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LAC Middle Sector: चीन की ‘ग्रे-ज़ोन’ रणनीति का जवाब देने को तैयार भारतीय सेना, मध्य सेक्टर में सुरक्षा कवच होगा और मज़बूत

नई दिल्ली/देहरादून: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पिछले कुछ वर्षों से जारी तनाव अब केवल लद्दाख या अरुणाचल तक सीमित नहीं रह गया है। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की बढ़ती आक्रामकता और सीमा पार तेज़ होते बुनियादी ढांचे के निर्माण को देखते हुए भारतीय सेना ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से सटे ‘मध्य सेक्टर’ (Middle Sector) में अपनी चौकसी को अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ा दिया है।

करीब 545 किलोमीटर लंबा यह हिस्सा, जिसे कभी ‘शांतिपूर्ण’ माना जाता था, अब रणनीतिक दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील हो गया है। ड्रैगन के ‘अनिश्चित रवैये’ और सीमावर्ती क्षेत्रों के सैन्यीकरण के जवाब में भारतीय सेना ने अपनी परिचालन तैयारियों (Operational Readiness) की व्यापक समीक्षा की है।


‘फोर्टिफाइंग हिमालय’: सैन्य-नागरिक समन्वय पर महामंथन

चीन की ‘दोहरे उपयोग’ (Dual-use) वाली सुविधाओं और सीमावर्ती गांवों को सैन्य अड्डों में बदलने की चाल को विफल करने के लिए भारतीय सेना एक नई रणनीति पर काम कर रही है। इसी कड़ी में 7 जनवरी को देहरादून में 14 इन्फैंट्री डिवीजन के तत्वावधान में एक महत्वपूर्ण सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है।

विषय: ‘फोर्टिफाइंग हिमालय – मध्य सेक्टर में सक्रिय सैन्य-नागरिक समन्वय रणनीति’

इस आयोजन में सेना के शीर्ष कमांडर, रणनीतिक विशेषज्ञ और शिक्षाविद हिस्सा लेंगे। इस सेमिनार का मुख्य उद्देश्य उत्तराखंड और हिमाचल के सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य और नागरिक सहयोग को इस तरह एकीकृत करना है कि संकट के समय स्थानीय आबादी सेना के लिए ‘आंख और कान’ के साथ-साथ रसद का भी मजबूत आधार बन सके।


मध्य सेक्टर की विशिष्ट चुनौतियां और बदला हुआ परिदृश्य

पूर्वी (अरुणाचल) और पश्चिमी (लद्दाख) सेक्टर की तुलना में मध्य सेक्टर की भौगोलिक स्थिति अधिक जटिल है। सेना के रणनीतिकारों के अनुसार, इस क्षेत्र में निम्नलिखित चुनौतियां प्रमुख हैं:

  1. दुर्गम भूगोल: अत्यधिक ऊंचाई और ऑक्सीजन की कमी वाले ये इलाके सैनिकों की तैनाती को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।

  2. विरल आबादी: पलायन के कारण सीमावर्ती गांवों का खाली होना सुरक्षा के लिहाज से चिंताजनक है।

  3. ग्रे-जोन गतिविधियां: चीन यहां सीधे युद्ध के बजाय साइबर घुसपैठ, मनोवैज्ञानिक दबाव और नागरिक बुनियादी ढांचे की आड़ में सैन्य विस्तार कर रहा है।

  4. पर्यावरणीय संवेदनशीलता: हिमालय के इस हिस्से में निर्माण कार्य करना पर्यावरणीय दृष्टि से कठिन है।


गलवान के बाद बदली रणनीति: 2020 से अब तक क्या बदला?

साल 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत की सैन्य सोच में ‘पैराडाइम शिफ्ट’ आया है। जो मध्य सेक्टर पहले कम विवादित माना जाता था, वहां अब PLA ने गश्त (Patrolling) की आवृत्ति बढ़ा दी है।

एशियानेट न्यूज़ेबल की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने पिछले तीन वर्षों में हिमाचल और उत्तराखंड में अपनी सैन्य क्षमता को दोगुना किया है। सेना ने न केवल निगरानी तंत्र को सुदृढ़ किया है, बल्कि अग्रिम चौकियों के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का सहारा लिया है।

सेना के आधुनिकीकरण के 3 मुख्य स्तंभ:

  • रियल-टाइम इंटेलिजेंस: सैटेलाइट इमेजरी और यूएवी (UAV) के जरिए सीमा पार हो रही हर छोटी हलचल पर 24/7 नज़र।

  • तेज़ी से तैनाती (Rapid Deployment): सड़कों और हेलीपैड्स के जाल के ज़रिए सैनिकों और भारी हथियारों को चंद घंटों में मोर्चे पर पहुँचाने की क्षमता।

  • बेहतर रसद समर्थन (Logistics Support): ऊंचाई वाले इलाकों में कड़ाके की ठंड के बावजूद सैनिकों के लिए रसद और रसद आपूर्ति को सुचारू बनाना।


चीन का ‘गांव सैन्यीकरण’ और भारत का पलटवार

चीन अपनी सीमा पर ‘झियाओकांग’ (Xiaokang) मॉडल के तहत ऐसे गांव बसा रहा है जो नागरिक आवास लगते हैं लेकिन युद्ध की स्थिति में बैरक के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसके जवाब में भारत ने ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ (Vibrant Village Program) शुरू किया है। इसके तहत सीमावर्ती गांवों में बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं ताकि पलायन रुके और स्थानीय लोग सीमा सुरक्षा तंत्र का अभिन्न हिस्सा बनें।


रणनीतिक विशेषज्ञों की राय

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य सेक्टर में चीन का बढ़ता दखल भारत को दबाव में लेने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है। सेना के एक पूर्व कमांडर के अनुसार, “चीन मध्य सेक्टर में छोटे-छोटे अतिक्रमण (Salami Slicing) के जरिए भारत की प्रतिक्रिया को भांपना चाहता है। देहरादून में होने वाला सेमिनार इसी खतरे को भांपते हुए ‘संपूर्ण राष्ट्र दृष्टिकोण’ (Whole of Nation Approach) को अपनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।”


हिमालय की सुरक्षा सर्वोपरि

भारत अब रक्षात्मक मोड से बाहर निकलकर ‘सक्रिय रणनीति’ (Proactive Strategy) पर काम कर रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल की सीमाएं अब केवल भौगोलिक बाधाएं नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता का अभेद्य किला बन चुकी हैं। 7 जनवरी को होने वाली चर्चा सुरक्षा ढांचे में नागरिक भूमिका को परिभाषित करने के लिए मील का पत्थर साबित होगी।

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