नई दिल्ली: उत्तर-पूर्वी दिल्ली में साल 2020 में भड़की सांप्रदायिक हिंसा और उसकी कथित ‘बड़ी साजिश’ (Larger Conspiracy Case) के मामले में आज का दिन बेहद निर्णायक है। देश की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) आज जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद (Umar Khalid), शरजील इमाम (Sharjeel Imam) और अन्य सह-आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाएगा।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की खंडपीठ इस संवेदनशील मामले पर आदेश पारित करेगी। कानूनी गलियारों और राजनीतिक हलकों की निगाहें इस फैसले पर टिकी हैं, क्योंकि यह मामला UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) जैसे कड़े कानून और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की बहस को केंद्र में रखता है।
लंबी सुनवाई के बाद सुरक्षित रखा गया था फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 10 दिसंबर को इस मामले में मैराथन सुनवाई पूरी की थी। अदालत ने दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू की दलीलों को सुना। वहीं, बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, सिद्धार्थ दवे, सलमान खुर्शीद और सिद्धार्थ लूथरा ने अपनी दलीलें पेश की थीं। सभी पक्षों को सुनने के बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
क्या हैं आरोप और क्यों है यह मामला चर्चा में?
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश थी।
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मुख्य साजिशकर्ता का आरोप: उमर खालिद और शरजील इमाम पर इस हिंसा का “मुख्य मास्टरमाइंड” होने का आरोप है।
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धाराएं: आरोपियों के खिलाफ UAPA की गंभीर धाराओं के साथ-साथ तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
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ट्रिगर: नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान यह हिंसा भड़की थी।
इस हिंसा में 53 लोगों की जान गई थी और 700 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे। करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ था, जिसके बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ‘कॉन्स्पिरेसी एंगल’ की जांच शुरू की थी।
निचली अदालतों से अब तक नहीं मिली है राहत
उमर खालिद और अन्य आरोपियों के लिए कानूनी राह अब तक कठिन रही है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 सितंबर को अपने फैसले में उमर खालिद की जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि प्रथम दृष्टया उनके खिलाफ आरोप गंभीर प्रतीत होते हैं। हाईकोर्ट के इसी फैसले को चुनौती देते हुए आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उमर खालिद सितंबर 2020 से जेल में बंद हैं और उनकी ओर से बार-बार ‘त्वरित सुनवाई’ और ‘मानवीय आधार’ पर जमानत की मांग की जाती रही है।
उमर खालिद के पिता और परिवार को न्याय की उम्मीद
फैसले से पहले उमर खालिद के पिता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने सकारात्मक उम्मीद जताई है। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा:
“मैं सुप्रीम कोर्ट में हुई पूरी बहस के दौरान वहां मौजूद था। जिस तरह से हमारे वकीलों ने तथ्य रखे हैं, हमें पूरी उम्मीद है कि इस बार उमर और उसके साथियों को न्याय मिलेगा और उन्हें जमानत मिल जाएगी।”
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया पर भाजपा का कड़ा रुख
यह मामला न केवल कानूनी बल्कि कूटनीतिक रूप से भी चर्चा में आ गया है। हाल ही में न्यूयॉर्क सिटी के मेयर जोहरान ममदानी द्वारा उमर खालिद के पक्ष में लिखे गए एक ‘नोट’ पर भारतीय राजनीति गरमा गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप करार दिया। भाजपा प्रवक्ताओं का कहना है कि भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और अपनी न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेगा।
फैसले के संभावित कानूनी प्रभाव
सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला भारत के न्यायिक इतिहास में महत्वपूर्ण होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि:
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UAPA की व्याख्या: यह फैसला स्पष्ट करेगा कि UAPA के तहत ‘आतंकवादी कृत्य’ और ‘लोकतांत्रिक विरोध’ के बीच की महीन रेखा को अदालत किस तरह देखती है।
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जमानत की शर्तें: लंबे समय से विचाराधीन कैदियों (Undertrials) के अधिकारों पर शीर्ष अदालत की टिप्पणी भविष्य के मामलों के लिए नजीर बनेगी।
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जांच की विश्वसनीयता: दिल्ली पुलिस द्वारा पेश किए गए ‘साजिश के सबूतों’ पर अदालत की टिप्पणी जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी मुहर लगाएगी।
दिल्ली दंगा 2020 की भयावहता
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मृतक: 53
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घायल: 700+
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मुख्य कानून: UAPA, IPC
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आरोपी: उमर खालिद, शरजील इमाम, खालिद सैफी, गुलफिशा फातिमा आदि।
आज दोपहर तक यह साफ हो जाएगा कि क्या उमर खालिद चार साल से अधिक के अंतराल के बाद जेल की सलाखों से बाहर आएंगे या उन्हें अभी और इंतजार करना होगा।



