटनीतिक तनाव को भी फिलहाल शांत कर दिया है।

जॉर्जिया मेलोनी का रिएक्शन: “संवाद ही एकमात्र रास्ता”

अमेरिकी राष्ट्रपति के इस फैसले का यूरोपीय नेताओं ने गर्मजोशी से स्वागत किया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने इस पर अपनी पहली प्रतिक्रिया सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर साझा की। मेलोनी ने ट्रंप के कदम को सकारात्मक बताते हुए इसे कूटनीतिक परिपक्वता करार दिया।

मेलोनी ने लिखा, “मैं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से कुछ यूरोपीय देशों पर 1 फरवरी से लागू होने वाले टैरिफ को रद्द करने के ऐलान का तहे दिल से स्वागत करती हूं। जैसा कि इटली का हमेशा से मानना रहा है, सहयोगी देशों के बीच संवाद (Dialogue) को बढ़ावा देना ही किसी भी विवाद का समाधान है।”

क्या था विवाद और क्यों ट्रंप ने लगाया था 10% टैरिफ?

यह विवाद तब शुरू हुआ था जब डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका यूरोपीय संघ (EU) के देशों से आने वाले सामानों पर 10 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगाएगा। यह टैरिफ 1 फरवरी 2026 से लागू होने वाला था। ट्रंप के इस फैसले के पीछे मुख्य वजह ग्रीनलैंड (Greenland) का मुद्दा था।

ट्रंप का तर्क था कि यूरोपीय देश ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के साथ ‘सार्थक बातचीत’ नहीं कर रहे हैं। डेनमार्क (जिसके पास ग्रीनलैंड का प्रशासनिक नियंत्रण है) और अन्य यूरोपीय सहयोगियों के अड़ियल रुख से नाराज होकर ट्रंप ने आर्थिक दबाव की रणनीति अपनाई थी। इस टैरिफ के ऐलान से वैश्विक व्यापार युद्ध (Trade War) का खतरा मंडराने लगा था, जिससे जर्मनी और फ्रांस जैसे निर्यात-प्रधान देशों की अर्थव्यवस्था में खलबली मच गई थी।

नाटो (NATO) चीफ की एंट्री ने बदली तस्वीर

इस पूरे घटनाक्रम में टर्निंग पॉइंट तब आया जब नाटो के सेक्रेटरी जनरल मार्क रुटे (Mark Rutte) ने इस मामले में मध्यस्थता की। ट्रंप और मार्क रुटे के बीच हुई हाई-प्रोफाइल मुलाकात के बाद समीकरण पूरी तरह बदल गए। रुटे ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि ग्रीनलैंड के मुद्दे पर राष्ट्रपति ट्रंप का रुख ‘तार्किक और सही’ है।

नाटो प्रमुख के इस समर्थन ने ट्रंप को वह कूटनीतिक जीत दिला दी जिसकी वे तलाश कर रहे थे। रुटे के बयान से संतुष्ट होकर ट्रंप ने घोषणा की कि चूंकि अब उनके सहयोगियों ने उनकी चिंता को समझा है, इसलिए वे आर्थिक दंड (टैरिफ) लगाने का इरादा छोड़ रहे हैं।

ग्रीनलैंड का मुद्दा और मेलोनी की भूमिका

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने इस पूरे विवाद के दौरान एक कुशल मध्यस्थ की भूमिका निभाई है। अपनी हालिया जापान यात्रा के दौरान भी मेलोनी ने ग्रीनलैंड के मुद्दे को मेज पर बैठकर सुलझाने की वकालत की थी। वे लगातार ट्रंप और अन्य नाटो सहयोगियों के बीच पुल का काम कर रही थीं। मेलोनी का मानना है कि रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के बीच अमेरिका और यूरोप का एक साथ रहना अनिवार्य है, और व्यापारिक युद्ध केवल साझा दुश्मनों को फायदा पहुँचाएगा।

वैश्विक बाजार और यूरोप के लिए राहत

ट्रंप के इस यू-टर्न से यूरोपीय बाजारों में तेजी देखी गई है। अगर यह टैरिफ लागू हो जाता, तो:

  1. ऑटोमोबाइल सेक्टर: जर्मनी की बड़ी कार कंपनियों (BMW, मर्सिडीज) को भारी नुकसान होता।

  2. लग्जरी सामान: फ्रांस के फैशन और वाइन उद्योग पर इसका सीधा असर पड़ता।

  3. महंगाई: अमेरिका में भी आयातित सामान महंगे होने से आम जनता पर बोझ बढ़ता।

डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति और सहयोगी देशों के साथ तालमेल बिठाने की कला का एक अनूठा मिश्रण है। जहाँ मेलोनी जैसे नेता इसे संवाद की जीत मान रहे हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषक इसे ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं जिसमें वे पहले दबाव बनाते हैं और फिर अपनी शर्तों पर समझौता करते हैं। फिलहाल, दावोस से आई यह खबर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए किसी ‘बूस्टर डोज’ से कम नहीं है।

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