
नई दिल्ली/देहरादून: देश की राजधानी दिल्ली के प्रगति मैदान (भारत मंडपम) में आयोजित हो रहे विश्व पुस्तक मेला 2026 के मंच से समाज को एक बड़ा संदेश दिया गया है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) द्वारा 16 जनवरी 2026 को ‘भारत में सड़क दुर्घटनाएँ’ नामक पुस्तक का भव्य लोकार्पण किया गया। यह पुस्तक न केवल सड़क हादसों के आंकड़ों का संग्रह है, बल्कि यह उन भयावह स्थितियों, चिकित्सीय चुनौतियों और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का एक विस्तृत दस्तावेज है, जो भारत की सड़कों पर हर रोज घटित होते हैं।
राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह के पावन अवसर पर इस पुस्तक का विमोचन कर एनबीटी ने सुरक्षित यात्रा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
लोकार्पण समारोह: दिग्गजों की मौजूदगी में मंथन
लोकार्पण कार्यक्रम में एनबीटी के अध्यक्ष प्रो. मिलिंद सुधाकर मराठे, निदेशक युवराज मलिक, उत्तराखंड उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश लोकपाल सिंह, एम्स गुवाहाटी के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. बी. के. एस. संजय और प्रख्यात ऑर्थोपीडिक सर्जन व रोड सेफ्टी एक्टिविस्ट डॉ. गौरव संजय प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. ललित किशोर मंडोरा ने किया। इस दौरान वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि सड़क सुरक्षा केवल एक नियम नहीं, बल्कि जीवन बचाने का संस्कार है।
90 प्रतिशत दुर्घटनाओं के पीछे मानवीय चूक: डॉ. बी. के. एस. संजय
एम्स गुवाहाटी के अध्यक्ष और पुस्तक के लेखक डॉ. बी. के. एस. संजय ने संबोधित करते हुए चौंकाने वाले तथ्य साझा किए। उन्होंने बताया कि शोध और विश्लेषण के अनुसार, लगभग 90 प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएँ चालक की लापरवाही के कारण होती हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया, “यह पुस्तक किसी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के प्रति एक उत्तरदायित्व के रूप में लिखी गई है। सड़क दुर्घटनाएँ देश की प्रगति की गति को धीमा कर रही हैं और हमारे युवाओं को शारीरिक व मानसिक रूप से अक्षम बना रही हैं। यह पुस्तक विशेष रूप से उन वाहन चालकों को समर्पित है, जिनके हाथों में अपनी और दूसरों की जान सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है।”

डॉ. संजय ने उन प्रमुख कारणों पर भी प्रकाश डाला जो जानलेवा साबित होते हैं:
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नींद का अभाव और अत्यधिक थकान: लंबी दूरी के चालकों में यह एक बड़ी समस्या है।
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नशे का प्रभाव: शराब पीकर गाड़ी चलाना ‘मौत को बुलावा’ देने जैसा है।
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मोबाइल का उपयोग और ओवर-स्पीडिंग: तकनीकी व्याकुलता और गति का जुनून आज की सबसे बड़ी चुनौती है।
सड़क सुरक्षा: शिक्षा और अनुशासन का समन्वय
पुस्तक के सह-लेखक डॉ. गौरव संजय ने एक सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि सड़क दुर्घटनाएँ ऐसी घटनाएँ हैं, जिन्हें शत-प्रतिशत रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से समाज में सड़क सुरक्षा के प्रति शिक्षा, अनुशासन और उत्तरदायित्व की भावना पैदा करने का प्रयास किया गया है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे केवल ‘ड्राइवर’ न बनें, बल्कि एक ‘जागरूक चालक’ और सड़क पार करते समय एक ‘सतर्क पैदल यात्री’ की भूमिका निभाएं।
समाज और परिवार पर पड़ता है गहरा प्रभाव: युवराज मलिक
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के निदेशक युवराज मलिक ने पुस्तक की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब कोई सड़क हादसा होता है, तो उसका प्रभाव केवल पीड़ित तक सीमित नहीं रहता। वह पूरा परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से टूट जाता है। उन्होंने विश्वास जताया कि विश्व पुस्तक मेले में आने वाले युवा पाठक जब इस पुस्तक को पढ़ेंगे, तो उनमें सुरक्षा के प्रति एक नई चेतना जागृत होगी।
न्यायिक दृष्टिकोण: कानून के साथ जागरूकता भी जरूरी
मुख्य अतिथि और उत्तराखंड उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश लोकपाल सिंह ने न्यायिक अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि सड़कों पर बढ़ती मौतों की संख्या अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने जोर दिया कि कानून अपनी जगह है, लेकिन जब तक देश का युवा सुरक्षित और जिम्मेदार ड्राइविंग को अपनी आदत नहीं बनाएगा, तब तक आंकड़ों में कमी लाना कठिन है। उन्होंने युवाओं से अनुशासित जीवन और सुरक्षित ड्राइविंग अपनाने का आह्वान किया।
एक जीवन रक्षक गाइड है यह पुस्तक
‘भारत में सड़क दुर्घटनाएँ’ पुस्तक केवल पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक गाइड है जो पहिए पर हाथ रखता है। राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा सप्ताह के दौरान इस पुस्तक का लोकार्पण कर एनबीटी और लेखकों ने एक ऐसे विषय पर संवाद शुरू किया है, जिस पर आज सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।



