
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों ग्रामीण रोजगार और मनरेगा (MGNREGA) के भविष्य को लेकर घमासान छिड़ा हुआ है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने केंद्र और राज्य सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ अभियान को तेज कर दिया है। इस अभियान को व्यवस्थित रूप देने के लिए उन्होंने एक उच्च स्तरीय पांच सदस्यीय समिति का गठन किया है, जो पूरे राज्य में पंचायत स्तर पर जाकर सरकार की कथित जनविरोधी नीतियों का पर्दाफाश करेगी।
कांग्रेस की ‘रणनीति’: चौपालों से निकलेगी विरोध की गूँज
गणेश गोदियाल ने इस अभियान की कमान अनुभवी हाथों में सौंपी है। विधायक विक्रम सिंह नेगी को समिति का संयोजक नियुक्त किया गया है। समिति के अन्य सदस्यों में विधायक मनोज तिवारी, वीरेंद्र जाति, आदेश चौहान और डीडी कुनियाल को शामिल किया गया है।
इस समिति का मुख्य उद्देश्य राज्य के कोने-कोने में ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ को पहुंचाना है। गोदियाल ने निर्देश दिए हैं कि समिति के सदस्य अपने-अपने प्रभार वाले जिलों में पंचायत स्तर पर ‘चौपालों’ का आयोजन करेंगे। इन चौपालों में ग्रामीणों को मनरेगा के नियमों में किए गए हालिया बदलावों और उनसे होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक किया जाएगा।
“60 दिन रोजगार न देने की गारंटी बन गई है भाजपा की मनरेगा”
सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए गणेश गोदियाल ने कहा कि यूपीए सरकार के दौरान मनरेगा एक क्रांतिकारी कदम था, जो ग्रामीण भारत को रोजगार की कानूनी गारंटी देता था। उन्होंने आरोप लगाया, “भाजपा सरकार ने इस योजना के मूल स्वरूप को पूरी तरह बिगाड़ दिया है। जो योजना रोजगार देने की गारंटी थी, वह अब बदलावों के बाद 60 दिन का काम भी न मिल पाने की गारंटी बनकर रह गई है।”
कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार धीरे-धीरे मनरेगा का वित्तीय बोझ राज्य सरकारों पर डाल रही है। उन्होंने कहा कि पहले इस योजना का पूरा खर्च केंद्र उठाता था, लेकिन अब राज्यों पर आर्थिक दबाव डाला जा रहा है। गोदियाल के अनुसार, यह इस योजना को धीरे-धीरे समाप्त करने की एक सोची-समझी साजिश है, क्योंकि उत्तराखंड जैसे छोटे राज्य के लिए इसका भारी-भरकम बजट जुटाना नामुमकिन होगा।
सत्ता का केंद्रीकरण और पंचायतों के अधिकारों पर प्रहार
कांग्रेस का सबसे बड़ा हमला ‘विकेंद्रीकरण’ के मुद्दे पर है। गोदियाल ने कहा कि कांग्रेस ने पंचायतों को सशक्त बनाया था ताकि ग्रामीण खुद तय कर सकें कि उनके क्षेत्र में कहां तालाब बनेगा और कहां सड़क। लेकिन अब वर्तमान सरकार दिल्ली में बैठकर इन स्थानीय विकास कार्यों का निर्णय ले रही है।
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) द्वारा जारी एक विशेष पत्र को इन चौपालों में पढ़ा जाएगा। यह पत्र ग्रामीणों को बताया कि कैसे उनके अधिकार छीने जा रहे हैं। प्रत्येक ब्लॉक और पंचायत में होने वाली इन गतिविधियों की विस्तृत रिपोर्ट ‘मनरेगा संग्राम कंट्रोल रूम’ को भेजी जाएगी।
जमीन पर दिखने लगा असर: टिहरी में भाजपा को लगा झटका
‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ का असर धरातल पर भी दिखने लगा है। संयोजक विक्रम सिंह नेगी ने बुधवार को प्रतापनगर विधानसभा के अंतर्गत टिहरी जिले के 20 गांवों में चौपालें लगाईं। इस अभियान की गंभीरता और कांग्रेस के तर्कों से प्रभावित होकर चार ग्राम प्रधानों ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है।
गणेश गोदियाल ने इस सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि जनता अब समझ चुकी है कि उनके हितों की रक्षा केवल कांग्रेस ही कर सकती है। उन्होंने समिति के सभी सदस्यों से अपेक्षा की है कि वे सक्रिय रूप से मैदान में उतरकर इस अभियान को जन-आंदोलन का रूप देंगे।
उत्तराखंड में आगामी चुनावों और ग्रामीण जनाधार को देखते हुए कांग्रेस का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ के जरिए कांग्रेस सीधे उन गरीब और श्रमिक परिवारों से जुड़ने की कोशिश कर रही है, जिनकी आजीविका का मुख्य आधार यह योजना है। अब देखना यह होगा कि भाजपा इस ‘संग्राम’ का जवाब किस तरह देती है।



